Sunday, 24 June 2012

बिहार का योजना बजट-2011-12 के लिए 24,000 करोड़ निर्धारित

बिहार  मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2011-12 के लिए बिहार योजना बजट कुल रु॰ 24,000 करोड़ निर्धारित हुई।  नीतीश कुमार ने कहा कि विगत् वर्ष 2010-11 की तुलना में यह 20% अधिक है। इस वर्ष के वार्षिक योजना 24,000 करोड़ में राज्य सरकार अपने बचत से 41% (9934.49 करोड़), बाजार से 27%  (6342 करोड़) और बाँकी बचे 32%  (7723.51 करोड़) केन्द्रीय सहायता से प्राप्त करेगी। यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004-05 में जहाँ केन्द्रीय सहायता 70% होता था वहीं अब केन्द्रीय सहायता का प्रतिशत घट कर 32% रह गया है। राज्य सरकार की अपनी बचत और संसाधन वर्ष 2005-06 में 9.26 प्रतिशत था जो वर्तमान् में 40% से भी अधिक बढ़कर पहुँच गया है।
बिहार का यह वार्षिक बजट  नीतीश कुमार की मोंटेक सिंह अहलुवालिया, उपाध्यक्ष योजना आयोग से योजना भवन में सम्पन्न बैठक में अन्तिम रूप दिया जा सका। पूर्व में राज्य सरकार को गैर योजना मद में नियमित व्यय हेतु कार्मिकों के वेतन एवं भत्ते हेतु उधार लेना होता था। अब राज्य सरकार अपने बचत से गैर योजना मद के खर्चे को स्वतः पूरा करती है और विकासात्मक योजना व्यय को पूरा करती है जो 41% तक होता है। यह तभी सम्भव हो पाया, जब राज्य सरकार अपने वित्तीय प्रबन्धन को विवेकपूर्ण तरीके से अपने संसाधन को सफलतापूर्वक बढ़ाते हुए बहुत बड़े पैमाने पर सुधार किया है, जिसकी सराहना योजना आयोग तक ने की है।
राज्य सरकार ने वर्ष 2005-06 में मात्र 4,676 करोड़ से वर्ष 2006-07 में  8,470 करोड़, वर्ष 2007-08 में 10,436 करोड़, 2008-09 में 13,693 करोड़, 2009-10 में 16,387 करोड़ तथा वर्तमान् वित्तीय वर्ष में 20,000 करोड़ की वृद्धि अपने विकास योजना व्यय में किया है।  कुमार ने बताया कि विकास की मुख्य प्राथमिकता आधारभूत संरचना ही होगी, जिसमें सड़क क्षेत्रों के लिए 23.88% (5732.59 करोड़), उर्जा क्षेत्रों का अंश 7% (1682 करोड़), शिक्षा के क्षेत्रों में 12.56% का अंश (3014 करोड़) तथा अन्य सामाजिक सेवाओं यथा स्वास्थ्य, जलापूर्ति, स्वच्छता, ग्रामीण गृह निर्माण, नारी सशक्तीकरण तथा सामाजिक सुरक्षा का अंश 22.13% (5311 करोड़) होगा। सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण तथा कृषि क्षेत्रों के लिए 9.87%  तथा 5.78% का क्रमशः अंश होगा। बिहार की अर्थ व्यवस्था हाल के वर्षों में दूªत गति से बढ़ी है। अद्यतन आकलन के अनुसार जी.एस.डी.पी. का स्थिर मूल्यों पर वृद्धि दर वर्ष 2005-06 एवं 09-10 में 14.7% की रही है। वर्ष 2005-06 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय 7659 था जो वर्ष 2009-10 में 51% तक बढ़कर 11,558/- हो गया है।
नीतीश कुमार ने राज्य के परिपेक्ष्य में योजना मद से किये जा रहे व्यय उल्लेख करते हुए बताया कि पूर्व में स्कूल नही जाने वाले बच्चों की संख्या 12.8% से घटकर राष्ट्रीय औसत के बराबर 3.5% हो गया है। (2) राज्य में 2.34 लाख प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। (3) नारी शिक्षा योजना के अन्तर्गत् 40 लाख महिलाओं को शिक्षित किया गया। जिसके तहत 60% महिलाएँ वस्तुतः साक्षर की गई। (4.) मुख्यमंत्री बालिका पोशाक योजना लागू की गई। (5) मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना मद में कक्षा 9 के बालिकाओं के लिए 5.25 लाख खर्च किए गए। (6) मुख्यमंत्री बालक साइकिल योजना के तहत कक्षा 9 के विद्यार्थियों पर 6.50 लाख व्यय किए गए। (7) चाणक्या राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के नए परिसर का निर्माण। (8) 446 एकड़ भूमि ‘‘नालन्दा अन्तर्राष्ट्रीय विश्व विद्यालय को हस्तांतरित किया गया’’ कुलपति की नियुक्ति। (9) चन्द्रगुप्त प्रबंधन संस्थान हेतु भवन निर्माण योजना अनुमोदित। (10) आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (निजी एवं आधिकारिक क्षेत्रों में तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा हेतु) भूमि आवंटित की गई। (11) मातृ मृत्यु दर 2001-03 में 371 था से घटकर 2004-06 में 312 हुआ, अखिल भारतीय औसत् 254 है। (12) शिशू मृत्यु दर 2005 में 61 से घटकर 2009 में 52 प्रति एक हजार जीवित जन्मों में पहुँचा। जबकि अखिल भारतीय दर 50 है। (13) पूर्ण गर्भाधारण दर में 4.3 से घटकर 3.9 हुआ। जबकि अखिल भारतीय दर 2.6 है। (14) संस्थागत् प्रसवों में 1992-93 के 12.1% से बढ़कर 2005-06 में 22% 2007-08 में 27.7% और 2009-10 में 47.9% की वृद्धि दर देखी गई। (15) पूर्ण टीकाकरण का अच्छादन वर्ष 1992-93 में 10.7%  से 53.8%  हुआ (सम्प्रति 61%  के लगभग)। (16) अगले दो वर्षों में खाद्यानों के भंडारण की वर्तमान क्षमता 10 लाख मैंट्रिक टन से बढ़कर 40 लाख मैट्रिक टन हो जाएगा। (17) कांटी एवं बरौनी  ताप विद्युत परियोजना का विस्तार। (18) एन0टी0पी0सी0 के साथ संयुक्त उपक्रम में नवीनगर विद्युत संयंत्र में 3×660 मेगावाट उर्जा उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित। (19) दिर्घकालीन आधार पर 450 मेगावाट विद्युत प्राप्ति की योजना तथा (20) 2×660 मेगावाट के तीन विद्युत संयंत्र स्थापित करने हेतु स्थल विकसित करने की योजना तथा (20) 2×660 मेगावाट के तीन विद्युत संयंत्र स्थापित करने हेतु स्थल विकसित करने की योजना।

आहूत बैठक में मुख्यमंत्री के साथ सुशील कुमार मोदी, उप मुख्यमंत्री, बिहार, श्री नरेन्द्र नारायण यादव, मत्री, योजना विकास एवं विधि,  हरकिशोर सिंह, उपाध्यक्ष, बिहार राज्य योजना परिषद सहित राज्य के उच्चाधिकारीगण उपस्थित थे। बैठक समाप्ति के उपरान्त पत्रकारों द्वारा पुछे गये सवाल के उत्तर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने बिहार में हो रहे प्रगति के प्रति संतोष व्यक्त किया। श्री नीतीश कुमार ने उपाध्यक्ष योजना आयोग अहलुवालिया को मांग के अनुरूप योजना की स्वीकृति हेतु आभार प्रकट किया।

सस्पेंड आईएएस के जब्त मकान में दलित छात्रों की लगी कक्षा

पटना। बिहार के सस्पेंड आईएएस अधिकारी शिवशंकर वर्मा के आलीशान तीन मंजिला मकान में नजारा बदल गया है। वहां अब अधिकारी की नेम प्लेट की जगह पर प्राइमरी स्कूल का बोर्ड लगा है और बच्चों का शोर सुनाई दे रहा है।
पटना हाई कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद जिला प्रशासन ने चार सितंबर को शिवशंकर के मकान को जब्त कर लिया था और राजकीय संपत्ति घोषित करने के बाद इसे मानव संसाधन विभाग के सुपुर्द कर दिया था।

आय से ज्यादा संपत्ति जमा करने के मामले में विशेष न्यायालय ने शिवशंकर के करीब डेढ़ करोड़ रुपए के मकान को जब्त करने का आदेश दिया था, जिस पर पटना हाई कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी थी।
विद्यालय प्रबंध समिति की अध्यक्ष सीता देवी ने इस प्राइमरी स्कूल का आज उद्घाटन किया, जिसमें पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे दलित समुदाय के हैं। पटना के जिला शिक्षा पदाधिकारी एम. दास ने बताया कि रुकनपुरा के झुग्गी-झोपड़ियों वाले इलाके में चल रहे प्राइमरी स्कूल को जब्त मकान में ट्रांसफर कर दिया गया है। हाई कोर्ट की ओर से रास्ता साफ होने के बाद सरकार ने तेजी से कदम उठाते हुए जब्त मकान में स्कूल खोलने का काम पूरा किया। छह सितंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक में जब्त मकान को मानव संसाधन विकास विभाग को दे दिया था।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2010 में बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान कहा था कि भ्रष्ट अधिकारियों के मकान को जब्त कर उसमें सरकारी स्कूल खोले जाएंगे।

बिहार के सौराठ में खुलेगा मिथिला पेंटिंग प्रशिक्षण संस्थान – नीतीश कुमार

मधुबनी। सेवा यात्रा के तीसरे दिन जितवारपुर से रांटी पद्मश्री महासुन्दरी देवी के घर पहुंच मुख्यमंत्री ने सौराठ में मिथिला पेंटिंग प्रशिक्षण संस्थान खोलने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस संस्थान का निर्माण बिहार सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा कराया जाएगा। सौराठ के इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा भी दिया जाएगा। यहां मिथिला पेंटिंग सीखने व प्रशिक्षण लेने वाले कलाकारों को संस्थान की ओर से प्रमाण पत्र भी दिए जायेंगे जिसकी मान्यता सभी क्षेत्रों में होगी। करोड़ों की लागत से 10 एकड़ में बनने वाले इस पेंटिंग प्रशिक्षण संस्थान के खुल जाने से मिथिलांचल में रोजगार सृजन के अच्छे अवसर मिलने लगेंगे।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि मधुबनी पेंटिंग न सिर्फ मिथिलांचल का मान बढ़ाई है बल्कि इससे प्रदेश व देश भी गौरवान्वित हुआ है। उन्होंने कहा कि मधुबनी पेंटिंग से मुझे भावनात्मक जुड़ाव है। सौराठ का जब यह संस्थान बनकर तैयार हो जाएगा तो यहां के कलाकारों को इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। बिचौलिया जो इस विधा पर भी हावी हैं वे कहीं दिखाई नहीं देंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मधुबनी पेंटिंग को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्थापित करने के लिए सरकार कोई कसर नहीं छोड़ेगी। सौराठ का जब यह प्रशिक्षण केन्द्र काम करने लगेगा तब यहां देश और विदेश के लोग सिर्फ पेंटिंग देखने ही नहीं खरीदने भी पहुंचेंगे। मधुबनी पेंटिंग को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर सम्मान तो मिलेगा ही कलाकारों को उचित मूल्य भी प्राप्त होगा। उन्होंने कहा सरकार पूर्व में ही मधुबनी प्रशिक्षण केन्द्र खोलने का निर्णय ले चुकी है लेकिन भूमि को लेकर इसकी घोषणा नहीं की गई थी। अब सौराठ में सरकार को जमीन उपलब्ध हो गया है जहां शिक्षा विभाग द्वारा संस्थान का शीघ्र निर्माण प्राप्त हो जाएगा। इस संस्थान में वह सभी सुविधा उपलब्ध रहेगी जो एक विश्वविद्यालय में रहता है। इसे अत्याधुनिक संस्थान बनाया जाएगा और मैथिल ललनाओं को जिसे इस विधा से लगाव है उन्हें प्रशिक्षित कर रोजगार के अवसर प्रदान किए जायेंगे।
मुख्यमंत्री मिथिला को पूरे देश में सम्मान दिलाने वाली पद्मश्री महासुन्दरी देवी के साथ बैठकर उनसे विस्तृत जानकारी भी प्राप्त की। वे मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी अन्य तथ्यों को भी महासुन्दरी देवी व उनके परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर विचार-विमर्श किया। इससे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार परिसदन से जितवारपुर पहुंचकर पद्मश्री स्व. सीता देवी, जगदम्बा देवी, चानो देवी सहित जितवारपुर गांव के दर्जनों घर में जाकर मधुबनी पेंटिंग को देखा और कलाकारों से विस्तृत जानकारी प्राप्त की। जितवारपुर जहां वृहत पैमाने पर मधुबनी पेंटिंग का निर्माण होता है वहां पहुंच मुख्यमंत्री अभिभूत दिख रहे थे। देर शाम वे रांटी ड्योढ़ी के बगीचा स्थित उस भवन पर भी गए जहां जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं द्वारा कई सामानों का निर्माण किया जा रहा है। वे इस कार्यालय के निरीक्षण व कलाकारों द्वारा निर्मित सामानों को देखकर खुश तो थे ही इसे और बेहतर करने का सुझाव महिलाओं को दी। महिलाओं द्वारा उन्हें कई ऐसे सामान भी दिखाए गए जो मिथिलांचल में प्रसिद्ध है। मुख्यमंत्री का यह अंतिम कार्यक्रम था। वे तकरीबन 7 बजे रांटी से चलकर परिसदन पहुंचे।

