Monday, 13 August 2012

बेहद खूबसूरत हैं ये INDIAN BRIDGE, टॉप 10 में 4 हैं यहां




PICS: बेहद खूबसूरत हैं ये INDIAN BRIDGE, टॉप 10 में 4 हैं यहांपटना। देश के टॉप टेन लंबे पुलों में से 4 ब्रिज  अकेले बिहार में हैं। ये ब्रिज न सिर्फ नदियों के दो मुहानों  को जोड़ते हैं, बल्कि घंटों के सफर को चंद मिनटों में तय करा देते हैं। इनकीखूबसूरती भी ऐसी कि आप झूम  उठें।
अगर ये पुल न होते तो आज सिर्फ बिहार ही नहीं, पूरे देश की तस्वीर ही कुछ अलग  होती। बिहार भले पिछड़ा हो, लेकिन पूरे देश के विकास में इन पुलों  के योगदान को नकारा  नहीं जा सकता है। ये पुल पूरे देश में व्यवसायिक और औद्योगिक विकास की लाइफलाइन बन चुके हैं।

Tuesday, 31 July 2012

उप मुख्यमंत्री ने लिया कचरा मुक्त बिहार बनाने का संकल्प


पटना। बिहार का कचरा प्रबंधन असंतोषजनक है। कचरा प्रबंधन के लिए लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है। लोगों की मानसिकता बदलकर ही शहर को साफ सुथरा बनाया जा सकता है। यह बात गुरुवार को उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इन्वायरमेंट प्रोटेक्शन ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट(ईपीटीआरआई), हैदराबाद के तत्वावधान में आयोजित नगरी ठोस कचना व प्लास्टिक कचरा प्रबंधन विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कही।
इस मौके पर उन्होंने राज्य को साफ-सुथरा और कचरा मुक्त बनाने का संकल्प लिया और कहा कि कचरा प्रबंधन सिर्फ नगर निकायों के दम पर संभव नहीं है। कार्यक्रम में वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव दीपक कुमार सिंह, बीएसपीसीबी अध्यक्ष डॉक्टर सुभाष चन्द्र सिंह, ईपीटीआरआई केपी प्रसाद राव, डॉक्टर आशा पांडेय आदि मौजूद थे।
एसएचजी की सहायता
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि कचरा को डोर-टू-डोर जमा करने के लिए स्वयं सहायता समूह की मदद ली जा सकती है। उन्होंने कहा कि दुकानों और बहु मंजिली इमारतों को कूड़ा-कचरा डोर-टू-डोर सर्विस को देने या फिर कूड़ेदान में फेंकने के लिए बाध्य करना होगा।
कचरा प्रबंधन निजी क्षेत्र की कंपनियों को
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के सभी शहरों के कचरा प्रबंधन की जिम्मेवारी निजी क्षेत्र की कंपनियों को सौंपी जाएगी। पटना की साफ-सफाई और बैरियाचक में कचरा डिस्पोजल का जिम्मा ‘जिंदल’ नामक कंपनी को सौंपी गई है। इसके अलावा आरा, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, बिहार शरीफ, फुलवारी शरीफ और दानापुर शहरों के साफ-सफाई के लिए प्राइवेट कंपनियों से करार किया गया है।
कोई नहीं होगा बेरोजगार 

उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने नगर निकाय कर्मियों को गारंटी दिया कि साफ-सफाई क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने से उनकी नौकरी समाह्रश्वत नहीं होगी। निकायों पर कचरा प्रबंधन का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाएगा। उन्होंने कहा कि कचरा प्रबंधन कंपनियों से कचरा-छाटने के लिए रैग पिकर्स को
जोड़ा जाएगा।
भारतीय तकनीक की जरूरत 

सुशील कुमार मोदी ने कहा कि भारत में धूल ज्यादा है। यहां विदेशों से आयातित सफाई मशीनें कारगर साबित नहीं हुई है। उन्होंने सफाई व्यवस्था के लिए भारतीय परिस्थिति के अनुसार मशीनों को विकसित करने पर बल दिया।

