पिछले तीन सालों में बिहार के
मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने हैदराबाद, चेन्नई
और दिल्ली के प्रवासी भारतीय दिवस में बदलते बिहार को शो केस किया है।
दोनों नेताओं ने प्रवासियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने के मकसद से
विदेश यात्राएं भी की हैं। लेकिन जरूरत ओरिएंटेशन बदलने की है।
बहुत लोग चौकेंगे अगर कहा जाए कि बिहार ने
सबसे पहले मुक्त अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने और प्रवासी बिहारियों को अपने
यहां निवेश के लिए आकर्षित करने का प्रयास किया था। यह जान कर तो और भी
हैरानी होगी यह प्रयास लालू प्रसाद ने मुख्यमंत्री रहते किया था। आम धारणा
है कि 1991 में उदार आर्थिक नीतियों को अपनाने के बाद सबसे पहले गुजरात,
महाराष्ट्र, पंजाब आदि औद्योगिक रूप से अति विकसित राज्यों ने प्रवासियों
को लुभाने की सफल कोशिश की। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि 1995 में यानी आज से
15 साल पहले बिहार सरकार ने प्रवासियों का एक सम्मेलन किया था। बिहार
इंडस्ट्रीज एसोसिएशन की ओर से इसका आयोजन हुआ था और तब उम्मीद बंधी थी कि
बिहार विदेशी निवेश का हब बनेगा। तब झारखंड बिहार का हिस्सा था और खनिज और
मैनपावर दोनों बिहार में बहुतायत में थे। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन को छह
महीने लगे थे, इस आयोजन को करने में। 1994-95 में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद
ने सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों की यात्रा करके बिहार में
प्रवासियों के निवेश का माहौल बनाया था। लेकिन बिहार में निवेश आना शुरू
होता उससे पहले ही लालू प्रसाद चारा घोटाले में फंस गए और उसके बाद हालात
बिगड़ते चले गए। आज उसके 15 साल बाद बिहार एक बार फिर उसी मुकाम पर खड़ा
है, जहां 1995 में था।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप
मुख्यमंत्री सुशील मोदी, प्रवासी भारतीय दिवसों में जा रहे हैं। वहां बिहार
का स्टॉल लगता है। बदलते बिहार की झांकी बाहर से आए लोगों खास कर प्रवासी
बिहारियों को दिखाई जाती है। वे इसकी तारीफ करते हैं, और वापस चले जाते
हैं। नितांत वैयक्तिक स्तर पर इक्का-दुक्का प्रवासी बिहारियों ने बिहार में
किसी विकलांग की, किसी पिछड़े दलित की या किसी गरीब की मदद की है। कहीं
एकाध एंबुलेंस वगैरह दान में दिए गए हैं। लेकिन ढेर सारे वादे जरूर बिहार
को मिले हैं। प्रवासी बिहारियों का वादा है कि वे लौटेंगे और अपने राज्य को
इसका गौरवशाली अतीत वापस दिलाने के लिए काम करेंगे। बिहार के लोग और सरकार
उस दिन का इंतजार कर रही है। फैज के शब्दों में कहें तो – ‘‘कब ठहरेगा
दर्दे दिल कब रात बसर होगी, सुनते थे वे आएंगे, सुनते थे सहर होगी।’’ बिहार
में विकास की सहर की उम्मीद में वहां के आठ करोड़ लोग बैठे हैं। लेकिन
क्या विकास का यह सबेरा प्रवासी बिहारियों के जरिए आएगा। शायद नहीं। मेरे
नहीं कहने के कई ठोस कारण हैं। पहला कारण यह है कि महाराष्ट्र, गुजरात या
पंजाब के प्रवासियों के मुकाबले बिहार के प्रवासियों की स्थिति अलग है।
बिहार के प्रवासी दुनिया के दूसरे देशों
में जाकर उद्यमी नहीं बने हैं। उन्होंने अपना उद्यम शुरू कर कोई बड़ा
एंपायर खड़ा नहीं किया है। परंपरा से बिहार ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था वाला
राज्य रहा है। इसलिए चाहे भारत के दूसरे हिस्सों में जाकर बसे बिहारी हों
या देश छोड़ कर दुनिया के विकसित-अविकसित देशों में गए बिहारी हों, वे वहां
नौकरी कर रहे हैं। वे दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों में हैं, लेकिन
इक्का-दुक्का गौरवशाली अपवादों को छोड़ दें तो वे उन कंपनियों के निचले या
मध्य मैनेजमेंट का हिस्सा हैं। कंपनी उनकी नहीं है। इसलिए वे उस कंपनी को
बिहार में निवेश करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। मॉरीशस, सूरीनाम,
फिजी, गुयाना, त्रिनिडाड आदि देशों को छोड़ दें तो दूसरे देशों में बिहार
के प्रवासी अपेक्षाकृत देर से पहुंचे है। इसलिए वहां की सामाजिक, आर्थिक और