बिहार के प्रवासी:सरकारी कोशिशें नाकाफी

पिछले तीन सालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने हैदराबाद, चेन्नई और दिल्ली के प्रवासी भारतीय दिवस में बदलते बिहार को शो केस किया है। दोनों नेताओं ने प्रवासियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने के मकसद से विदेश यात्राएं भी की हैं। लेकिन जरूरत ओरिएंटेशन बदलने की है।
बहुत लोग चौकेंगे अगर कहा जाए कि बिहार ने सबसे पहले मुक्त अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने और प्रवासी बिहारियों को अपने यहां निवेश के लिए आकर्षित करने का प्रयास किया था। यह जान कर तो और भी हैरानी होगी यह प्रयास लालू प्रसाद ने मुख्यमंत्री रहते किया था। आम धारणा है कि 1991 में उदार आर्थिक नीतियों को अपनाने के बाद सबसे पहले गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब आदि औद्योगिक रूप से अति विकसित राज्यों ने प्रवासियों को लुभाने की सफल कोशिश की। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि 1995 में यानी आज से 15 साल पहले बिहार सरकार ने प्रवासियों का एक सम्मेलन किया था। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन की ओर से इसका आयोजन हुआ था और तब उम्मीद बंधी थी कि बिहार विदेशी निवेश का हब बनेगा। तब झारखंड बिहार का हिस्सा था और खनिज और मैनपावर दोनों बिहार में बहुतायत में थे। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन को छह महीने लगे थे, इस आयोजन को करने में। 1994-95 में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों की यात्रा करके बिहार में प्रवासियों के निवेश का माहौल बनाया था। लेकिन बिहार में निवेश आना शुरू होता उससे पहले ही लालू प्रसाद चारा घोटाले में फंस गए और उसके बाद हालात बिगड़ते चले गए। आज उसके 15 साल बाद बिहार एक बार फिर उसी मुकाम पर खड़ा है, जहां 1995 में था।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी, प्रवासी भारतीय दिवसों में जा रहे हैं। वहां बिहार का स्टॉल लगता है। बदलते बिहार की झांकी बाहर से आए लोगों खास कर प्रवासी बिहारियों को दिखाई जाती है। वे इसकी तारीफ करते हैं, और वापस चले जाते हैं। नितांत वैयक्तिक स्तर पर इक्का-दुक्का प्रवासी बिहारियों ने बिहार में किसी विकलांग की, किसी पिछड़े दलित की या किसी गरीब की मदद की है। कहीं एकाध एंबुलेंस वगैरह दान में दिए गए हैं। लेकिन ढेर सारे वादे जरूर बिहार को मिले हैं। प्रवासी बिहारियों का वादा है कि वे लौटेंगे और अपने राज्य को इसका गौरवशाली अतीत वापस दिलाने के लिए काम करेंगे। बिहार के लोग और सरकार उस दिन का इंतजार कर रही है। फैज के शब्दों में कहें तो – ‘‘कब ठहरेगा दर्दे दिल कब रात बसर होगी, सुनते थे वे आएंगे, सुनते थे सहर होगी।’’ बिहार में विकास की सहर की उम्मीद में वहां के आठ करोड़ लोग बैठे हैं। लेकिन क्या विकास का यह सबेरा प्रवासी बिहारियों के जरिए आएगा। शायद नहीं। मेरे नहीं कहने के कई ठोस कारण हैं। पहला कारण यह है कि महाराष्ट्र, गुजरात या पंजाब के प्रवासियों के मुकाबले  बिहार के प्रवासियों की स्थिति अलग है।
बिहार के प्रवासी दुनिया के दूसरे देशों में जाकर उद्यमी नहीं बने हैं। उन्होंने अपना उद्यम शुरू कर कोई बड़ा एंपायर खड़ा नहीं किया है। परंपरा से बिहार ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था वाला राज्य रहा है। इसलिए चाहे भारत के दूसरे हिस्सों में जाकर बसे बिहारी हों या देश छोड़ कर दुनिया के विकसित-अविकसित देशों में गए बिहारी हों, वे वहां नौकरी कर रहे हैं। वे दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों में हैं, लेकिन इक्का-दुक्का गौरवशाली अपवादों को छोड़ दें तो वे उन कंपनियों के निचले या मध्य मैनेजमेंट का हिस्सा हैं। कंपनी उनकी नहीं है। इसलिए वे उस कंपनी को बिहार में निवेश करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, त्रिनिडाड आदि देशों को छोड़ दें तो दूसरे देशों में बिहार के प्रवासी अपेक्षाकृत देर से पहुंचे है। इसलिए वहां की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अभी अपना वैसा हस्तक्षेप नहीं बना पाए हैं, जैसा कि गुजरात या पंजाब या दक्षिण भारत के लोगों ने बनाए हैं। शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी कमोबेश यहीं स्थिति है। एक छोटे से तथ्य से इसको समझा जा सकता है कि आज तक बिहार क्या पूरी हिंदी पट्टी के किसी व्यक्ति को नोबल या बुकर जैसा कोई पुरस्कार नहीं मिला है। कहने का आशय यह है कि प्रवासी बिहारी आर्थिक या औद्योगिक मामलों में बहुत बड़ी मदद देने की स्थिति में नहीं हैं। दूसरा कारण यह भी है कि झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार की स्थिति ऐसी नहीं है कि औद्योगिक विकास के मैप पर उसे स्थापित किया जा सके। दुनिया के सबसे बड़े स्टील कारोबारी एल एन मित्तल की नजर बिहार के पड़ोसी झारखंड़ और उड़ीसा दोनों पर है, लेकिन बिहार उनके राडार पर नहीं है। यह एक हकीकत है, जिसे समझ कर ही बिहार के नए हुक्मरानों को अपनी प्रवासी निवेश आमंत्रित करने की रणनीति बनानी चाहिए। दुनिया के विकसित देशों में जो प्रवासी भारतीय हैं, वे ज्यादा से ज्यादा निजी स्तर पर बिहार की मदद के लिए आगे आ सकते हैं।
पिछले तीन सालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने हैदराबाद, चेन्नई और दिल्ली के प्रवासी भारतीय दिवस में बदलते बिहार को शो केस किया है। दोनों नेताओं ने प्रवासियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने के मकसद से विदेश यात्राएं भी की हैं। लेकिन जरूरत ओरिएंटेशन बदलने की है। बिहार सरकार का फोकस इस बात पर होना चाहिए कि वह अपने प्रवासियों का इस्तेमाल बिहार की छवि बेहतर करने के लिए करे। उन्हें निवेश करने के लिए आमंत्रण देने की बजाए उन्हें अपना एंबेसडर बना कर भारत के भीतर और विश्व बिरादरी के सामने बिहार की छवि चमकाने के काम में लगाए। बिहार में निवेश की संभावना पर्यटन, कृषि आधारित उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में है। पर्यटन के लिहाज से बौ( धर्मावलंबी देशों में भारत को अपनी छवि ठीक करना चाहिए। सड़क सहित बुनियादी ढांचे में कामचलाऊ सुधार कर जापान, थाईलैंड, कोरिया, श्रीलंका आदि देशों को इस बात का प्रस्ताव देना चाहिए कि बिहार में बौ( धर्मस्थलों के विकास पर वे निवेश करें। इस सेक्टर में निवेश का काम प्रवासी बिहारी खुद नहीं कर सकते हैं, वे इस सेक्टर में निवेश के लिए वे बिहार के ब्रांड एंबेसडर बन कर निवेशकों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। इसी तरह शिक्षा का क्षेत्र है। केंद्रीय कैबिनेट ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपना कैंपस खोलने की इजाजत दे दी है। ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज से लेकर दुनिया भर के संस्थान भारत में आएंगे क्या इनमें से कोई बिहार में भी अपना कैंपस खोलेगा? शिक्षा के क्षेत्र में झंडे गाड़ कर रहे बिहारियों और प्रवासी बिहारियों को इस क्षेत्र में जोर लगाना चाहिए। वे शिक्षा के अहम केंद्र के रूप में बिहार को प्रमोट करें। बिहार के छात्रों से देश भर के कोचिंग और शैक्षिक संस्थान चल रहे हैं।
विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस बिहार में खुले तो पलायन रूकेगा और अर्थव्यवस्था का खासा फायदा होगा। बिहार के हजारों की संख्या में डॉक्टर ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा चला रहे हैं। बहुत से डॉक्टर ऐसे हैं, जो ब्रिटेन में नौकरी लगने की उम्मीद में बेरोजगारी झेल रहे हैं। बिहारी डॉक्टरों का यह डायसपोरा बिहार की स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए बहुत कुछ कर सकता है। इसी तरह से अमेरिका की साफ्टवेयर इंडस्ट्री में बिहारी इंजीनियरों की भरमार है। वे बिहार में साफ्टवेयर डेवलपमेंट के प्रोजेक्ट शुरू कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए भी बिहार सरकार को पहले बुनियादी सुविधाएं जुटानी होंगी। सड़क, बिजली, पानी आदि ऐसी बुनियादी चीजें हैं, जिनकी बिहार में कमी है। इस वजह से अगर कोई प्रवासी बिहारी निजी तौर पर कुछ करना चाहे तो वह नहीं कर पाता है। कई साल पहले बिहार के तब के मुख्य सचिव जी एस कंग अधिकारियों के एक दल के साथ अमेरिका गए थे। वहां उन्हें कई इंजीनियरों ने दो-चार महीने के भीतर ही बिहार में अपना प्रोजेक्ट शुरू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन एक भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआ। कंग के इस दौरे में आईटी सेक्टर में सफलता हासिल करने वाले मिहिर चौधरी और रवि वर्मा ने बिहार में साफ्टवेयर डेवलपमेंट ऑॅफिस खोलने का भरोसा दिया था। स्टैट नर्स इंटरनेशनल के जयधर गुप्ता को नर्सिग इंस्टीच्यूट खोलना था तो गैरी मिश्रा को मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करना था। लेकिन इनके ज्यादातर प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए। अब उन देशों की बात करते हैं, जहां प्रवासी बिहारी बहुत  पहले गए। इतिहास गवाह है कि बिहार के प्रवासियों ने भारत से बाहर जाकर आधा दर्जन देश बसाए हैं।
मॉरीशस से लेकर सूरीनाम, फिजी, गुयाना, त्रिनिडाड आदि देश भोजपुरी बोलने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से गए लोगों ने बसाए हैं। अपनी अस्मिता को बचाए रखकर स्थानीय आबादी के साथ अद्भुत तादात्म्य बिहार के लोगों ने बनाया। अपनी जमीन से बहुत दूर जाकर बिहार के लोगों ने देश बसा दिए और खुद को वहां का बना लिया। इन देशों की राजनीतिक सत्ता से लेकर औद्योगिक व शैक्षिक प्रतिष्ठानों तक में बिहार के प्रवासियों की हिस्सेदारी है। ये वहां की मुख्यधारा में शामिल हैं। लेकिन इन देशों की बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। ग्लोबल इकोनॉमी में ये देश कहीं नहीं ठहरते हैं। इनमें से ज्यादातर देशों को खुद ही मदद की दरकार रहती है। एक मॉरीशस को छोड़ दें तो शायद कोई और देश बिहार की किसी किस्म की मदद शायद ही कर पाए। तभी मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने मॉरीशस की यात्रा की। वहां बिहार दिवस में हिस्सा लिया। बिहार में निवेश के रूप में इसका कम महत्व है, लेकिन ब्रांडिंग के लिहाज से यह एक अच्छा कदम था। ऊपर बताए गए देशों के ठीक उलट बिल्कुल पड़ोस में बिहार के प्रवासियों का संघर्ष आज भी जारी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में बिहार के प्रवासी अपने अस्तित्व की लडाई लड़ रहे हैं।
आजादी के तुरंत बाद बिहार के जो मुसलमान पूर्वी बंगाल यानी आज के बांग्लादेश चले गए थे, उनमें से ज्यादातर आज भी मोहाजिर का टैग लगा कर दर बदर भटक रहे हैं। पाकिस्तान और पूर्वी बंगाल के बीच छिड़ी लड़ाई में इन बिहारी लोगों ने पाकिस्तान का पक्ष लिया था। यु( खत्म होने के बाद जब बांग्लादेश का गठन हो गया तो पाकिस्तानी सैनिक इन्हें वहीं छोड़ कर वापस लौट गए। दशकों तक इन लोगों को बांग्लादेश में संदेह की नजर से देखा गया। इन्हें न तो पाकिस्तान ने अपनाया और न बांग्लादेश ने। दो साल पहले बांग्लादेश की एक अदालत ने बिहारी मुसलमानों को नागरिकता और वोटिंग के अधिकार दिलाने का फैसला किया। जो बिहारी मुसलमान पाकिस्तान में हैं, वहां भी वे दोयम दर्जे के नागरिक माने जाते हैं। बुनियादी रूप से पाकिस्तान के कराची और बांग्लादेश के ढाका में बिहारी मुसलमान बसे हैं और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बिहार के प्रवासियों की संख्या काफी है। बिहार से प्रवासन दो तरह का हुआ है – अंतर्देशीय और अंतरराष्ट्रीय। भारत के भीतर दूसरे राज्यों में भी बिहारियों की संख्या खूब है और दुनिया के देशों में भी है। केरल के बाद संभवतः बिहार में सबसे ज्यादा बाहरी धन आता है। लेकिन यह धन निजी तौर पर और पारिवारिक संपत्ति के रूप में आता है। इसलिए हो सकता है कि प्रवासी बिहारियों के परिजनों की आर्थिक हालत सुधरती हो, सामूहिक रूप से बिहार की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आता है। हालांकि इससे भी राज्य की स्थिति सुधरेगी, पर उसमें बहुत अधिक समय लगेगा। इसलिए बिहार सरकार को नई रणनीति पर काम करना चाहिए। उसे प्रवासी बिहारियों को अपना ब्रांड एंबेसडर बना कर उनसे लॉबिंग करानी चाहिए। बिहार की बदली हुई छवि की ब्रांडिंग प्रवासी बिहारी कर सकते हैं।

