विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व प्रधानाध्यापक व प्रसिद्ध समालोचक डा.
मैनेजर पांडेय ने कहा है कि बिहार आधुनिक साहित्य का क्रांति क्षेत्र है।
यहां के साहित्य के नवजागरण की पुर्नव्याख्या करनी होगी।
श्री पांडेय गुरुवार को जेपीविवि के सीनेट हाल में हिंदी विभाग के दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में बोल रहे थे। संगोष्ठी का विषय आधुनिक हिंदी साहित्य और बिहार था। उन्होंने कहा कि बिहार के साहित्य के शोध एवं अध्ययन के लिए सार्थक योजना बननी चाहिए। बिहार के लोग को अपनी समृद्ध साहित्यिक थाती पर गर्व करना चाहिए। उससे सहेजने का उपाय करना चाहिए।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. डा. वीरेन्द्र नारायण यादव ने कहा कि बिहार के साहित्य का पुर्नमूल्यांकन की आवश्यकता है।
इसके पूर्व के सत्र में बिहार में रचे गऐ गद्य साहित्य नाटक, उपन्यास, कहानी एवं अनुवाद साहित्य पर चर्चा हुयी। शांति निकेतन से पधारे डा. रामेश्वर मिश्र ने खड़ी बोली के आंदोलन के कालखंड की चर्चा की। डा. राहुल सिंह मैनेजर पांडेय, नलिन विलोचन शर्मा तथा सुरेन्द्र चौधरी में आलोचना कर्म पर प्रकाश डाला। रांची विश्वविद्यालय के प्रो. जंगबहादुर सिंह ने बिहार एवं झारखंड के उपन्यासकारों के बारे में विमर्श पर प्रकाश डाला। आचार्य डा. शकुंतला मिश्र ने दलित साहित्य चिंताओं को रखा। कुमारी मनीषा ने हिंदी साहित्य की बिहार की देन पर चर्चा की। डा. सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि आने वाला समय एवं साहित्यिक स्पेस बिहार का है और बिहार को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। समापन सत्र का संचालन डा. लालबाबू यादव ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डा. ऊषा कुमारी ने किया। संगोष्ठी में प्रति कुलपति डा. दिनेश प्रसाद सिन्हा, कुलसचिव प्रो. विजय प्रताप कुमार, जगदम कालेज के प्राचार्य डा. प्रमेन्द्र रंजन सिंह, डा. हारून शैलेन्द्र, डा. जितेन्द्र वत्स, रमेश ऋतम्भरा, डा. ललन प्रसाद यादव, डा. योगेन्द्र प्रसाद यादव, प्रो. डा. राजू प्रसाद, कालेज इंसपेक्टर डा. नंदकुमार सिंह, डा. अजय कुमार, डा. श्यामसुंदर प्रसाद, डा. जयराम सिंह, डा. आरएन राय, ब्रजकिशोर सिंह, डा. मनोज कुमार सिंह, मृत्युंजय कुमार सिंह, श्यामशरण आदि उपस्थित थे।
श्री पांडेय गुरुवार को जेपीविवि के सीनेट हाल में हिंदी विभाग के दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में बोल रहे थे। संगोष्ठी का विषय आधुनिक हिंदी साहित्य और बिहार था। उन्होंने कहा कि बिहार के साहित्य के शोध एवं अध्ययन के लिए सार्थक योजना बननी चाहिए। बिहार के लोग को अपनी समृद्ध साहित्यिक थाती पर गर्व करना चाहिए। उससे सहेजने का उपाय करना चाहिए।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. डा. वीरेन्द्र नारायण यादव ने कहा कि बिहार के साहित्य का पुर्नमूल्यांकन की आवश्यकता है।
इसके पूर्व के सत्र में बिहार में रचे गऐ गद्य साहित्य नाटक, उपन्यास, कहानी एवं अनुवाद साहित्य पर चर्चा हुयी। शांति निकेतन से पधारे डा. रामेश्वर मिश्र ने खड़ी बोली के आंदोलन के कालखंड की चर्चा की। डा. राहुल सिंह मैनेजर पांडेय, नलिन विलोचन शर्मा तथा सुरेन्द्र चौधरी में आलोचना कर्म पर प्रकाश डाला। रांची विश्वविद्यालय के प्रो. जंगबहादुर सिंह ने बिहार एवं झारखंड के उपन्यासकारों के बारे में विमर्श पर प्रकाश डाला। आचार्य डा. शकुंतला मिश्र ने दलित साहित्य चिंताओं को रखा। कुमारी मनीषा ने हिंदी साहित्य की बिहार की देन पर चर्चा की। डा. सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि आने वाला समय एवं साहित्यिक स्पेस बिहार का है और बिहार को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। समापन सत्र का संचालन डा. लालबाबू यादव ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डा. ऊषा कुमारी ने किया। संगोष्ठी में प्रति कुलपति डा. दिनेश प्रसाद सिन्हा, कुलसचिव प्रो. विजय प्रताप कुमार, जगदम कालेज के प्राचार्य डा. प्रमेन्द्र रंजन सिंह, डा. हारून शैलेन्द्र, डा. जितेन्द्र वत्स, रमेश ऋतम्भरा, डा. ललन प्रसाद यादव, डा. योगेन्द्र प्रसाद यादव, प्रो. डा. राजू प्रसाद, कालेज इंसपेक्टर डा. नंदकुमार सिंह, डा. अजय कुमार, डा. श्यामसुंदर प्रसाद, डा. जयराम सिंह, डा. आरएन राय, ब्रजकिशोर सिंह, डा. मनोज कुमार सिंह, मृत्युंजय कुमार सिंह, श्यामशरण आदि उपस्थित थे।
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