जिले के शहरी गरीबों को भी मुफ्त इलाज

मुजफ्फरपुर, कासं : राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के तहत जिले के शहरी क्षेत्र के गरीबों का भी मुफ्त इलाज होगा। ग्रामीण बीपीएल परिवारों के साथ नगर निगम क्षेत्र के परिवारों को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है। इसके लिए 13 अगस्त को कार्यशाला आयोजित की जाएगी। इसमें जिला व प्रखंडों के अधिकारियों के अलावा मेयर व जिप अध्यक्ष भी उपस्थित रहेंगे।
जिले में इस योजना की सेवा प्रदाता बीमा कंपनी आइसीआइसीआइ लोंबार्ड के गिरिजेश शर्मा ने जिलाधिकारी संतोष कुमार मल्ल से मिलकर रूपरेखा के बारे में बातचीत की। शर्मा ने बताया कि इस वर्ष जिले के करीब 6,82,200 परिवारों को इस योजना से जोड़ा जाएगा। इसकी कवायद शुरू कर दी गई है। डाटा मिल चुका है। कार्यशाला के बाद स्मार्ट कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। अक्टूबर या नवंबर से गरीबों का आरएसबीवाई योजना से मुफ्त इलाज होने लगेगा।
गौरतलब है कि इस योजना के तहत प्रत्येक बीपीएल परिवार के सदस्यों का तीस हजार रुपये तक का इलाज मुफ्त में किया जाता है। इसमें योजना से जुड़े निजी अस्पताल भी शामिल हैं।

Friday, 20 July 2012

पांच साल में सबसे ज्यादा: 16.71 हुई बिहार की विकास दर

 
पटना। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने प्रणव मुखर्जी को बिहार का अगला पंचवर्षीय कृषि रोड मैप लॉन्च करने का न्योता दिया है। मोदी ने कहा कि प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बनने के बाद पहले दौरे पर बिहार आएं, इसका आग्रह वे करते हैं। पत्रकारों ने जब मोदी को टोका कि क्या उन्होंने भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार पीए संगमा की हार मान ली तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। थोड़ा संभलते हुए मोदी ने कहा कि सभी जानते हैं कि चुनावी गणित क्या है। चुनाव सिर्फ जीत-हार के लिए नहीं लड़ा जाता। मोदी ने अपने सरकारी आवास पर जनता दरबार में मंगलवार को सैकड़ों फरियादियों की समस्याएं सुनीं और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।
कृषि विकास दर में अव्वल 

कृषि क्षेत्र में बिहार की तरक्की की चर्चा करते हुए उपमुख्यमंत्री ने कहा कि बीते वित्तीय वर्ष में कृषि विकास दर 17.16 प्रतिशत रहा। जबकि बिहार का विकास दर 16.17 प्रतिशत रहा। जो पिछले पांच साल में सर्वाधिक है। अनाज, खासकर चावल के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के कारण ऐसा हुआ।

Thursday, 12 July 2012

उभरता बिहार – सुशासन और प्रगति की नई मिसाल या सिर्फ एक छलावा ??

कुछ समय पहले तक केवल गरीबी, भुखमरी और प्रवासन का पर्याय बन चुका बिहार, आज भारत के सबसे अधिक विकासशील राज्य के तौर पर अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट के अंतर्गत 13।1 जीडीपी दर के साथ बिहार को लगातार दूसरी बार देश के सबसे अधिक और तेजी से विकसित होते राज्य का दर्जा दिया गया है। इस नवीन और पूरी तरह परिवर्तित बिहार को भारत की टाइगर इकॉनोमी बनाने का संपूर्ण श्रेय राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही जाता है, जिन्होंने बिहार की डोर उस समय संभाली जब वह स्वयं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा था। आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इस नवीन बिहार के सामने ब्रैंड गुजरात की चमक भी फीकी पड़ती जा रही है।

बिहार राज्य में होते इस परिवर्तन और सुधरते आर्थिक हालातों के कारण बिहार से दूसरे राज्यों में प्रवासन के आंकड़ों में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। पहले जहां अपनी बदहाली से आहत लोगों को विवश होकर अपना घर और परिवार छोड़कर दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाना पड़ता था, आज वहीं जब उन्हें बिहार में पर्याप्त संसाधन और रोजगार मुहैया करवाया जाने लगा है तो अन्य शहरों में जा बसे लोग वापस अपने घरों की ओर रुख कर रहे हैं। आंकड़ों की मानें तो मनरेगा और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की अत्याधिक सफलता भी बिहार की विकास पर अपनी मुहर लगाती है।