विकास के माहौल की बाट जोहते प्रवासी बिहारी

यकीन मानिए जहां तक पुश फैक्टर की बात है बिहार आज भी लोगों को उतना ही बाहर की ओर ठेलता है जितना कि पहले।
प्रवास बिहार और बिहारियों की आदत रही है, फितरत रही है और जरूरत तो खैर रही ही है। ये कोई आजकल की बात नहीं, पिछले डेढ़-पौने दो सौ साल रिकॉर्ड उठाकर देख लिजिए। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से ही ये सिलसिला शुरू हो गया। माइग्रेशन के लिहाज से देखिए बिहार बड़ा क्लासिकल केस स्टडी लगता है। पुश और पुल फैक्टर की थ्योरी कितनी सटीक है, बिहार उसकी मिसाल है। शुरू-शुरू में तो जरूरत थी फिरंगियों के राज में भूखों मरना ही है तो क्यों ना दुनिया के दूसरे छोर भी देखते चलें।बिहार के लिए कम पॉपुलेशन कभी प्रॉब्लम रहा, लोग प्रचुर मात्रा में थे। बाढ़ और अकाल से अनाज भले ही कम पड़ जाए। पूरे ब्रिटिश राज या फिर उसके बाद भी प्रवास जारी रहा, लेकिन तब यहां के लोग प्रोफेशनल डिग्री से लैस होकर नहीं निकलते थे। खून पसीने की कमाई के सहारे ने उन्हें बचाए रखा और जहां गए दूब की तरह पसरने लगे।अगर हम अपने वतन-मिट्टी जैसी भावनाओं को ढाल ना बनाएं तो कुल मिलाकर हालात तकरीबन हमेशा से वैसे रहे हैं कि किसी को बिहार छोड़ने से पहले बहुत सोचना पड़ा हो या फिर हिचक रही हो। साथ ही अगर दूर रहकर भी संपर्क साधने का ऑप्शन भी मौजूद हो तब तो कतई नहीं। लेकिन पिछले पांच दशकों में बिहार से होने वाले विदेशों को प्रवास में गुणात्मक बदलाव आए हैं। सिर्फ मजदूरों की जगह लोग पढ़ लिखकर बाहर निकलने लगे, खासकर ग्लोबलाइजेशन के बाद तो पहले की बूंदी बांदी की जगह बाढ़ ने ले ली। लेकिन यकीन मानिए जहां तक पुश फैक्टर की बात है बिहार आज भी लोगों को उतना ही बाहर की ओर ठेलता है जितना कि पहले। नहीं तो बिहार कोई तमिलनाडु, केरल और गुजरात नहीं है कि राजेंद्र चोल इंडोनेशिया पहुंच गए और गुजराती नैरोबी। किसी कॉन्टिनेंटल लोकेशन वाले लैंड लॉक्ड इलाके से विदेशों या दूसरे हिस्सों के लिए इतनी तादाद में प्रवास कैसे हो सकता है।
पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने सब कुछ तहस नहस किया फिर लालू जी बुल्डोजर चला गए। एक राज्य किसी एक मुख्यमंत्री के राज में इतना नीचे नहीं जा सकता, शायद ये वर्ल्ड रिकार्ड होगा। नीतीश भी बदलाव की बत्ती जलाने का दावा तो करते हैं, लेकिन दीया टिमटिमा ही रहा है। आज भी इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती कि नीतीश भी लालू स्टाइल में शिक्षा को अछूत बनाने पर क्यों आमादा हैं। बिहार की हालत वहां के लोगों को हर स्तर पर प्रवास करने पर मजबूर करती है। लोगों को बांधकर रखने वाली वजह ही नहीं दिखती। खेती जो हर साल पिटती है, औद्योगिकरण जो किसी अश्लील मजाक की तरह लगता है और शिक्षण संस्थान जो नालंदा की तरह सिर्फ अपने इतिहास को सहलाने में लगे हैं वर्तमान कुछ नहीं दिखता। याद किजिए अस्सी और नब्बे के दशक, जब बिहार की यूनिवर्सिटियां पैसेंजर तरह की लेट होने लगी। तीन साल की डिग्री पांच साल में मिलने लगी। अब भरी जवानी में ठेठ दो साल की बेरोजगारी कौन बर्दाश्त करता जो बिहार में रहे। डीयू, बीएचयू और इलाहाबाद में बिहारी जमा होने लगे।जब पांच कॉलेजों की पटना यूनिवर्सिटी नहीं संभल रही तो आप क्या उम्मीद कर सकते हैं।  अब तो आलम ये है कि इंजिनियरिंग मेडिकल के लिए पटना में जमा जमाया कोचिंग का बिजनेस भी दिल्ली और कोटा शिफ्ट हो गया है। लड़के दसवीं बोर्ड और बंसल का टेस्ट एक ही लय में देते हैं।
मान लिया गया कि कोई कायदे का काम वहां हो ही नहीं सकता। पूरे आंध्र में से हैदराबाद को निकाल ले तो क्या बचेगा… लेकिन जब चंद्रबाबू उसे सिलकन वैली बनाने के लिए देश विदेश का दौरा कर रहे थे, लालू जी लाल बुझक्कड़ बने बुझौवल बुझा रहे थे ई आईटी वाईटी क्या होता है। गलत वक्त पर गलत फैसला, बदलाव के दौर में जब राज्य का पुनर्निमाण हो सकता था हम जोकरई में गुजार गए। सांप गुजर गया हम लकीर पीटने में लगे हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि हालात आज भी नहीं बदले हैं। नीतीश जी दरभंगा में भाषण देते हैं कि वो बिहार की नई नवेली दुल्हनों को अपने पिया के विरह से उबार लेंगे, और उसी महीने दरभंगा स्टेशन से सवा लाख लोग पंजाब की राह कट लेते हैं, इस तरह के जोक मोबाइल एसएमएस में नहीं आते अखबारों और टेलिविजन पर दिखते हैं। जो चीजें दूसरे राज्यों की रीढ़ बनकर उभरी है बिहार में आज भी हवा हवाई है। सेज, ड्राई पोर्ट, आईटी सिटी, फिल्म सिटी और राज्य में छात्रों की संख्या और उनकी काबलियत के मुताबिक कैंपस। बिहार में देश के सबसे मेहनती और मेधावी छात्र हैं फिर भी कोश्चन आउट कराने राष्ट्रीय स्तर पर गिरोह का सरगना भी बिहारी ही निकला। आप बिहार की किसी संस्था के बारे में आंख मूंदकर ये यकीन नहीं कर सकते कि कदाचार को लेकर यहां जीरो टॉलरेंस है।अगर यकीन ना आए तो देख लिजिएगा देश में अभी 240 विदेशी विश्वविद्यालयों के आने की बात चल रही है, उनमें से कितनी बिहार का रुख करती हैं।
ये अलग बात है कि बिहार के लड़के अपनी दम खम पर दुनिया के किसी भी शिक्षण संस्थान में मिल जाएंगे, और रही बात पैसे की तो कम से कम पढ़ाई के नाम पर बिहार के मां-बाप कोई कसर नहीं छोड़ते भले ही जमीन जायदाद बेचनी पड़े।कुछ ऐसा ही हाल विदेशी निवेश को लेकर भी है, बिहार आज भी बुनियादी सुविधाओं की जंग लड़ रहा है और विदेशियों की छोड़िए अपने देश के धनकुबेर भी अभी तक प्रदेश की नब्ज टटोलने में ही लगे हैं कोई ठोस फैसला लेने से कतरा रहे हैं।जहां बड़े उद्योग धंधे पूंजी की कमी का सामना कर रहे हैं वही छोटे और गैर परंपरागत किस्म के उद्योग राजनीतिक इच्छाशक्ति के मारे हैं। एक दशक से ऊपर हुए जब उत्तर बिहार में फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स बिठाने की गोल गोल बातें की जा रही हैं, सवाल है प्रगति कितनी हुई। हाजीपुर का केला गांधी सेतु के टॉल और मुजफ्फरपुर की लीचियां ठेलों से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। कहा जाता है अगर मानव संसाधन कुशल और काबिल हो तो जनसंख्या की समस्या आड़े नहीं आती। लेकिन इस ओर किए जा रहे तमाम प्रयास नाकाफी नजर आते हैं। उपर से कुदरत का कोप अलग से, दो साल पहले कोसी के कहर ने लाखों परिवारों को बेघर किया, हजारों की तादाद में लोग सामान के नाम बची खुची यादें पोटलियों में समेटे देश के महानगरों का रुख किया। दिल्ली-मुंबई और सूरत के फुटपाथों पर पॉलीथीन की छत के नीचे रात काट रहे लोग उस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं जब वो वापसी की ट्रेन पकड़ेंगे। समस्या जाने की नहीं बल्कि इसकी है कि वहां जाकर करेंगे क्या। वाकई ये एक यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब तलाशने में हर कोई लगा है जो बिहार की सीमाओं से बाहर है, देखिए जवाब मिलता कम है।