राजनीतिक व्यवस्था में अभी अपना वैसा हस्तक्षेप नहीं बना पाए हैं, जैसा कि
गुजरात या पंजाब या दक्षिण भारत के लोगों ने बनाए हैं। शिक्षा और शोध के
क्षेत्र में भी कमोबेश यहीं स्थिति है। एक छोटे से तथ्य से इसको समझा जा
सकता है कि आज तक बिहार क्या पूरी हिंदी पट्टी के किसी व्यक्ति को नोबल या
बुकर जैसा कोई पुरस्कार नहीं मिला है। कहने का आशय यह है कि प्रवासी बिहारी
आर्थिक या औद्योगिक मामलों में बहुत बड़ी मदद देने की स्थिति में नहीं
हैं। दूसरा कारण यह भी है कि झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार की स्थिति
ऐसी नहीं है कि औद्योगिक विकास के मैप पर उसे स्थापित किया जा सके। दुनिया
के सबसे बड़े स्टील कारोबारी एल एन मित्तल की नजर बिहार के पड़ोसी झारखंड़
और उड़ीसा दोनों पर है, लेकिन बिहार उनके राडार पर नहीं है। यह एक हकीकत
है, जिसे समझ कर ही बिहार के नए हुक्मरानों को अपनी प्रवासी निवेश आमंत्रित
करने की रणनीति बनानी चाहिए। दुनिया के विकसित देशों में जो प्रवासी
भारतीय हैं, वे ज्यादा से ज्यादा निजी स्तर पर बिहार की मदद के लिए आगे आ
सकते हैं।
पिछले तीन सालों में बिहार के मुख्यमंत्री
नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने हैदराबाद, चेन्नई और दिल्ली
के प्रवासी भारतीय दिवस में बदलते बिहार को शो केस किया है। दोनों नेताओं
ने प्रवासियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने के मकसद से विदेश यात्राएं भी
की हैं। लेकिन जरूरत ओरिएंटेशन बदलने की है। बिहार सरकार का फोकस इस बात
पर होना चाहिए कि वह अपने प्रवासियों का इस्तेमाल बिहार की छवि बेहतर करने
के लिए करे। उन्हें निवेश करने के लिए आमंत्रण देने की बजाए उन्हें अपना
एंबेसडर बना कर भारत के भीतर और विश्व बिरादरी के सामने बिहार की छवि
चमकाने के काम में लगाए। बिहार में निवेश की संभावना पर्यटन, कृषि आधारित
उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में है। पर्यटन के लिहाज से बौ( धर्मावलंबी
देशों में भारत को अपनी छवि ठीक करना चाहिए। सड़क सहित बुनियादी ढांचे में
कामचलाऊ सुधार कर जापान, थाईलैंड, कोरिया, श्रीलंका आदि देशों को इस बात का
प्रस्ताव देना चाहिए कि बिहार में बौ( धर्मस्थलों के विकास पर वे निवेश
करें। इस सेक्टर में निवेश का काम प्रवासी बिहारी खुद नहीं कर सकते हैं, वे
इस सेक्टर में निवेश के लिए वे बिहार के ब्रांड एंबेसडर बन कर निवेशकों को
प्रोत्साहित कर सकते हैं। इसी तरह शिक्षा का क्षेत्र है। केंद्रीय कैबिनेट
ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपना कैंपस खोलने की इजाजत दे दी
है। ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज से लेकर दुनिया भर के संस्थान भारत में आएंगे क्या
इनमें से कोई बिहार में भी अपना कैंपस खोलेगा? शिक्षा के क्षेत्र में झंडे
गाड़ कर रहे बिहारियों और प्रवासी बिहारियों को इस क्षेत्र में जोर लगाना
चाहिए। वे शिक्षा के अहम केंद्र के रूप में बिहार को प्रमोट करें। बिहार के
छात्रों से देश भर के कोचिंग और शैक्षिक संस्थान चल रहे हैं।
विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस बिहार
में खुले तो पलायन रूकेगा और अर्थव्यवस्था का खासा फायदा होगा। बिहार के
हजारों की संख्या में डॉक्टर ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा चला रहे हैं। बहुत
से डॉक्टर ऐसे हैं, जो ब्रिटेन में नौकरी लगने की उम्मीद में बेरोजगारी झेल
रहे हैं। बिहारी डॉक्टरों का यह डायसपोरा बिहार की स्वास्थ्य सेवा में
सुधार के लिए बहुत कुछ कर सकता है। इसी तरह से अमेरिका की साफ्टवेयर
इंडस्ट्री में बिहारी इंजीनियरों की भरमार है। वे बिहार में साफ्टवेयर
डेवलपमेंट के प्रोजेक्ट शुरू कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए भी बिहार सरकार
को पहले बुनियादी सुविधाएं जुटानी होंगी। सड़क, बिजली, पानी आदि ऐसी
बुनियादी चीजें हैं, जिनकी बिहार में कमी है। इस वजह से अगर कोई प्रवासी
बिहारी निजी तौर पर कुछ करना चाहे तो वह नहीं कर पाता है। कई साल पहले