उल्लेखनीय है कि ना सिर्फ सरकारी आंकड़े बिहार की इस सफलता को बयां कर रहे हैं बल्कि मीडिया और अन्य प्रचार माध्यम भी नवीन बिहार के परिवर्तित हालातों को नीतीश कुमार की सफलता बता रहे हैं। उनका तो यह तक कहना है कि पहले जहां बिहार के दयनीय हालातों से त्रस्त लोग अपने क्षेत्र में व्याप्त अराजकता के कारण अपनी पहचान छिपाते फिरते थे आज वहीं उन्हें खुली और आजाद हवा में सांस लेने का अवसर मिला है।

लेकिन क्या यह आंकड़े सही हैं या फिर कोई राजनैतिक लॉलीपॉप? बहुत से लोगों का यह कहना है कि भले ही आरजेडी की तुलना में जनता दल (यूनाइटेड) के शासन में बिहार के स्वरूप में परिमार्जन देखा गया है लेकिन उसे बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है। क्योंकि ना तो प्रवासन की गति में कोई कमी आई है और ना ही सड़कों का सही तरीके से निर्माण किया गया है। सड़कों का काम शुरू तो जरूर हुआ लेकिन बीच में ही उसे रोक कर यह प्रचारित किया गया कि अब बिहार में भी पक्की सड़के बन गई हैं। वहीं दूसरी ओर मनरेगा और अन्य पीडीएस प्रणाली में व्याप्त धांधली भी जस की तस है। इसीलिए यह सरकारी आंकड़े जनता को सत्य ना बताकर भ्रम की स्थिति में उलझा रहे हैं।

विकासशील बिहार से जुड़े इस मसले पर चर्चा करने के बाद कुछ महत्वपूर्ण सवाल हमारे मस्तिष्क में उठते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना वर्तमान समय की जरूरत बन गया है, जैसे:
1. क्या वास्तव में सरकारी आंकड़े सच्चाई और पारदर्शिता के साथ जनता के समक्ष बिहार के परिवर्तित हालातों को बयां कर रहे हैं या फिर जमीनी सच्चाई कुछ और है?
2. क्या सच में नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार के लोगों की रोजगार जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हुई है?
3. नरेंद्र मोदी की तरह क्या नीतीश कुमार भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने प्रदेश को ब्रैंड गुजरात की तर्ज पर ब्रैंड बिहार बनाने में सक्षम हो पाएंगे?
4. क्या अब बिहार के लोग अपने क्षेत्र के हालातों और नीतीश कुमार के नेतृत्व से खुद को सुरक्षित पाते हैं?

नोट: उपरोक्त मुद्दे पर आप कमेंट या स्वतंत्र ब्लॉग लिखकर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। किंतु इतना अवश्य ध्यान रखें कि आपके शब्द और विचार अभद्र, अश्लील और अशोभनीय ना हों तथा किसी की भावनाओं को चोट ना पहुंचाते हों।