बिहार में आलू उत्पादन का विश्व कीर्तिमान

पटना। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते रहे है कि वह देश की प्रत्येक थाली में बिहार का कोई उत्पाद परोसना चाहते हैं। लगता है कि नीतीश के इसी सपने को साकार करने के लिए बिहार के नालंदा जिले में कतरीसराय प्रखंड के देशपुरवा गांव के किसानों ने आलू उत्पादन का विश्व कीर्तिमान बनाया है।
मुख्यमंत्री के गृह जनपद, नालंदा के देशपुरवा गांव के किसानों ने जैविक खेती के माध्यम से प्रति हेक्टेयर 729 क्विंटल आलू पैदा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इतना उत्पादन कहीं भी दर्ज नहीं किया गया है। खेत से आलू निकालने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारियों का एक दल भी यहां पहुंचा।
फसल जांच सांख्यिकी विभाग द्वारा निर्धारित मापदंड के अनुसार 10.05 मीटर क्षेत्रफल से निकाले गए आलू का वजन 364.5 किलोग्राम पाया गया। नालंदा के जिलाधिकारी संजय कुमार अग्रवाल ने कहा है कि जैविक खेती के जरिए आलू के उत्पादन में देशपुरवा के किसानों ने नया कीर्तिमान बनाया है। उन्होंने कहा कि किसानों की मेहनत और सरकारी योजनाओं के लाभ के कारण ऐसी स्थिति हासिल की जा सकी है। किसान नीतीश कुमार ने कहा कि उन्होंने खेत में गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट, वॉम स्टार सहित कई मिश्रणों का इस्तेमाल किया।
गौरतलब है कि नालंदा में राज्य जैविक सब्जी प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत 2,500 हेक्टेयर में किसानों को जैविक उत्पादन क्रय करने का लाभ दिया जा रहा है। आलू उत्पादन का यह रिकार्ड अन्य किसानों के बीच व्याप्त कई भ्रांतियों को दूर करेगा।
नालंदा प्रगतिशील किसान संघ के राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि नालंदा में किसानों में खेती के प्रति जागरूकता पैदा हुई है। उन्होंने कहा कि कल तक जो लोग पलायन कर रहे थे, वे अब घर लौटकर खेती कर रहे है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार को बिहार विधानसभा में नालंदा के किसानों को आलू उत्पादन में रिकार्ड बनाने के लिए बधाई दी। उन्होंने सदन को सूचित किया कि नालंदा के किसानों ने जैविक खेती के जरिए प्रति हेक्टेयर 729 क्विंटल आलू का उत्पादन किया है। अब तक यह रिकार्ड हॉलैंड के नाम था, जहां प्रति हेक्टेयर 535 क्विंटल आलू का उत्पादन हुआ था। उल्लेखनीय है कि देशपुरवा के किसानों ने श्रीविधि तकनीक से धान का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 224 क्विंटल तक पहुंचा दिया है, जबकि पारंपरिक तरीके से यहां प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन 80 क्विंटल होता था। नालंदा के जिलाधिकारी भी मानते है कि केवल देशपुरवा के निवासी ही नहीं, बल्कि जिले के सैकड़ों किसान उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि कर रहे है। उन्होंने कहा कि पहले तो किसान पारंपरिक खेती को छोड़ने और आधुनिक तकनीक अपनाने को तैयार ही नहीं थे, परंतु प्रशासन द्वारा नई तकनीक से होने वाले नुकसान की भरपाई किए जाने के वादे के बाद किसान तैयार हो गए और अब नतीजा सबके सामने है।

बिहार में लगातार बढ़ रहे हैं निवेश के प्रस्ताव


पटना। बिहार में पिछले कुछ वर्षो से निवेश प्रस्तावों की संख्या में वृद्धि दर्ज की जा रही है। सरकार को अब आशा है कि निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए किए जा रहे कार्यो के कारण अब देश-विदेश के नामी-गिरामी निवेशक भी बिहार की ओर उन्मुख होंगे। पिछले छह वर्षो के दौरान राज्य निवेश प्रोत्साहन परिषद द्वारा कुल 603 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है तथा पिछले छह माह में निवेशकों के 117 प्रस्तावों को हरी झंडी दी गई है।
 निवेश के लिए रोड मैप है तैयार
 एसोसिएट चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने भी बिहार में निवेशकों में बड़े-बड़े उद्योगपतियों को लाने की योजना तैयार की है। बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष ओपी साह ने बताया कि औद्योगिक प्रोत्साहन नीति 2011 के बिहार में आने के बाद निवेशकों में राज्य के प्रति आकर्षण बढ़ा है। वह कहते हैं कि बिहार में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए लगातार बड़े शहरों और विकसित राज्यों में सेमिनार किया जा रहा है। गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली से लगातार उद्योगपतियों को लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि एसोचैम के साथ मिलकर अगले पांच वर्षो में जमीनी निवेश का (रोड मैप) तैयार किया गया है तथा इन्वेस्ट मार्ट के जरिये भी निवेशकों को आमंत्रित किया जाएगा। वह कहते हैं कि बिहार में उद्योग के प्रति बना अनुकूल माहौल और स्वच्छ प्रशासन के कारण निवेशकों की भी दिलचस्पी बढ़ी है।
 बिहार में निवेश की है काफी संभावनाएं
 ओपी साह कहते हैं उद्योग लगाने में समय लगता है इस कारण जिन प्रस्तावों पर सहमति मिल रही है उसे सरजमीं पर उतारने में समय लगेगा। हालांकि सरकार का प्रयास है कि जल्द से जल्द निवेशकों की परियोजनाएं धरातल पर आ जाएं। दिल्ली में पिछले वर्ष तीन दिवसीय प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन किया गया था। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बिहार के बदलते माहौल में प्रवासी भारतीय को निवेश के लिए आकर्षित करना एवं राज्य में अधिकाधिक पूंजी निवेश का मार्ग बनाना है। साह के मुताबिक एसोचैम ने भी बिहार में 14 क्षेत्रों में उद्योग-धंधों के विकास की अपार संभावनाएं बताई हैं। इनमें तांबे का बर्तन, खाद्य उत्पाद, गन्ना, मखाना, पेंटिंग, चमड़े के चप्पल-जूते, सिल्क हैंडलूम जैसे उद्योग प्रमुख हैं। एसोचैम की नजर में बिहार भी अब निवेश योग्य राज्य है।
 117 प्रस्तावों को सहमति मिली
 बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के सत्ता में आने के बाद निवेशकों के प्रस्तावों में तेजी आई। राज्य निवेश प्रोत्साहन परिषद के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2011 से जून 2011 तक परिषद द्वारा 63 प्रस्तावों को सहमति मिली, जबकि जुलाई 2011 से जनवरी 2012 तक निवेशकों के 117 प्रस्तावों को हरी झंडी दी गई। उद्योग विभाग के एक अधिकारी मानते हैं कि केवल निवेशकों के प्रस्ताव ही नहीं प्राप्त हो रहे हैं, बल्कि सरजमीं पर उनके उत्पादन भी शुरू हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक लगभग 60 से अधिक इकाइयों में उत्पादन कार्य शुरू हो गया है जबकि 120 इकाइयों में कार्य प्रगति पर है। अधिकारी बताते हैं कि इस वर्ष 50 इकाइयों में उत्पादन शुरू होने की संभावना है। वह कहते हैं कि परिषद द्वारा जिन 603 प्रस्तावों पर सहमति दी गई है, उसमें करीब तीन लाख करोड़ रुपये का निवेश होने की संभावना है।

Friday, 22 June 2012

प्रोफेसर साहब की अब हर दिन बनेगी हाजिरी

मुजफ्फरपुर, जाप्र : प्रोफेसर साहब को अब हर दिन कॉलेज जाना पड़ेगा। कॉलेज में घंटी रहे ना रहे, उन्हें कॉलेज जाना पड़ेगा। सरकार उनकी उपस्थिति को लेकर सख्त है। शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव एस शिव कुमार ने हाजिरी व्यवस्था को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया है। विभाग के निर्णय से कॉलेज शिक्षकों की बेचैनी बढ़ गयी है।
क्या है हाजिरी व्यवस्था : कॉलेज आने वाले शिक्षकों को हर दिन हाजिरी बनाना होगा। उपस्थिति पंजी में आने-जाने का समय अंकित होगा। इसे प्राचार्य द्वारा मुख्यालय को उपलब्ध कराया जाएगा।
केके पाठक ने की थी व्यवस्था
पूर्व शिक्षा सचिव केके पाठक ने इस व्यवस्था की शुरुआत की थी। हाजिरी को प्रत्येक दिन प्राचार्य विभाग को प्रेषित करते थे। इस भय से कॉलेजों की शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार शुरू हो गई थी। लेकिन उनका तबादला होते ही व्यवस्था ठंडे बस्ते में चली गई।
फिर से क्यों देना पड़ा आदेश प्रधान सचिव की अध्यक्षता में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा व मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के अंगीभूत महाविद्यालयों के प्राचार्यों की बैठक हुई थी। इसमें खुलासा हुआ कि प्रोफेसर हाजिरी नहीं बनाते हैं। इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए प्रधान सचिव ने कहा कि हर हाल में हाजिरी व्यवस्था सुनिश्चित कराई जाए।

वृक्षारोपण अभियान पर जोर

मनरेगा के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की योजना शुरू की जाएगी। जिला स्तर पर इसका पर्यवेक्षण होगा और इस हेतु नियंत्रण कक्ष कार्यरत रहेगा। जिले के प्रभारी मंत्री सह खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्याम रजक की अध्यक्षता में अनुमंडल कार्यालय खिजरसराय के सभागार में आयोजित बैठक में उपरोक्त निर्णय लिया गया। जिलाधिकारी ने उस योजना में विकलांग और विधवाओं को लगाने पर जोर दिया। उन्होंने इनकी सूची की मांग की।
इंदिरा आवास योजना की समीक्षा के क्रम में द्वितीय किस्त की राशि शीघ्र देने एवं अपूर्ण योजनाओं को पूरा करने का निदेश दिया गया। मंत्री ने विद्युत विभाग के अभियंताओं को क्षेत्र में जाकर लोगों की समस्याएं दूर करने को कहा। उन्होंने आईसीडीएस की समीक्षा के दौरान कहा कि सीडीपीओ ओर महिला पर्यवेक्षिकाएं क्षेत्र में निर्भिक होकर काम करें। उन्होंने कहा कि यदि कोई उन्हें धमकी देता हे तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होगी।
आपूर्ति विभाग की समीक्षा के क्रम में बताया गया कि अनुमंडल में 90 प्रतिशत कूपन का वितरण हुआ है। चारों प्रखंडों में गेहूं अधिप्राप्ति का कार्य भी चल रहा है। किरासन तेल का उठाव अद्यतन है। सामाजिक सुरक्षा की समीक्षा के दौरान बताया गया कि अनुमंडल का लक्ष्य पूरा हो गया है। मंत्री ने कहा कि विधवा पेंशन हेतु मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में पदाधिकारी लाभुक को सहयोग करे।
मंत्री को बैठक में बताया गया कि मध्याह्न भोजन योजना के तहत सभी विद्यालयों में चावल बंट गया है तथा पैसा ट्रांसफर कर दिया गया है। मंत्री ने इस बात की आवश्यकता जताई कि मध्याह्न भोजन बने और सही बच्चों को मिले। बैठक में कन्या विवाह योजना, नियमित टीकाकरण आदि की भी समीक्षा की गई और महत्वपूर्ण निदेश दिए गए। बैठक में विधायक एवं विधान पार्षद, जिलाधिकारी, अपर समाहत्र्ता, नीमचक बथानी के अनुमंडल पदाधिकारी, डीसीएलआर एव अन्य पदाधिकारीगण, विभिन्न विभागों के पदाधिकारी एवं अन्य लोग उपस्थित थे।
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आरटीआई का लाभ उठाएं ग्रामीण : मंत्री
गया: सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी होने पर लिखित रूप से शिकायत करें, कार्रवाई जरूर होगी। उपरोक्त बात खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग सह गया जिला प्रभारी मंत्री श्याम रजक ने उवि खिजरसराय में आयोजित जनता दरबार में शुक्रवार को कही। उन्होंने आम जनता की शिकायतें सुनने के क्रम में सेवा का अधिकार अधिनियम का लाभ उठाने को कहा। मनरेगा के तहत जेसीबी से कार्य कराए जाने की शिकायत पर जांच के आदेश दिए गए।
उन्होंने जनता दरबार में शिक्षा ऋण की मांग करने वाले एक विद्यार्थी को 23 जून को गया में लगने वाले ऋण शिविर में आने को कहा। रोनिया पंचायत के एक परिवादी द्वारा यह शिकायत करने पर कि विकास मित्र द्वारा 50 रुपये लेकर कूपन दिया जाता है, विकास मित्रों के कार्य की समीक्षा का आदेश दिया गया। इसके बाद ही उनके नियुक्ति का पुनर्नवीनीकरण होगा। मंत्री द्वारा कुतुलपुर मवि में भवन संबंधी कार्य कराने का निदेश दिया गया।
जनता दरबार में शिक्षा, बिजली, मध्याह्न भोजन योजना, इंदिरा आवास, आपूर्ति, स्वास्थ्य, विकास, आईसीडीएस आदि से संबंधित अनेक मामले आए जिन पर त्वरित कार्रवाई करने का निदेश संबंधित पदाधिकारियों को दिया गया। इस अवसर पर कृष्णनंदन यादव एवं विधान पार्षद अनुज कुमार सिंह उपस्थित थे। साथ ही डीएसम, एडीएम सहित कई प्रशासनिक एवं पुलिस पदाधिकारी उपस्थित थे।

history of bihar

बिहार, बुद्ध की प्राचीन भूमि, भारतीय इतिहास का स्वर्णिम दौर देखा गया है. यह वही देश है जहाँ पहले गणराज्य के बीज बोया गया और जो लोकतंत्र की पहली फसल की खेती की जाती है.इस तरह की उपजाऊ मिट्टी है कि जो देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ज्ञान और ज्ञान का प्रकाश फैला innumerous बुद्धिजीवियों को जन्म दिया है. राज्य पटना, जो कि पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है पर इसकी राजधानी है. राज्य के रूप में यह आज है बंगाल के प्रांत से अपनी विभाजन से आकार का है और सबसे हाल ही में आदिवासी दक्षिणी क्षेत्र की जुदाई के बाद अब झारखंड बुलाया.