बिहार के तब के मुख्य सचिव जी एस कंग अधिकारियों के एक दल के साथ अमेरिका
गए थे। वहां उन्हें कई इंजीनियरों ने दो-चार महीने के भीतर ही बिहार में
अपना प्रोजेक्ट शुरू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन एक भी प्रोजेक्ट शुरू
नहीं हुआ। कंग के इस दौरे में आईटी सेक्टर में सफलता हासिल करने वाले मिहिर
चौधरी और रवि वर्मा ने बिहार में साफ्टवेयर डेवलपमेंट ऑॅफिस खोलने का
भरोसा दिया था। स्टैट नर्स इंटरनेशनल के जयधर गुप्ता को नर्सिग इंस्टीच्यूट
खोलना था तो गैरी मिश्रा को मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करना था।
लेकिन इनके ज्यादातर प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए। अब उन देशों की बात करते
हैं, जहां प्रवासी बिहारी बहुत पहले गए। इतिहास गवाह है कि बिहार के
प्रवासियों ने भारत से बाहर जाकर आधा दर्जन देश बसाए हैं।
मॉरीशस से लेकर सूरीनाम, फिजी, गुयाना,
त्रिनिडाड आदि देश भोजपुरी बोलने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से गए
लोगों ने बसाए हैं। अपनी अस्मिता को बचाए रखकर स्थानीय आबादी के साथ अद्भुत
तादात्म्य बिहार के लोगों ने बनाया। अपनी जमीन से बहुत दूर जाकर बिहार के
लोगों ने देश बसा दिए और खुद को वहां का बना लिया। इन देशों की राजनीतिक
सत्ता से लेकर औद्योगिक व शैक्षिक प्रतिष्ठानों तक में बिहार के प्रवासियों
की हिस्सेदारी है। ये वहां की मुख्यधारा में शामिल हैं। लेकिन इन देशों की
बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। ग्लोबल इकोनॉमी में ये देश कहीं नहीं ठहरते
हैं। इनमें से ज्यादातर देशों को खुद ही मदद की दरकार रहती है। एक मॉरीशस
को छोड़ दें तो शायद कोई और देश बिहार की किसी किस्म की मदद शायद ही कर
पाए। तभी मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने मॉरीशस की यात्रा की। वहां बिहार दिवस
में हिस्सा लिया। बिहार में निवेश के रूप में इसका कम महत्व है, लेकिन
ब्रांडिंग के लिहाज से यह एक अच्छा कदम था। ऊपर बताए गए देशों के ठीक उलट
बिल्कुल पड़ोस में बिहार के प्रवासियों का संघर्ष आज भी जारी है। पाकिस्तान
और बांग्लादेश में बिहार के प्रवासी अपने अस्तित्व की लडाई लड़ रहे हैं।
आजादी के तुरंत बाद बिहार के जो मुसलमान
पूर्वी बंगाल यानी आज के बांग्लादेश चले गए थे, उनमें से ज्यादातर आज भी
मोहाजिर का टैग लगा कर दर बदर भटक रहे हैं। पाकिस्तान और पूर्वी बंगाल के
बीच छिड़ी लड़ाई में इन बिहारी लोगों ने पाकिस्तान का पक्ष लिया था। यु(
खत्म होने के बाद जब बांग्लादेश का गठन हो गया तो पाकिस्तानी सैनिक इन्हें
वहीं छोड़ कर वापस लौट गए। दशकों तक इन लोगों को बांग्लादेश में संदेह की
नजर से देखा गया। इन्हें न तो पाकिस्तान ने अपनाया और न बांग्लादेश ने। दो
साल पहले बांग्लादेश की एक अदालत ने बिहारी मुसलमानों को नागरिकता और
वोटिंग के अधिकार दिलाने का फैसला किया। जो बिहारी मुसलमान पाकिस्तान में
हैं, वहां भी वे दोयम दर्जे के नागरिक माने जाते हैं। बुनियादी रूप से
पाकिस्तान के कराची और बांग्लादेश के ढाका में बिहारी मुसलमान बसे हैं और
अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बिहार के प्रवासियों की संख्या
काफी है। बिहार से प्रवासन दो तरह का हुआ है – अंतर्देशीय और
अंतरराष्ट्रीय। भारत के भीतर दूसरे राज्यों में भी बिहारियों की संख्या खूब
है और दुनिया के देशों में भी है। केरल के बाद संभवतः बिहार में सबसे
ज्यादा बाहरी धन आता है। लेकिन यह धन निजी तौर पर और पारिवारिक संपत्ति के
रूप में आता है। इसलिए हो सकता है कि प्रवासी बिहारियों के परिजनों की
आर्थिक हालत सुधरती हो, सामूहिक रूप से बिहार की स्थिति में कोई खास बदलाव
नहीं आता है। हालांकि इससे भी राज्य की स्थिति सुधरेगी, पर उसमें बहुत अधिक
समय लगेगा। इसलिए बिहार सरकार को नई रणनीति पर काम करना चाहिए। उसे
प्रवासी बिहारियों को अपना ब्रांड एंबेसडर बना कर उनसे लॉबिंग करानी चाहिए।
बिहार की बदली हुई छवि की ब्रांडिंग प्रवासी बिहारी कर सकते हैं।
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