नितीश कुमार और बिहार की तरक्की दिखेगी सिनेमा के पर्दे पर


नितीश कुमार और बिहार की तरक्की दिखेगी सिनेमा के पर्दे पर

बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार अब फिल्मकारों की पसंद बन गये हैं। अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान तक अब नितीश कुमार के शासनकाल मं बेखौफ होकर बिहार जा रहे हैं। बिहार की तरक्की तथा नितीश कुमार का बखान अब भोजपुरी सिनेमा के पर्दे पर नजर आयेगा। नितीश कुमार के शासनकाल में हुए बिहार की तरक्की पर आधारित एक विशेष गाना फिल्म ‘बजरंग’ में डाला गया है जिसके बोल हैं ‘ए नितीश काका बिहार के बनाय दा तू जापान...’ इस गाने में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को भाषण देते दिखाया जाएगा। इस फिल्म ‘बजरंग’ का निर्माण जाने माने भोजपुरी फिल्म निर्माता जे.पी. सिंह ने किया है जिनकी फिल्म ‘पायल’ तथा ‘गईल भईंसिया पानी में’ ने सफलता का नया रिकार्ड बनाया। इस फिल्म में नितीश कुमार के भाषण का एक हिस्सा दिखाया जायेगा जिसमें नितीष कुमार लोगों को संबोधित करते दिखेंगे। इस फिल्म का प्रदर्शन जल्द ही बिहार सहित पूरे देश में होने जा रहा है। इस फिल्म में भोजपुरी सुपर स्टार पवन सिंह और अक्षरा सिंह के अलावा संजय पांडे, जय सिंह, उमेश सिंह, रमेश दुबे, सीमा सिंह, वैभव राय तथा मास्टर वरुण सिंह की मुख्य भूमिका है। इस फिल्म के निर्देशक हैं नंद किशोर महतो। गुरुजी फिल्म्स इंटरनेशनल के बैनर तले बनी इस फिल्म ‘बजरंग’ की शूटिंग उत्तर प्रदेश और बिहार के वास्तविक लोकशनों पर की गयी है। फिल्म के निर्माता जितेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं ‘बजरंग’ एक्शन के साथ-साथ रोमांस तथा काॅमेडी का भरपूर मसाला है। फिल्म के निर्देशक नंद किशोर महतो कहते हैं ‘बजरंग’ पर निर्माता जितेन्द्र प्रताप सिंह ने दिल खोलकर पैसा खर्च किया है। नंद किशारे महतो की जितेन्द्र प्रताप सिंह के साथ यह तीसरी फिल्म है। इस फिल्म को लेकर भोजपुरी सुपर स्टार पवन सिंह भी काफी उत्साह में हैं। इस फिल्म के लिए पवन सिंह ने खूब मेहनत किया है। फिल्म के खलनायक संजय पांडे की सुनें तो निर्माता जितेन्द्र प्रताप सिंह के कैंप में मेरी ये पहली फिल्म है। काफी मजा आया इस फिल्म में काम करके। इसी तरह खलनायक जय सिंह भी फिल्म ‘बजरंग’ और इसकी पूरी टीम की तारीफ कहते हैं। फिल्म के गीत जहांगीर आरजू, मुन्ना दुबे और विनोद पासवान ने लिखा है जबकि संगीत दिया है ओम झा ने। फिल्म की कहानी लिखी है संतोष मिश्रा ने। ‘बजरंग’ जल्द ही प्रदर्शित होनेवाली है।

बिहार: विकास के सर 'ताज'

