Sunday, 24 June 2012

विकास के माहौल की बाट जोहते प्रवासी बिहारी

यकीन मानिए जहां तक पुश फैक्टर की बात है बिहार आज भी लोगों को उतना ही बाहर की ओर ठेलता है जितना कि पहले।
प्रवास बिहार और बिहारियों की आदत रही है, फितरत रही है और जरूरत तो खैर रही ही है। ये कोई आजकल की बात नहीं, पिछले डेढ़-पौने दो सौ साल रिकॉर्ड उठाकर देख लिजिए। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से ही ये सिलसिला शुरू हो गया। माइग्रेशन के लिहाज से देखिए बिहार बड़ा क्लासिकल केस स्टडी लगता है। पुश और पुल फैक्टर की थ्योरी कितनी सटीक है, बिहार उसकी मिसाल है। शुरू-शुरू में तो जरूरत थी फिरंगियों के राज में भूखों मरना ही है तो क्यों ना दुनिया के दूसरे छोर भी देखते चलें।बिहार के लिए कम पॉपुलेशन कभी प्रॉब्लम रहा, लोग प्रचुर मात्रा में थे। बाढ़ और अकाल से अनाज भले ही कम पड़ जाए। पूरे ब्रिटिश राज या फिर उसके बाद भी प्रवास जारी रहा, लेकिन तब यहां के लोग प्रोफेशनल डिग्री से लैस होकर नहीं निकलते थे। खून पसीने की कमाई के सहारे ने उन्हें बचाए रखा और जहां गए दूब की तरह पसरने लगे।अगर हम अपने वतन-मिट्टी जैसी भावनाओं को ढाल ना बनाएं तो कुल मिलाकर हालात तकरीबन हमेशा से वैसे रहे हैं कि किसी को बिहार छोड़ने से पहले बहुत सोचना पड़ा हो या फिर हिचक रही हो। साथ ही अगर दूर रहकर भी संपर्क साधने का ऑप्शन भी मौजूद हो तब तो कतई नहीं। लेकिन पिछले पांच दशकों में बिहार से होने वाले विदेशों को प्रवास में गुणात्मक बदलाव आए हैं। सिर्फ मजदूरों की जगह लोग पढ़ लिखकर बाहर निकलने लगे, खासकर ग्लोबलाइजेशन के बाद तो पहले की बूंदी बांदी की जगह बाढ़ ने ले ली। लेकिन यकीन मानिए जहां तक पुश फैक्टर की बात है बिहार आज भी लोगों को उतना ही बाहर की ओर ठेलता है जितना कि पहले। नहीं तो बिहार कोई तमिलनाडु, केरल और गुजरात नहीं है कि राजेंद्र चोल इंडोनेशिया पहुंच गए और गुजराती नैरोबी। किसी कॉन्टिनेंटल लोकेशन वाले लैंड लॉक्ड इलाके से विदेशों या दूसरे हिस्सों के लिए इतनी तादाद में प्रवास कैसे हो सकता है।
पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने सब कुछ तहस नहस किया फिर लालू जी बुल्डोजर चला गए। एक राज्य किसी एक मुख्यमंत्री के राज में इतना नीचे नहीं जा सकता, शायद ये वर्ल्ड रिकार्ड होगा। नीतीश भी बदलाव की बत्ती जलाने का दावा तो करते हैं, लेकिन दीया टिमटिमा ही रहा है। आज भी इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती कि नीतीश भी लालू स्टाइल में शिक्षा को अछूत बनाने पर क्यों आमादा हैं। बिहार की हालत वहां के लोगों को हर स्तर पर प्रवास करने पर मजबूर करती है। लोगों को बांधकर रखने वाली वजह ही नहीं दिखती। खेती जो हर साल पिटती है, औद्योगिकरण जो किसी अश्लील मजाक की तरह लगता है और शिक्षण संस्थान जो नालंदा की तरह सिर्फ अपने इतिहास को सहलाने में लगे हैं वर्तमान कुछ नहीं दिखता। याद किजिए अस्सी और नब्बे के दशक, जब बिहार की यूनिवर्सिटियां पैसेंजर तरह की लेट होने लगी। तीन साल की डिग्री पांच साल में मिलने लगी। अब भरी जवानी में ठेठ दो साल की बेरोजगारी कौन बर्दाश्त करता जो बिहार में रहे। डीयू, बीएचयू और इलाहाबाद में बिहारी जमा होने लगे।जब पांच कॉलेजों की पटना यूनिवर्सिटी नहीं संभल रही तो आप क्या उम्मीद कर सकते हैं।  अब तो आलम ये है कि इंजिनियरिंग मेडिकल के लिए पटना में जमा जमाया कोचिंग का बिजनेस भी दिल्ली और कोटा शिफ्ट हो गया है। लड़के दसवीं बोर्ड और बंसल का टेस्ट एक ही लय में देते हैं।