प्राचीन इतिहासवर्तमान में बिहार के रूप में जाना जाता है बड़े पैमाने पर भूमि का इतिहास बहुत प्राचीन है. वास्तव में, यह मानव सभ्यता के बहुत सुबह तक फैली हुई है. जल्द से जल्द मिथकों और हिंदू धर्म सनातन धर्म (अनंत) के दिग्गजों - बिहार के साथ जुड़े रहे हैं. भगवान राम की पत्नी सीता, बिहार की राजकुमारी थी. वह राजा जनक Videha की बेटी थी. मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, मधुबनी, दरभंगा और की वर्तमान जिलों, उत्तर - मध्य बिहार, निशान इस प्राचीन राज्य. सीतामढ़ी की वर्तमान छोटी बस्ती यहाँ पर स्थित है. पौराणिक कथा के अनुसार, सीता का जन्मस्थान Punaura, सीतामढ़ी, जिले के मुख्यालय के पश्चिम तरफ स्थित है. राजा जनक की राजधानी है, और जगह है जहां भगवान राम और सीता की शादी कर रहे थे, जनकपुर, नेपाल में सीमा पार स्थित है. पूर्वोत्तर रेलवे के दरभंगा खंड - यह Janakapur रोड के रेल स्टेशन के सीतामढ़ी जिले में स्थित है, Narkatiyaganj पर के माध्यम से पहुँचा है. यह महज संयोग नहीं है, इसलिए, कि हिंदू महाकाव्य के मूल लेखक - रामायण - महर्षि वाल्मीकि - प्राचीन बिहार में रहते थे. वाल्मीकि नगर के एक छोटे शहर और पश्चिमी चंपारण जिले, उत्तर पश्चिमी बिहार में Narkatiyaganj के रेलवे स्टेशन के करीब में एक रेलवे स्टेशन है. शब्द चंपारण चंपा - arnya, या सुगंधित चंपा (मैगनोलिया) पेड़ के एक जंगल से व्युत्पन्न है.
और बौद्ध धर्म के महान धर्म का जन्म हुआ, यह यहाँ कि राजकुमार गौतम ज्ञान प्राप्त था, बुद्ध - वर्तमान बोध गया - मध्य बिहार में एक शहर बन गया यहाँ यह भी है कि भगवान महावीर, एक और महान धर्म, जैन धर्म के संस्थापक, पैदा हुआ था और निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त. साइट है कि pawapuri की वर्तमान शहर में स्थित है, पटना, बिहार. की राजधानी के दक्षिण पूर्व के लिए कुछ मील की दूरी पर, यह यहाँ है कि सिखों के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ और सिख संतत्व प्राप्त , कि एक गुरु बन गया है. एक सुंदर और राजसी गुरुद्वारे (सिखों के लिए एक मंदिर) उसकी याददाश्त स्मरण करने के लिए बनाया - हरमंदिर-पूर्वी पटना में स्थित है. भक्तिभाव से पटना साहिब के रूप में जाना जाता है, यह एक worhip के पाँच पवित्रतम स्थानों (तखत) सिखों के लिए है.
मगध और Licchavis के प्राचीन राज्यों, 7 8 वीं सदी ई.पू. के बारे में चारों ओर, जो प्रशासन की एक प्रणाली है कि वास्तव में statecraft के आधुनिक कला के पूर्वपुस्र्ष है, और अर्थशास्त्र के साथ statecraft के संबंध के तैयार शासकों का उत्पादन किया. कौटिल्य, अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र के आधुनिक विज्ञान के पहले ग्रंथ के लेखक यहाँ रहते थे. इसके अलावा चाणक्य के रूप में जाना, वह मगध के राजा को चतुर और चालाक सलाहकार, चंद्रगुप्त मौर्य था. चंद्रगुप्त मौर्य के एक दूत के रूप में, चाणक्य राज्य के हितों को बढ़ावा देने और भारत के उत्तर पश्चिम में बसे यूनानी आक्रमणकारियों से निपटने की खोज में दूर है और व्यापक सिंधु घाटी साथ, कूच. वह यूनानियों के आगे के हमले को रोकने में succeded. दरअसल, वह यूनानी और मौर्य साम्राज्य के बीच सौहार्दपूर्ण सह - अस्तित्व के बारे में लाया. Megasthenes, सिकंदर, सेल्यूकस Necator के एक दूत, पाटलिपुत्र में 302 ई.पू. के आसपास (पटना मौर्य पूंजी के प्राचीन नाम) रहते थे वह पाटलिपुत्र में और चारों ओर जीवन का एक इतिहास के पीछे छोड़ दिया है. यह पहली रिकॉर्ड खाते भारत में एक विदेशी यात्री से है. यह ज्वलंत मामले में पाटलिपुत्र, एक राजा अजातशत्रु द्वारा स्थापित, नदियों सोन और गंगा के संगम पर 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास शहर में जीवन की भव्यता का वर्णन है.


एक अन्य Mauryan राजा, अशोक, (भी प्रियदर्शी या Priyadassi के रूप में जाना जाता है), 270 ई.पू. के आसपास, एक लोगों के शासन के लिए फर्म सिद्धांतों तैयार करने के लिए पहली बार था. उन्होंने इन सिद्धांतों, अशोक के तथाकथित शिलालेखों, जो उसके राज्य भर में लगाए गए पत्थर के खम्भों पर खुदा था. इस स्तंभ में एक या एक से अधिक शेर जो पहियों के प्रतीकों के साथ अंकित किया गया था एक पीठ के शीर्ष पर बैठे की मूर्ति के साथ ताज पहनाया गया. शेर शक्ति के रूप में चिह्नित, पहिया सत्य का शाश्वत (अंतहीन) प्रकृति (धर्म), इसलिए नाम धर्म चक्र (या Dhamma) चिह्नित. एक कुरसी के ऊपर शेर का यह आंकड़ा, एक पहिया के शिलालेख के साथ, भारत के स्वतंत्र गणराज्य (1947) के आधिकारिक सील के रूप में अपनाया गया था. इसके अलावा, अशोक के धर्म चक्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज, भारतीय तिरंगा में शामिल किया गया था. इन स्तंभों में से कुछ के अवशेष अभी भी विद्यमान हैं, उदाहरण के लिए Lauriya नंदन गढ़ पर पश्चिमी चंपारण जिले में और वैशाली में एक ही नाम के वर्तमान जिले में. अशोक, टोलेमी और यूक्लिड के समकालीन, एक महान विजेता था. उसका साम्राज्य क्या अब उत्तर पश्चिम में पश्चिम सीमांत प्रांत (पाकिस्तान में) से बढ़ा है, उत्तर में मौजूद भारत के पूर्वी सीमाओं के लिए, और निश्चित रूप से, दक्षिण में विंध्य रेंज. अशोक बौद्ध धर्म में लोगों की बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के लिए भी जिम्मेदार था. वह इस उद्देश्य के लिए अपने बेटे, राजकुमार महेंद्र, और बेटी, संघमित्रा, श्रीलंका (प्राचीन काल में सिंहल Dweep के, और ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान सीलोन की वर्तमान देश के रूप में दूर दक्षिण के रूप में भेजा कुछ इतिहासकारों, विशेष रूप से सिंहली, महिंद्रा पर विचार और भाई और बहन के रूप में sanghmitra.
प्राचीन बिहार में भी राज्य के मामलों के मामलों में महिलाओं की स्तुति देखा. यहां यह था कि आम्रपाली, वैशाली की Lichhavis के राज्य में एक वेश्या (एक ही नाम के वर्तमान जिले), उपलब्ध है और भारी बिजली ताकतें. यह कहा कि भगवान बुद्ध, वैशाली के लिए अपनी यात्रा के दौरान, कई प्रधानों के निमंत्रण से इनकार कर दिया, और को आम्रपाली साथ रात के खाने के बजाय चुना है. कई सदियों ई.पू. के बिहारी समाज में महिलाओं की स्थिति थी!
एक छोटे से ज्ञात है, लेकिन ऐतिहासिक और archaeologically प्रलेखित घटना, इस संदर्भ में उल्लेख है. आम्रपाली के साथ अपनी यात्रा के बाद, भगवान बुद्ध कुशीनगर की ओर अपनी यात्रा (बौद्ध ग्रंथों में भी Kusinara कहा जाता है.) के साथ जारी रखा, वह नदी गंडक (भी बुलाया नारायणी, जो चंपारण की पश्चिमी सीमा के निशान एक जिले अब प्रशासकीय नियंत्रण के पूर्वी बैंकों साथ यात्रा दो पश्चिम और पूर्वी चंपारण में विभाजित) अपने समर्पित Licchavis के साथ भगवान बुद्ध की इस यात्रा में एक बैंड है. एक जगह Kesariya के रूप में जाना जाता है वर्तमान (अर्थ, पूर्व) पूर्बी चंपारण जिले में, पर, भगवान बुद्ध की रात के लिए आराम कर लिया. यहां यह था कि वह अपने चेलों को अपनी आसन्न niravana (अर्थ, मृत्यु) की खबर की घोषणा करने के लिए चुना है, और उन्हें वैशाली को वापस करने के लिए implored. Licchavis बेतहाशा रोना रोते है कि कोई भी होगा. वे लगातार छोड़ इनकार कर दिया. जिस, भगवान बुद्ध, उन्हें और खुद के बीच 3,000 फुट चौड़ा धारा बनाने के द्वारा उन्हें छोड़ने के लिए मजबूर. एक स्मारिका के रूप में वह उन्हें अपने भीख - कटोरा दे दिया. Licchavis, सबसे अनिच्छा और बेतहाशा उनके दुख व्यक्त, छुट्टी ले ली और एक स्तूप का निर्माण करने के लिए घटना का स्मरण है. भगवान बुद्ध चुना था कि उसके आसन्न निर्वाण की घोषणा करने के लिए स्थान क्योंकि, जैसा कि वह अपने शिष्य आनंद से कहा, वह जानता था कि एक पिछले जीवन में वह उस जगह है, अर्थात्, Kesariya, से एक चक्रवर्ती राजा, राजा बेन के रूप में शासन किया था. (फिर से, यह महज किंवदंती मिथक, या लोक - विद्या नहीं है बल्कि, यह एक historiclly प्रलेखित तथ्य पुरातात्विक निष्कर्षों द्वारा समर्थित है. हालांकि, न तो बुद्ध के जीवन के इस हिस्से और न ही Kesariya के छोटे से शहर, अच्छी तरह से जाना जाता है भारत या बिहार में भी.
नालंदा, दुनिया की उच्च शिक्षा की पहली सीट पर, एक विश्वविद्यालय, गुप्ता अवधि के दौरान स्थापित किया गया था. यह मध्य युग तक सीखने, जब मुस्लिम आक्रमणकारियों नीचे उसे जला की एक सीट के रूप में जारी रखा. खंडहर एक संरक्षित स्मारक है और एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल रहे हैं. एक संग्रहालय और एक शिक्षा केंद्र 'नव नालंदा महावीर - यहां स्थित हैं.
आसपास के, राजगीर, बिम्बिसार के शासनकाल के दौरान Muaryan साम्राज्य की राजधानी था. यह बार बार भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने दौरा किया था. वहाँ कई बौद्ध यहाँ खंडहर हैं. यह भी अच्छी तरह से इसके कई हॉट स्प्रिंग्स, जो दुनिया में कहीं और समान हॉट स्प्रिंग्स - जैसे, औषधीय संपत्ति है प्रतिष्ठित कर रहे हैं के लिए जाना जाता है.