नीतीश की ऐसी आंधी चलेगी और लालू की लुटिया इस कदर डूब जाएगी इसका अंदाजा दोनों में से किसी को भी नहीं था. लालू थोड़े टूटे हुए जरूर थे लेकिन कहीं न कहीं उन्हें लग रहा था कि एमवाय समीकरण एक बार फिर उनकी नैया पार लगा सकती है.
वहीं नीतीश ये मानकर चल रहे थे कि विकास का स्वाद चख चुकी जनता उन्हें धकेल कर ही सही लेकिन गद्दी तक तो जरूर पहुंचा देगी. लेकिन जब नतीजे आने शुरू हुए तो सबकी आंखें फटी की फटी रह गयी. वो लालू जिसने एक झटके में पत्थर तोड़ने वाली मजदूर को संसद भेज दिया, वो दोनों जगहों से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को नहीं जीता पाए. हार का अंतर इतना रहा की लालू कोपभवन में चले गए.
बारह बजते-बजते सब कुछ उजड़ चुका था. राबड़ी निवास वीरान, सूनसान, उजड़ा सा दिखने लगा. कोई कार्यकर्ता नहीं, कोई भीड़-भाड़ नहीं. लालू के घर की ऐसी तस्वीर इतने सालों में पहली दफा देख रहा था मैं. सड़क के दूसरी ओर नीतीश के घर पटाखे छूट रहे थे, मिठाइयां बांटी जा रही थी, होली दिवाली सब मनाये जा रहे थे. फासला महज तीस-चालीस मीटर का था.
23 नवम्बर, सुबह के करीब आठ बजे थे. बिहार चुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले की सुबह थी. पटना में मैं लालू के निवास पर पंहुचा, लालू अभी-अभी सोकर उठे थे और बाहर कुर्सी पर बैठे थे. लालू ने अपने वही चिर-परिचित पुराने अंदाज में हमें कुर्सी पर बैठने को कहा और फटाफट निम्बू वाली चाय मंगवाई और इसी के साथ हमारी बातचीत शुरू हो गयी. बीच-बीच में इक्के दुक्के पोलिंग एजेंट भी आ रहे थें और लालू उनसे उनके क्षेत्र के बारे में जानकारियां भी ले रहे थें. तकरीबन दो घंटे मैं वहां रहा. लालू ने जबरन चूड़ा-दही नाश्ता भी करवाया और हमें विदा किया. मेरे जाने का मकसद साफ़ था. मैं लालू की बॉडी लैंग्‍वेज, उनके हाव-भाव को जानना चाह रहा था. यूं कहें तो परखना चाह रहा था.
शाम के करीब छ: बजे इसी एजेंडे को लेकर मैं मुख्यमंत्री आवास नीतीश कुमार से भी मिलने गया और वहां भी नीतीश के साथ करीब डेढ़ घंटे बिताये. गरम गरम सूप के साथ हम नतीजे को लेकर बातचीत करते रहे. लौटते वक्त मैं मन ही मन लालू और नीतीश के हाव-भाव, उनके आत्मविश्वास और उनकी बातों में तुलना कर रहा था और ये तय करने की कोशिश कर रहा था कि अगली सुबह लाइव में दर्शकों को क्या कहूंग, कौन सी सटीक लाइन लूंगा...
विकास क्या चीज है, ये बिहार की जनता ने लालू के राज में जाना तक नहीं, न ही जातीय समीकरण के बूते ताल ठोंकने वाले लालू ने इसे बताने की जरूरत ही समझी. लेकिन सत्ता में आते हीं नीतीश ने काम करना शुरू किया. सड़कें बनने लगी, स्कूल दुरुस्त होने लगे और सबसे अहम् रहा कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार. लोगों को उम्मीद की किरण दिखने लगी. विकास का मजा आने लगा. बिना डर भय के वोट डालने महिलाएं खुलकर सामने आयीं. उधर लालू अपने ही दायरे में खुश थे. वो ये भूल गए कि विकास का असर हर जाति, हर तबके पर पड़ता है. कोई भी इससे अछूता नहीं रह सकता.
विकास ने जातीय समीकरण में ऐसी सेंघ मरी कि लालू चारो खाने चित हो गए. पिछले चुनाव में हार के बाद से ही केंद्र में उसकी हैसियत काफी कम हो गयी थी. अबकी बार तो वो पूरी तरह हाशिये पर चले गए. हार के इस सदमे से उबरने में काफी वक्त लगेगा उन्हें. यही हाल पासवान का भी रहा. पार्टी और भी सिमट गयी और उनके दोनों भाई भी हार गए.
एक नए बिहार का सपना लिए बिहार की जनता ने नीतीश को उनकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा दे दिया. हर तबके ने नीतीश को वोट दिया. नीतीश के नाम पर यहां तक कि मुसलमानों ने बीजेपी तक को वोट डालने से परहेज नहीं किया.
देखा जाए तो सही मायने में नीतीश की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है. जनता की उम्मीदों पर उन्हें खड़ा उतरना होगा.

बिहार: विकास की डगर पर बढ़े मजबूत कदम






 विकास की डगर पर बढ़े मजबूत कदमनेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई. साथ में नीतीश कुमार (एकदम बाएं)