मान लिया गया कि कोई कायदे का काम वहां हो ही नहीं सकता। पूरे आंध्र में से हैदराबाद को निकाल ले तो क्या बचेगा… लेकिन जब चंद्रबाबू उसे सिलकन वैली बनाने के लिए देश विदेश का दौरा कर रहे थे, लालू जी लाल बुझक्कड़ बने बुझौवल बुझा रहे थे ई आईटी वाईटी क्या होता है। गलत वक्त पर गलत फैसला, बदलाव के दौर में जब राज्य का पुनर्निमाण हो सकता था हम जोकरई में गुजार गए। सांप गुजर गया हम लकीर पीटने में लगे हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि हालात आज भी नहीं बदले हैं। नीतीश जी दरभंगा में भाषण देते हैं कि वो बिहार की नई नवेली दुल्हनों को अपने पिया के विरह से उबार लेंगे, और उसी महीने दरभंगा स्टेशन से सवा लाख लोग पंजाब की राह कट लेते हैं, इस तरह के जोक मोबाइल एसएमएस में नहीं आते अखबारों और टेलिविजन पर दिखते हैं। जो चीजें दूसरे राज्यों की रीढ़ बनकर उभरी है बिहार में आज भी हवा हवाई है। सेज, ड्राई पोर्ट, आईटी सिटी, फिल्म सिटी और राज्य में छात्रों की संख्या और उनकी काबलियत के मुताबिक कैंपस। बिहार में देश के सबसे मेहनती और मेधावी छात्र हैं फिर भी कोश्चन आउट कराने राष्ट्रीय स्तर पर गिरोह का सरगना भी बिहारी ही निकला। आप बिहार की किसी संस्था के बारे में आंख मूंदकर ये यकीन नहीं कर सकते कि कदाचार को लेकर यहां जीरो टॉलरेंस है।अगर यकीन ना आए तो देख लिजिएगा देश में अभी 240 विदेशी विश्वविद्यालयों के आने की बात चल रही है, उनमें से कितनी बिहार का रुख करती हैं।
ये अलग बात है कि बिहार के लड़के अपनी दम खम पर दुनिया के किसी भी शिक्षण संस्थान में मिल जाएंगे, और रही बात पैसे की तो कम से कम पढ़ाई के नाम पर बिहार के मां-बाप कोई कसर नहीं छोड़ते भले ही जमीन जायदाद बेचनी पड़े।कुछ ऐसा ही हाल विदेशी निवेश को लेकर भी है, बिहार आज भी बुनियादी सुविधाओं की जंग लड़ रहा है और विदेशियों की छोड़िए अपने देश के धनकुबेर भी अभी तक प्रदेश की नब्ज टटोलने में ही लगे हैं कोई ठोस फैसला लेने से कतरा रहे हैं।जहां बड़े उद्योग धंधे पूंजी की कमी का सामना कर रहे हैं वही छोटे और गैर परंपरागत किस्म के उद्योग राजनीतिक इच्छाशक्ति के मारे हैं। एक दशक से ऊपर हुए जब उत्तर बिहार में फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स बिठाने की गोल गोल बातें की जा रही हैं, सवाल है प्रगति कितनी हुई। हाजीपुर का केला गांधी सेतु के टॉल और मुजफ्फरपुर की लीचियां ठेलों से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। कहा जाता है अगर मानव संसाधन कुशल और काबिल हो तो जनसंख्या की समस्या आड़े नहीं आती। लेकिन इस ओर किए जा रहे तमाम प्रयास नाकाफी नजर आते हैं। उपर से कुदरत का कोप अलग से, दो साल पहले कोसी के कहर ने लाखों परिवारों को बेघर किया, हजारों की तादाद में लोग सामान के नाम बची खुची यादें पोटलियों में समेटे देश के महानगरों का रुख किया। दिल्ली-मुंबई और सूरत के फुटपाथों पर पॉलीथीन की छत के नीचे रात काट रहे लोग उस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं जब वो वापसी की ट्रेन पकड़ेंगे। समस्या जाने की नहीं बल्कि इसकी है कि वहां जाकर करेंगे क्या। वाकई ये एक यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब तलाशने में हर कोई लगा है जो बिहार की सीमाओं से बाहर है, देखिए जवाब मिलता कम है।

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