मध्यकालीन इतिहासगुप्त काल - बिहार की इस गौरवशाली इतिहास 7 या 8 वीं सदी के मध्य के आसपास तक चली, जब उत्तरी भारत के सभी मध्य पूर्व से आए हमलावरों द्वारा लगभग विजय के साथ, गुप्ता राजवंश भी एक शिकार गिर गया.
मध्ययुगीन काल में बिहार भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अपनी प्रतिष्ठा खो दिया. मुगल काल में दिल्ली से unremarkable प्रांतीय प्रशासन के एक अवधि था. बिहार में इन बार के ही उल्लेखनीय व्यक्ति शेर शाह, या शेर खान सुर, एक अफगानी था. सासाराम जो अब केंद्रीय पश्चिमी बिहार में एक ही नाम का जिले में एक शहर है के आधार पर, मुगल राजा बाबर के इस जगीरदार हुमायूं, बाबर के बेटे को हराने में सफल रहा था, दो बार - एक बार चौसा और फिर, फिर से, पर कन्नौज उत्तर प्रदेश या उत्तर प्रदेश की वर्तमान स्थिति () विजय अभियान शेर शाह के माध्यम से एक क्षेत्र के शासक कि, फिर से, पंजाब को सभी तरह का विस्तार हो गया. - अशोक गुप्ता और राजाओं की परंपरा में वह एक क्रूर योद्धा लेकिन यह भी एक महान प्रशासक के रूप में उल्लेख किया गया था. भूमि सुधार के अनेक कार्य करता है उसे करने के लिए जिम्मेदार हैं. है कि वह खुद के लिए निर्मित एक भव्य समाधि के अवशेष आज के सासाराम में देखा जा सकता है (शेर शाह मकबरा.)


आधुनिक इतिहासब्रिटिश भारत के अधिकांश के दौरान बिहार के प्रेसीडेंसी बंगाल का एक हिस्सा था, और कलकत्ता से नियंत्रित किया गया था. जैसे, यह एक बहुत बंगाल के लोगों का प्रभुत्व क्षेत्र था. सभी अग्रणी शिक्षा और चिकित्सा केन्द्रों बंगाल में थे. कि पास बंगालियों अनुचित लाभ के बावजूद, बिहार के कुछ बेटों प्रमुखता के पदों के लिए अपनी बुद्धि और कठिन परिश्रम के सहारे द्वारा गुलाब. ऐसा ही एक राजेंद्र प्रसाद, की देशी Ziradei, सरन के जिले में था. वह भारत गणराज्य के पहले राष्ट्रपति बने.
जब बंगाल प्रेसीडेंसी से 1912 में अलग, बिहार और उड़ीसा एक एकल प्रांत के शामिल थे. बाद में, भारत अधिनियम 1935 की सरकार के अधीन है, श्रेणी उड़ीसा के एक अलग प्रांत बन गया है, और प्रांत बिहार के ब्रिटिश भारत के एक प्रशासनिक इकाई के रूप में अस्तित्व में आया. 1947 में स्वतंत्रता पर, बिहार राज्य, उसी भौगोलिक सीमा के साथ, 1956 तक भारत गणराज्य का एक हिस्सा है, का गठन किया. उस समय, दक्षिण - पूर्व, मुख्य रूप से पुरुलिया जिले में एक क्षेत्र को अलग किया गया था और भारतीय राज्यों के भाषायी पुनर्गठन के हिस्से के रूप में पश्चिम बंगाल में शामिल है.
बिहार के इतिहास में पुनरुत्थान भारत की आजादी के लिए संघर्ष के दौरान आया था. यह बिहार से था कि महात्मा गांधी ने उसके नागरिक अवज्ञा आंदोलन, जो अंततः भारत की स्वतंत्रता के लिए नेतृत्व का शुभारंभ किया. एक किसान, राज कुमार शुक्ला चंपारण जिले से, 1917 में, के लगातार अनुरोध पर गांधीजी चंपारण के जिला मुख्यालय मोतिहारी, को एक ट्रेन की सवारी ले लिया. यहां उन्होंने सीखा है, पहले हाथ, इंडिगो किसानों अंग्रेजों की दमनकारी शासन के तहत पीड़ित की दुखद दुर्दशा. Tumultuous स्वागत गांधीजी चंपारण में प्राप्त पर चिंतित है, ब्रिटिश अधिकारियों ने उस पर नोटिस बिहार प्रांत छोड़ना. गांधीजी का पालन करने से इनकार कर दिया, कह रही है कि एक भारतीय के रूप में वह अपने ही देश में कहीं भी यात्रा करने के लिए स्वतंत्र था. अवज्ञा के इस कृत्य के लिए वह जिला जेल में मोतिहारी में गिरफ्तार किया गया था. उसके जेल सेल, दक्षिण अफ्रीका दिनों से अपने दोस्त की मदद के साथ से, CF एन्ड्रयूज़, गांधीजी पत्रकारों और वह क्या वर्णन चंपारण में देखा भारत के वायसराय को पत्र भेजने में कामयाब रहे, और इन लोगों की मुक्ति के लिए औपचारिक मांग की. जब अदालत में पेश किया, मजिस्ट्रेट के आदेश दिए उसे जारी है, लेकिन जमानत के भुगतान पर. गांधीजी को जमानत देने से इनकार कर दिया. इसके बजाय, वह उनकी वरीयता के संकेत गिरफ्तारी के तहत जेल में रहना. गांधीजी चंपारण के लोगों से प्राप्त किया गया भारी प्रतिक्रिया पर चिंतित और ज्ञान द्वारा धमकाया है कि पहले से ही गांधीजी ब्रिटिश बागान मालिकों द्वारा किसानों के दुराचार के वाइसराय को सूचित करने के लिए प्रबंधित किया था, उसे मजिस्ट्रेट के किसी भी भुगतान के बिना मुक्त, सेट जमानत. यह स्वतंत्रता जीतने के लिए एक उपकरण के रूप में नागरिक अवज्ञा की सफलता का पहला उदाहरण था. ब्रिटिश प्राप्त, अपनी पहली नागरिक अवज्ञा की शक्ति "वस्तु सबक". यह भी ब्रिटिश अधिकारियों, पहली बार के लिए पहचान, कुछ परिणाम के एक राष्ट्रीय नेता के रूप में गांधीजी. राज कुमार शुक्ला क्या शुरू कर दिया था, और चंपारण की भारी प्रतिक्रिया लोग गांधी जी को दिया, भारत भर में अपनी प्रतिष्ठा पहुंचा दिया. इस प्रकार, 1917 में, बिहार के दूरदराज के एक कोने में, कि अंततः 1947 में भारत की स्वतंत्रता के लिए नेतृत्व में घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू की.
पुरस्कार सर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म जीतने, "गांधी", प्रमाण के अनुसार, कुछ लंबाई में, ऊपर प्रकरण को दर्शाया गया है. (राज कुमार शुक्ला इस फिल्म में अपने नाम से उल्लेख नहीं है, तथापि.) यहाँ दो छवियों को उस फिल्म से हैं. गांधीजी के पीछे सिर्फ दाढ़ी वाले सज्जन, बाईं तरफ के चित्र में, और सही में हाथी पर, राज कुमार शुक्ला है.
गांधीजी, उसके सामान्य मज़ाक कर रास्ते में टिप्पणी की, था कि चंपारण में वह "बस के रूप में बैलगाड़ी के रूप में आम हाथियों पाया (अपनी जन्मभूमि) गुजरात"!!
यह स्वाभाविक था, इसलिए है कि बिहार से कई लोग स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में अग्रणी प्रतिभागियों बन गया. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से ऊपर उल्लेख किया गया है. एक और जे प्रकाश नारायण, प्यार से जेपी बुलाया गया था. जेपी आधुनिक भारतीय इतिहास के लिए पर्याप्त योगदान 1979 में अपनी मृत्यु तक जारी रखा. यह वह कौन steadfastly और staunchly इंदिरा गांधी और उसके छोटे बेटे संजय गांधी के निरंकुश शासन का विरोध किया था. लोग उसका विरोध करने के लिए प्रतिक्रिया के डर से, इंदिरा गांधी उसे राष्ट्रीय आपातकाल शुरुआत की घोषणा 26 जून, 1975 की पूर्व संध्या पर गिरफ्तार किया था. वह तिहाड़ जेल में रखा गया था, दिल्ली, जहाँ कुख्यात अपराधियों को जेल में बंद कर रहे हैं के पास स्थित है. इस प्रकार, स्वतंत्र भारत में इस septuagenerian,, जो इंदिरा गांधी के पिता, जवाहर लाल नेहरू के साथ - साथ भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ा था एक उपचार ब्रिटिश क्या बाहर 1917 में चंपारण में गांधीजी के प्रति किया था से भी बदतर था प्राप्त किया, उसके बोल रहा है के लिए उत्पीड़न के खिलाफ बाहर . जेपी से आंदोलन शुरू कर दिया है, तथापि, एक को समाप्त करने के लिए इमरजेंसी लाया, इंदिरा गांधी और उसके चुनाव में कांग्रेस पार्टी की भारी हार के लिए नेतृत्व किया, और, एक सरकारी गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की स्थापना के लिए दिल्ली में, पहली बार के लिए. जेपी के आशीर्वाद के साथ, मोरारजी देसाई भारत की चौथी प्रधानमंत्री बने. भारत के बाद नेहरू - जेपी जनता पार्टी और बाद गांधी की अंतरात्मा की आवाज बने रहे. वह सभी भारतीयों के लिए एक फोन दे दिया लोकतंत्र के पक्ष में तानाशाही "को नष्ट करने और गुलामी से आजादी" के बारे में लाने की दिशा में निरंतर काम. अफसोस की बात है, जल्द ही शक्ति प्राप्त करने के बाद, bickerings जो प्रधानमंत्री के रूप में श्री देसाई के इस्तीफे के नेतृत्व में जनता पार्टी के नेताओं के बीच शुरू हुआ. जेपी "कुल क्रांति (sampporna क्रांति) के लिए अपने फोन के साथ जारी रखा, लेकिन वह 1979 में बंबई में एक अस्पताल में गुर्दे की विफलता के लिए झुक.
जनता दल - जनता पार्टी के में बाद bickerings के एक पृथकतावादी राजनीतिक पार्टी के गठन के लिए नेतृत्व किया. यह राजनीतिक दल दिल्ली, तथाकथित, संयुक्त मोर्चा में वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन के एक घटक इकाई है. इस पार्टी से भी था कि लालू प्रसाद यादव, बिहार के मुख्यमंत्री चुने गए थे. कलह जारी रखा. श्री यादव के नेतृत्व में एक नई पार्टी के रूप में गठन किया गया था - राष्ट्रीय जनता दल - जो बिहार में लगभग 15 वर्षों के लिए शासन पर चला गया.
यह भी एक समय था जब हिंदी साहित्य राज्य में पनपने आया था. राजा राधिका रमण सिंह, शिव पूजन सहाय, दिवाकर प्रसाद Vidyarthy, रामधारी सिंह दिनकर, राम Briksha Benipuri, दिग्गज जो हिन्दी साहित्य, जो एक लंबा इतिहास के ज्यादा नहीं था के फूल के लिए योगदान की कुछ कर रहे हैं. हिन्दी भाषा, निश्चित रूप से अपनी साहित्य, आसपास देर से उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरू हुआ. यह भारतेंदु बाबू Harischandra (उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निवासी) नाटक "Harischandra" की उपस्थिति द्वारा चिह्नित है. देवकी नंदन खत्री इस समय के दौरान हिन्दी में अपने रहस्य उपन्यास लेखन (Chandrakanta, Chandrakanta Santati, Kajar की कोठारी, भूतनाथ, आदि) वह मुजफ्फरपुर में बिहार में जन्म हुआ था और वहां उसके पहले शिक्षा था शुरू किया. वह तो गया में बिहार में Tekari एस्टेट के लिए ले जाया गया. बाद में उन्होंने बनारस (अब वाराणसी) के राजा वह "Lahari" नामक एक मुद्रण प्रेस है जो हिंदी के प्रकाशन मासिक, "सुदर्शन", 1898 में शुरू हुआ शुरू की एक कर्मचारी बन गया. हिंदी में पहली लघु कहानियों की बहुत पहले अगर नहीं, एक, "इन्दुमति" पंडित Kishorilal गोस्वामी द्वारा लिखा है, जो 1900 में प्रकाशित किया गया था.
निष्कर्षइसकी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए, बिहार संपत्ति यह समय द्वारा उपहार में दिया है पर गर्व महसूस करता है. और कला - साहित्य और धर्म और अध्यात्मवाद के क्षेत्र में अपनी नैतिक योगदान के लिए, यह पता नहीं प्रतियोगियों के सदियों पुराने इस भूमि से संबंधित कहानियाँ आज भी बताया जाता है. राज्य में एक ही राज्य है, जो एक समय पर एक बार पड़ोसी देशों के रूप में के रूप में अच्छी तरह से देश पर शासन किया है. कई महान शासकों यहाँ रहता है और यह हमें गर्व की भावना से भर जाता है जब हम बुद्ध और महावीर की Karmabhumi 'के रूप में बिहार के बारे में सोचो. बिहार, जो देश के गौरवशाली कहानी बच, शब्द कम होना.
 