बात 1917 की है. महात्मा गांधी ने चंपारण में अपने पहले सफल सत्याग्रह को अंजाम दिया था. इसके साथ ही बिहार आजादी की लड़ाई की धुरी बन गया. बाद के वर्षों में, चंपारण आंदोलन ने देश में अंग्रेजी राज के अंत की राह प्रशस्त की.
राज्‍य के गठन के शताब्दी वर्ष के मौके पर बदलते बिहार पर ग्लोबल समिट का आयोजन शासन के फोकस को नया दम देता है. लंबे समय से आर्थिक परेशानी की बेड़ियों में बंधे बिहार के लिए इसे नई आजादी के आंदोलन की शुरुआत के तौर पर भी देखा जा सकता है. पटना में 17 से 20 फरवरी तक चली इस समिट ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्‍य के बारे में सकारात्मक माहौल बनाने का मौका दिया. उन्होंने माना कि इस मौके को गांधी की चंपारण यात्रा से जोड़े जाने से समयसीमा बेशक तय नहीं होगी लेकिन कुछ निश्चित लक्ष्य जरूर निर्धारित किए जा सकेंगे.
नीतीश ने दावा किया, ‘बिहार राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने के लिए 20 साल तक इंतजार नहीं कर सकता.’ उन्होंने कुछ विशेषज्ञों के उन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया, जिन्होंने राज्‍य के विकास को समय और कुछ सिद्धांतों के आधार पर आंक कर कहा कि इसे विकसित राज्‍यों की श्रेणी में पहुंचने के लिए इतने साल लगेंगे. नीतीश ने कहा, ‘हम अपने लक्ष्य को 10 साल से भी कम अवधि में हासिल कर लेंगे.’
उन्होंने घोषणा की, ‘बिहार में निवेशक वायबिलिटी गैप फंडिंग (पीपीपी के तहत इन्फ्रॉस्ट्रक्चर परियोजनाओं के वाणिज्यिक रूप से कारगर होने तक अनुदान के रूप में वित्तीय मदद) की जरूरत के बिना पीपीपी परियोजनाओं के लिए आगे आ रहे हैं. यह बिहार में बढ़ते विश्वास का संकेत है.’
समिट में छह सत्रों का आयोजन हुआ. इसमें में उन चुनौतियों को पहचाना गया जिनका वर्तमान में बिहार को सामना करना पड़ रहा है, और यह सुझाव मिले कि इन चुनौतियों को अवसरों में कैसे बदला जा सकता है.
छठे सत्र की अध्यक्षता करते हुए इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर एम.जे. अकबर ने महात्मा गांधी की चंपारण यात्रा की शताब्दी के करीब आने की याद दिलाई. यह यात्रा विकास के समान बंटवारे की प्रतीक भी है, जिसे नीतीश कुमार की सरकार बिहार में हासिल करने की कोशिश में जुटी है.
नीतीश इस बात से पूरी तरह सहमत थे. ‘बदलते बिहार पर ग्लोबल समिट’ के आखिरी दिन उन्होंने कहा, ‘मैं सिर्फ जीडीपी और जीएसडीपी को विकास के सही संकेतक के तौर पर लेने में यकीन नहीं करता. विकास की मेरी संकल्पना हर एक शख्स तक तरक्की की बयार पहुंचाना है.’ उन्होंने राज्‍य में प्रति व्यक्ति आय में इजाफा करने के लिए उच्च वृद्धि दर को पाने को चुनौती माना और कहा कि विशेषज्ञों को इसका समाधान देना चाहिए. उन्होंने बिहार जैसे राज्‍य के प्रति केंद्र सरकार की पल्ला झाड़ने की नीति पर भी सवालिया निशान लगाया. मुख्यमंत्री ने कहा, ‘केंद्रीय कर सभी राज्‍यों पर समान रूप से लागू हो रहे हैं, तो फिर हमें बिहार में समान स्तर की सेवाएं और सुविधाएं क्यों नहीं दी जा रही हैं. बिहार को फंड क्यों नहीं दिए जा रहे हैं? क्या यह भेदभाव बरतने जैसा नहीं है? जितना भी मिलेगा हम उसके साथ काम करेंगे. लेकिन यह केंद्र के समग्र विकास के दावे पर प्रश्न उठाता है? समग्र विकास का मतलब यह नहीं है कि हम कुछ इलाकों को विकास का प्रतीक बना दें-जैसा हमने पश्चिम और दक्षिण के कुछ हिस्सों में किया है. देश के बाकी हिस्सों को पीछे छोड़ दिया है.’