Thursday, 21 June 2012

बिहार का एक और छोरा बना केबीसी-5 में 'करोड़पति'

लोकप्रिय टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति पर एक और प्रतियोगी ने बड़ा इनाम जीता है। बिहार में पटना के रहने वाले अनिल कुमार सिन्हा ने शो पर एक एक करोड़ रुपए जीते हैं। इसे नौ नवंबर को टीवी पर दिखाया जाएगा।


अनिल कुमार सिन्हा यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया में काम करते हैं। पुरस्कार जीतने के बाद पत्रकारों से बातचीत में अनिल ने कहा, “मैं 11 सालों से कोशिश कर रहा था पर मौका नहीं मिल रहा था। लेकिन मैं निराश नहीं हुआ, मैं हमेशा पॉज़िटिव सोचता हूँ, मेरा बल्ड ग्रुप भी बी पॉज़िटिव है। प्रतिभा कभी भी समय और जगह की मोहताज नहीं होती है।”


अभी कुछ दिन पहले ही कौन बनेगा करोड़पति पर एक प्रतियोगी सुशील कुमार ने पाँच करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि जीती है। सुशील का नाता भी बिहार से है। वे चंपारण से आते हैं और पेशे है शिक्षक हैं।


कौन बनेगा करोड़पति के विभिन्न संस्करणों को मिला लें तो 11 सालों में अनिल शो के सातवें करोड़पति हैं। शो के निर्माता सिद्धार्थ बासू ने बताया कि अनिल ने बहुत अच्छे से सवालों के जबाव दिए।
: सूबे के श्रम संसाधन मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल ने कहा कि बिहार हरित क्रांति की ओर बढ़ रहा है। किसान जोर लगाएंगे तो हरित क्रांति आ सकती है। स्थानीय राजेन्द्र स्टेडियम में सिग्रीवाल दो दिवसीय कृषि यांत्रिकी मेला का उद्घाटन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि किसान मेला में अधिक से अधिक लाभ लें। किसान को अनुदानित दर पर कृषि यंत्र मुहैया कराने के लिए मेला आयोजित किया गया है। मेला में श्रम संसाधन मंत्री ने किसानों को 51 महेन्द्र ट्रैक्टर एवं 4 जान डीयर ट्रैक्टर की चाबी दी। मेला में पौधा संरक्षण पदाधिकारी अजय कुमार वर्मा ने किसानों को कीटनाशक के प्रयोग विधि की जानकारी दी। इसके पूर्व संयुक्त कृषि निदेशक अरूण कुमार व उप संयुक्त कृषि निदेशक शिवदत्त सिन्हा ने बुके देकर मंत्री को सम्मानित किया।
मेला में आये किसानों ने बाजार से अधिक मूल्य में समान देने की भी शिकायत की। बसाढ़ी के किसान गुड्डू सिंह ने कहा कि मेले को पंपसेट 23-25 हजार में मिल रहा है। वह बाजार में 15 हजार रुपये में उपलब्ध है। दाम बढ़ाकर अनुदान दिया जा रहा है। जिससे किसानों को 2-3 हजार का घाटा लग रहा है। महाजी के कृष्णा सिंह ने कहा कि फार्म ही नहीं मिल पा रहा है। पकड़ीडीह के भृगुनाथ सिंह ने कहा कि मेला दिखा है। मनोहरपुर के सभापति यादव व अखिलेश्वर राय ने कहा कि मेला में जिंक तक नहीं मिल रहा है। असांव के चन्द्रिका भारती ने कहा कि किसानों को सिर्फ धोखा दिया जा रहा है। कृषि मेला में कृषि पदाधिकारी सुरेन्द्र नाथ उद्यान पदाधिकारी विनोद कुमार महेन्द्रा ट्रैक्टर के प्रोपराइटर उमाकांत सिंह सोलंकी व जान डीयर ट्रैक्टर के प्रोपराइट कन्हैया सिंह उपस्थित थे।

विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व प्रधानाध्यापक व प्रसिद्ध समालोचक डा. मैनेजर पांडेय ने कहा है कि बिहार आधुनिक साहित्य का क्रांति क्षेत्र है। यहां के साहित्य के नवजागरण की पुर्नव्याख्या करनी होगी।
श्री पांडेय गुरुवार को जेपीविवि के सीनेट हाल में हिंदी विभाग के दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में बोल रहे थे। संगोष्ठी का विषय आधुनिक हिंदी साहित्य और बिहार था। उन्होंने कहा कि बिहार के साहित्य के शोध एवं अध्ययन के लिए सार्थक योजना बननी चाहिए। बिहार के लोग को अपनी समृद्ध साहित्यिक थाती पर गर्व करना चाहिए। उससे सहेजने का उपाय करना चाहिए।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. डा. वीरेन्द्र नारायण यादव ने कहा कि बिहार के साहित्य का पुर्नमूल्यांकन की आवश्यकता है।
इसके पूर्व के सत्र में बिहार में रचे गऐ गद्य साहित्य नाटक, उपन्यास, कहानी एवं अनुवाद साहित्य पर चर्चा हुयी। शांति निकेतन से पधारे डा. रामेश्वर मिश्र ने खड़ी बोली के आंदोलन के कालखंड की चर्चा की। डा. राहुल सिंह मैनेजर पांडेय, नलिन विलोचन शर्मा तथा सुरेन्द्र चौधरी में आलोचना कर्म पर प्रकाश डाला। रांची विश्वविद्यालय के प्रो. जंगबहादुर सिंह ने बिहार एवं झारखंड के उपन्यासकारों के बारे में विमर्श पर प्रकाश डाला। आचार्य डा. शकुंतला मिश्र ने दलित साहित्य चिंताओं को रखा। कुमारी मनीषा ने हिंदी साहित्य की बिहार की देन पर चर्चा की। डा. सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि आने वाला समय एवं साहित्यिक स्पेस बिहार का है और बिहार को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। समापन सत्र का संचालन डा. लालबाबू यादव ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डा. ऊषा कुमारी ने किया। संगोष्ठी में प्रति कुलपति डा. दिनेश प्रसाद सिन्हा, कुलसचिव प्रो. विजय प्रताप कुमार, जगदम कालेज के प्राचार्य डा. प्रमेन्द्र रंजन सिंह, डा. हारून शैलेन्द्र, डा. जितेन्द्र वत्स, रमेश ऋतम्भरा, डा. ललन प्रसाद यादव, डा. योगेन्द्र प्रसाद यादव, प्रो. डा. राजू प्रसाद, कालेज इंसपेक्टर डा. नंदकुमार सिंह, डा. अजय कुमार, डा. श्यामसुंदर प्रसाद, डा. जयराम सिंह, डा. आरएन राय, ब्रजकिशोर सिंह, डा. मनोज कुमार सिंह, मृत्युंजय कुमार सिंह, श्यामशरण आदि उपस्थित थे।

यूपी की सीमा के लोग बिहार की सड़कों पर चुटकी लेते थे और हंसते थे, पर आज स्थितियां बदल चली हैं।

सिताबदियारा (सारण), नि.प्र.: एक समय था जब यूपी की सीमा के लोग बिहार की सड़कों पर चुटकी लेते थे और हंसते थे, पर आज स्थितियां बदल चली हैं। इसका एक स्पष्ट उदाहरण है मांझी का जयप्रभा सेतु। इस सेतु से आवागमन करने वाले राहगीर यूं ही जान लेते हैं कि अब यूपी पीछे छूट गया। दरअसल यहां की तस्वीर ही कुछ ऐसी दिखाई देती है।
मांझी के इस सेतु पर जाएं तो जहां से बिहार की सीमा शुरू हो रही है वहां एक बड़ा गेट लगा है जिस पर लिखा है- बिहार राज्य में आपका स्वागत है। यहां से शुरू सड़कें भी चमचमाती नजर आएंगी। सड़क किनारे बनी रेलिंग अलग सुंदरता बयां करती है। वहीं पलट यूपी की सीमा जहां से शुरू है वहां से सड़कें यूं ही बिखरे हाल में दिखाई देने लगती है। एनडीए शासनकाल में बिहार की बदलती तस्वीर देख सभी ताज्जुब में हैं।
सबसे लंबी अवधि में बना जयप्रभा सेतु
मांझी के इस जयप्रभा सेतु को सबसे लंबी अवधि में बनने का भी गौरव प्राप्त है। जानकारों के मुताबिक इस सेतु का शिलान्यास वर्ष 1986 में किया गया था। इस पर परिचालन का कार्य वर्ष 2006 में शुरू हुआ। इनसे अलग यह सेतु परिचालन के कुछ ही दिनों बाद मरम्मत के अभाव में बिखरा-बिखरा नजर आने लगा। सेतु पर जहां-जहां पायों का ज्वाइंट है, वहां सड़क पर गड्ढा बन गया है, पुल के बैरिंग कोट भी कट गए हैं।
बिना लोकार्पण ही दौड़ने लगे वाहन
मांझी में यूपी-बिहार की सीमा पर निर्मित जयप्रभा सेतु एक अकेला सेतु है, जिसका न तो उद्घाटन हुआ न लोकार्पण और वाहनों का परिचालन शुरू हो गया। इलाकाई जानकार बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर इसका लोकार्पण प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कराना चाहते थे, लेकिन वे खुद ही अस्वस्थ होकर स्वर्ग सिधार गए। तब से यह मामला ही ठंडा पड़ गया। वैसे यहां परिचालन के साथ पुल किराया वसूली का बेरियर भी यूपी वाले सिरे पर लगा दिया गया है। यहां वसूली किसके निर्देश पर होती है, इस बात को वहां मौजूद कर्मचारियों से पूछने पर वे कन्नी काट गए और कुछ भी बताने से स्पष्ट मना इनकार कर दिया।

बिहार में हो रहा सड़कों का विकास

मधुबनी, निज संवाददाता : मधुबनी के सांसद हुक्मदेव नारायण यादव ने कहा है कि बिहार में तेजी से सड़कों का विकास हो रहा है। वर्तमान बिहार सरकार के द्वारा प्राथमिकता के तौर पर सड़कों का विकास किया जा रहा है। जिससे सुदूर गांवों के लोग मुख्य सड़क से जुड़ रहे हैं। ये बातें मंगलवार को भाजपा कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में कही।
श्री यादव ने कहा कि गत तीन साल में मेरे सांसद कार्यकाल में मधुबनी लोक सभा क्षेत्र में 85 प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क का शिलान्यास कर कार्यारंभ किया गया है। नावार्ड से निर्मित होने वाले आधा दर्जन सड़कों का शिलान्यास किया जो पूर्ण होने की स्थिति में है। 175 प्रधान मंत्री सड़क का बिहार व केंद्र सरकार द्वारा डीपीआर बनाकर स्वीकृति के लिए भेज दिए गए हैं। मधुबनी में संगठन के लोग विकास कार्य पर ध्यान रखें। कहा कि बिहार सरकार की ऐसी योजना है कि सभी गांवों को एसएच , एनएच व एक्सप्रेस हाइवे से जोड़ दिए जाएं। जिससे मिथिला का देश के हर भाग से जुड़ाव हो जाएगा।
श्री यादव ने कहा कि जो कोई भी यह बात उठाते हैं कि केंद्र के पैसे से विकास हो रहा है वह बिहार के साथ गद्दारी कर रहे हैं। उन्हें यह जान लेना चाहिए की राज्य सरकार जो भी अंशदान देती है उसी के अनुसार केंद्र भी पैसा देता है। खैरात में राज्य सरकार को पैसा नहीं मिल जाता। कहा कि खुफिया एजेन्सियों ने भारत नेपाल सीमा के 20 किलोमीटर भीतर आईसएसआई ने जाल फैलाने की जानकारी दे रखी है। संसद में गृह मंत्री ने मेरे प्रश्न की उत्तर में जानकारी दी की देश के कई भागों में हो रहे आतंकी गतिविधियों में दरभंगा व मधुबनी से जुड़ाव पाए गए हैं। जिस पर स्थानीय पुलिस के सहयोग से कुछ गिऱफ्तारी भी की गई है। कहा कि किसी भी नेता को वोट के लिए ऐसे बयान नहीं देनी चाहिए की एक ही संप्रदाय के नौजवानों की गिरफ्तारी की जा रही है। ऐसे नेताओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि देश की एकता व संप्रभूता को उनके बयान से आघात न लगे। बिहार आज सामाजिक व आर्थिक विकास की ओर सारी जटिलताओं, बाधाओं को पार करते हुए आगे की ओर अग्रसर है। ऐसी परिस्थिति में सिर्फ वोट के लिए बिना सोचे समझे बयान दे देना सही नहीं है। प्रेस वार्ता में पूर्व विधायक रामप्रीत पासवान, जिला उपाध्यक्ष शंकर झा, सांसद प्रतिनिधि देवेंद्र यादव भी उपस्थित थे।

विकास पथ पर बिहार, बदलते दौर में नई कवायद

बिहार। आज बिहार के लोगों के पास एक उम्मीद हैं, एक लक्ष्य हैं। बिहार विकास की दिशा पर चल पड़ा है। बिहार की नई सुबह हो चुकी है और इस नई सुबह में एक नई रौशनी हैं, नई उम्मीदें हैं। इस राज्य ने ना केवल आर्थिक व औद्योगिक क्षेत्र में ही विकास किया हैं बल्कि सांस्कृतिक क्षेत्र में भी विकास हुआ हैं। लोगों की जीवनशैली में भी विराट परिवर्तन हुआ हैं। शिक्षा से लेकर मनोरंजन तक सभी क्षेत्रों में भारी बदलाव हुआ है। मल्टीप्लेक्स व बड़े बड़े शापिंग माल के बनने से कल की बिहार की तस्वीर ही बदल गई है। जैसे बिहार ने अर्थ सामाजिक व भौगोलिक क्षेत्र में अपनी विकास दर दर्ज की है, वैसे ही बिहार में निवेश की मात्रा भी बढ़ती गई है। देशी व विदेशी निवेश से सिर्फ आर्थिक विकास की स्थिति ही नहीं सुधरी है बल्कि लोगों की जीवनशैली में भी भारी बदलाव देखने को मिला है। एफडीआई में निवेश से बिहार में उद्योग की स्थिति में भी खासा बदलाव देखने को मिला है। रियल इस्टेट के क्षेत्र में पिछले साल से हो रहे निवेश से लोगों में घरेलू व कर्मशियल घरों की मांग भी बढ़ गई है।
बादल कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजर अविनाश कुमार ने कही है। राज्य सरकार द्वारा मुज्जफर नगर,भागलपुर, वैशाली, नालंदा इन जिलों में निवेश को लेकर ज्यादा उत्सुक हैं। इसके लिए सरकार ने कई कदम भी उठाए हैं। सरकार ने प्राइवेट कंपनियों को नई तरह की तकनीक व नई डिजाइनों पर आधार करके कंस्ट्रक्शन का काम करने की गुहार लगाई है। रियल इस्टेट के लिए पटना काफी उभरता शहर माना जा रहा है। पटना में निजी घर व व्यापारिक घरों की मांग में इजाफा हुआ है। एफडीआई के साथ-साथ एनआरआई के रियल इस्टेट में निवेश में बढ़ोतरी हो रही है। पटना में संपत्ति की खरीद बिक्री में ग्राहकों को काफी अच्छा रिर्टन प्राप्त हो रहा है। बड़े बड़े निवेशक बिहार के पटना में आकर हाउसिंग क्षेत्र में निवेश कर रहे हैं। इन दिनों बिहार में कई बड़े आईटी पार्क बन रहे हैं। बिहार शापिंग कंप्लेक्स व एंटरटेनमेंट का हब बन रहा हैं।
जीवनशैली व संस्कृति
राज्य में विदेशी व देशी निवेश के चलते लोगों का शहरी जीवन काफी आसान हो गया है। लोगों के पास कई तरह के साधन हो गए हैं। अब वह जब चाहे जो चाहे खरीद सकते हैं। अधिक से अधिक शापिंग माल व कंप्लेक्स बनने के कारण लोगों की जीवनशैली में काफी बदलाव आ गया है। पटना के पुराने बाजार जैसे लालजी, कुर्जी व हथवा मार्केट अब रिटेल की दुकानों में बदल गए हैं। इन मार्केटों के वातावरण में काफी बदलाव किए गए हैं। लोगों की बदलती पसंद को देखते हुए इन बाजारों में भी बदलाव किया गया हैं।
बिहार के मोतीहारी में रहने वाली एक महिला ने कहा कि अब उन्हें हर छोटी बड़ी चीज के लिए कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ती है। एक ही छत के नीचे सब मिल जाता हैं। जब मोतीहारी में पहला शापिंग माल बना तो वह काफी उत्सुक हुई और चौंक भी गई की आखिर कैसे एक ही छत के नीचे एक साथ सब कुछ मिल जाता है। इसी तरह बिहार के अन्य जिले जैसे समस्तीपुर व दरभंगा भी विकास की राह पर चल रहा है।
वायर से वायरलेस तकनीक की यात्रा
देशी व विदेशी ब्रांड के बिहार में निवेश ने बिहार में विकास की गति तेज कर दी है। पिछले तीन सालों से बिहार में ली कुपर, रीबॉक, एलैन सोली, बेलमांट, विल्स इन सब ब्रांड की ओर लोग अधिक आकर्षित हो रहे हैं। टेलिकम्युनिकेसंस व ऑटोमोबाइल उद्योग में भी विकास हुआ हैं। आर्क व‌र्ल्डवाइड कनकर्स के वाइस प्रेसीडेंट वेंके शर्मा के मुताबिक बिहार के टू टायर व थ्री टायर वाले शहरों के लोग काफी स्वस्थ्य हैं। सैमसंग इंडिया इको के डेप्युटी मैनेजिंग डायरेक्टर रविंदर जुत्सी ने कहा कि बिहार के कई जिलों में टीवी व रेफ्रीजनरेटर की मांग में इजाफा हुआ है।

 


 

सरैया (मुजफ्फरपुर), निप्र : 'कुछ करोगे तब भी मरोगे, नहीं करोगे तब भी मरोगे, इसलिए समाज के लिए कुछ करके मरो ताकि समाज तुम्हें याद करे।' उक्त बातें सूचना एवं जनसंपर्क तथा परिवहन मंत्री वृषिण पटेल ने गंडक आइबी में आयोजित दामोदर प्रसाद सिंह स्मृति समारोह को संबोधित करते हुए कही। श्री पटेल ने कहा कि ऐसा कुछ मत करो कि कुत्ते-बिल्ली की तरह समाज तुम्हें भूल जाए। शहीदे आजम भगत सिंह, बैकुण्ठ शुक्ल, योगेन्द्र शुक्ल व दामोदर प्रसाद सिंह की तरह समाज याद करे वैसा काम हर व्यक्ति को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भूलने वाला तो भगत सिंह तक को भूल गया, वैसे लोग क्या हम जैसे लोगों को याद कर पाएंगे। इसलिए पृथ्वी पर आए हो तो समाज हित में कुछ कर के ही मरना चाहिए। उन्होंने दामोदर बाबू की समाज में छोड़ी गई छाप पर विस्तृत चर्चा की। स्थानीय विधायक अशोक कुमार सिंह ने स्वतंत्रता सेनानी दामोदर प्रसाद सिंह के गुणों का बखान करते हुए उनके पदचिह्नों पर चलने की बात कही। समारोह को भाजपा किसान नेता शंभू प्रसाद सिंह, डा. चन्देश्वर ठाकुर, जदयू अध्यक्ष प्रद्युम्न कुशवाहा, रामप्रीत राय, प्रेमचन्द्र सिंह, थानाध्यक्ष संजय सिंह, अशर्फी राउत, आनंद भैरव शाही, मुखिया राजू सिंह, सुरेन्द्र राम, शशि कांत साह, ऋषभचन्द्र जैन आदि ने संबोधित किया। कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन स्व. दामोदर प्रसाद सिंह के पुत्र डा. हरि किशोर सिंह ने किया।
मुजफ्फरपुर। कहते हैं मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है। पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों में उड़ान होती है। तुर्की प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय परिसर में अवस्थित सदियों पुराने मृतप्राय हो चुके अनजान वृक्ष को टिश्यू कल्चर पद्धति से पौधे के रूप में विकसित करके इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है मुजफ्फरपुर बोटेनिकल रिसर्च इनस्टीच्यूट, भटौलिया के संस्थापक अविनाश कुमार ने। मृतप्राय हो चुके इस पौधे को तैयार करने में पंद्रह सप्ताह का समय लगा।
अफ्रीकी देशों में इसे कल्प-वृक्ष नाम से जानते हैं
बिहार प्रदेश में इस प्रकार का अनाम पेड़ का सिर्फ एक वृक्ष मुजफ्फरपुर के तुर्की में पाया गया है जो भी मृतप्राय था। इस प्रकार के पौधे मूलत: अफ्रीका के किंगडम-घ्लांति, ऑर्डर-माल्वेलाश, फैमिली-माल्वेशी और जीनस-एडेंसोनिया सहित आठ स्पेसिज में ऐसे पेड़ देखने को मिलता है। इन देशों में इस पेड़ को कल्प-वृक्ष के रूप में जाना जाता है। 

पत्ता और छाल भी है उपयोगी: इस अनाम पेड़ के पत्ते का उपयोग सब्जी बनाने एवं दवा के रूप में किया जाता हैं। इसके पत्ते को पिसकर पीने से पेट संबंधी कई बीमारियां जड़-मूल से खत्म हो जाती है। इसमें विटामिन-सी और कैल्सियम प्रचुर मात्रा में मिलता है। छाल एवं पत्ता मवेशी का दूध बढ़ाने में काफी लाभदायक है। अफ्रीका के लोग सुबह में इस पेड़ का दर्शन होना शुभ मानते है।
पौधे के साथ अविनाश कुमार
अविनाश कुमार द्वारा मृतप्राय हो चुकी अनाम पेड़ को टिश्यू कल्चर विधि से पौधा के रूप में विकसित किए जाने की गूंज लोकसभा में गूंज चुका है। वैशाली के सांसद डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने लोकसभा के तारांकित प्रश्नों के जरिये उक्त बोटेनिकल इनस्टीच्यूट को विकसित करने एवं केन्द्र सरकार द्वारा अधिकृत किए जाने की मांग कर चुके हैं।
मुजफ्फरपुर बोटेनिकल रिसर्च इंस्टीच्यूट, भटौलिया के संस्थापक अविनाश कुमार द्वारा इस पौधे को टिश्यू कल्चर विधि से विकसित करने से प्रभावित होकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सराहना कर चुके है और बिहार दिवस के मौके पर 21 मार्च 2012 को पटना गांधी मैदान में नीतीश ने अविनाश को सम्मानित किया।
पेड़ के पत्ते, तना एवं जड़ के भाग को टिश्यू कल्चर विधि से ट्रीटमेंट कर ग्रोथ-हार्मोन्स के साथ बंद टेस्ट ट्यूब के छह बोतलों में अलग-अलग डाला गया। दो सप्ताह बाद दो बोतलों में डाले गए हार्मोन्स डेड हो गए। जबकि चार बोतलों से पांचवे सप्ताह कल्चर निकला। फिर उसे सातवें सप्ताह नई बोतल में डाला गया और पंद्रह सप्ताह बाद नया पौधा तैयार हो गया। 


पटना. राज्य के एक करोड़ 37 लाख बीपीएल परिवार, लगभग 25 लाख अंत्योदय परिवार और एक करोड़ 07 लाख एपीएल परिवारों को सही मात्रा में खाद्यान्न मिल सके इसके लिए सरकार प्रतिबद्ध है। डोर स्टेप डिलीवरी में पायलट योजना के तहत सभी 38 जिलों के एक-एक प्रखंड में इसकी शुरुआत की जाएगी। ये बातें बुधवार को खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग और बिहार स्टेट फूड एंड सिविल सप्लाइज कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा जन वितरण प्रणाली के खाद्यान्नों की डोर स्टेप डिलीवरी में आने वाली समस्याओं व उनके निराकरण के लिए आयोजित कार्यशाला में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्याम रजक ने कही। उन्होंने कहा कि योजना के तहत जिन ट्रकों का इस्तेमाल किया जाएगा उनमें जीपीएस प्रणाली का होना अनिवार्य होगा। सभी ट्रक भारतीय खाद्य निगम के गोदामों से पंचायत के गोदाम तक खाद्यान्न पहुंचाएंगे। इसके बाद उस पंचायत के सभी जन वितरण प्रणाली विक्रेता अपने खाद्यान्न का उठाव कर सकेंगे। इसके अलावे जब खाद्यान्न गोदामों में पहुंच जाएगा तो लाउडस्पीकर, एसएमएस अलर्ट योजना के तहत लाभुकों को इसकी जानकारी दी जाएगी।

श्याम रजक ने बताया कि विभाग ने 15 जुलाई तक 15 लाख मिट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा है। इससे पहले 22 लाख मैट्रिक टन धान की खरीदारी हो चुकी है।

डोर स्टेप डिलीवरी योजना लागू करने के लिए पूर्व से प्रयास जारी हैं। इसके लिए जिला आपूर्ति पदाधिकारी, प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी और राज्य के 307 गोदामों में लैपटॉप प्रदान किए गए हैं। कम्प्यूटर ऑपरेटर को भी संविदा पर बहाल किया जा रहा है। इसके अलावे सभी जिलाधिकारियों से पंचायत स्तर के गोदामों तक पहुंचने के लिए रूटचार्ट उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है।