शिखर सम्मेलन में विलक्षण बात देखने को मिली जब वहां मौजूद सभी विशेषज्ञों ने यह माना कि हाल के समय में बिहार ने बेहतर दिशा में कदम बढ़ाए हैं. विचार-विमर्श में इस बात की पुष्टि हुई कि नीति नियंता और लोक प्रशासन से जुड़े लोगों के लिए बिहार देश के सबसे ज्‍यादा चुनौती वाले राज्‍यों में एक है.
अगर राज्‍य पर्याप्त गति के साथ सही दिशा में सफर कर रहा है; और वृद्धि काफी अच्छी है तो कई ऐसे प्रश्न थे जिन्हें विभिन्न सत्रों में योजना आयोग के सदस्य अभिजीत सेन, अर्थशास्त्री लॉर्ड मेघनाद देसाई, पूर्व केंद्रीय मंत्री वाइ.के. अलघ और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया सरीखे विशेषज्ञों ने उठाया.
अभिजीत काफी सोची-समझी सलाह देते हैं कि राज्‍य की ग्रोथ व्यापक स्तर पर निर्माण क्षेत्र में उछाल से जुड़ी हुई है, यह चहुंमुखी समृद्धि को जन्म नहीं देता है. उन्होंने सुझाव दिया कि कुछ लक्ष्यों और रणनीति में फेरबदल करना मौजूदा समय की जरूरत है.
नीतीश ने केंद्रीय सहायता के लिए आवाज बुलंद की और योजना आयोग से राज्‍य सरकार के फैसले पर भरोसा करने के लिए कहा, जिसे उन्होंने ‘सबसे पारदर्शी व्यवस्थाओं में से एक बताया.’ उन्होंने कहा, ‘उपजाऊ भूमि और अच्छा मौसम हमारी ताकत है. हमारे लोग और विरासत हमारी संपत्ति है. हम समग्र विकास के लिए अपनी ताकत के बल पर आगे बढेंग़े.’
समिट शुरू होने से पहले ही नीतीश ने यह कहते हुए सावधान किया था कि इसका किसी निवेश से कोई सरोकार नहीं है. उद्योगपति कुमारमंगलम बिरला ने बिहार में सीमेंट संयंत्र की स्थापना के लिए 500 करोड़ रु. के निवेश का वादा किया. बिहार में 3.5 करोड़ डॉलर के सबसे पहले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को अंजाम देने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी कोबरा बीयर के मालिक लॉर्ड करण बिलिमोरिया ने और अधिक निवेश करने का वादा किया.
शिखर सम्मेलन में बिहार के 33 फीसदी के क्रेडिट डिपॉजिट रेशियो, भारी उद्योगों की अनुपस्थिति, बिजली की कमी और राज्‍य में शहरीकरण की धीमी रफ्तार पर चिंता जताई गई. इसके अलावा समिट में राज्‍य सरकार के कृषि में वृद्धि के फोकस का समर्थन किया गया. राज्‍य में कृषि क्षेत्र में 60 फीसदी लोगों को रोजगार मिला हुआ है लेकिन यह राज्‍य के सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ 33 फीसदी का योगदान करती है. मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हमने कृषि के विकास के लिए 10 साल का खाका तैयार किया है. इस अवधि में हम इस क्षेत्र पर 1.50 लाख करोड़ रु. खर्च करेंगे.’
नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने समिट का उद्घाटन किया. समापन पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्‍यपाल और लेखक गोपालकृष्ण गांधी के जानदार भाषण से हुआ. गोपालकृष्ण गांधी ने एक लंबा काल्पनिक पत्र पढ़कर सुनाया जो उन्होंने जयप्रकाश नारायण को लिखा था ताकि आधुनिक नेताओं को उनके आचरण का आईना दिखाया जा सके. समिट में दुनिया भर से आए 1,000 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. नेपाली प्रधानमंत्री ने अपने देश की हाइड्रो पावर और पर्यटन से जुड़ी क्षमताओं को मिल कर प्रयोग करने के लिए संयुक्त उपक्रमों को लेकर सक्रिय सहयोग का वादा किया.
समिट ने इस बात पर मुहर लगाई कि राज्‍य में हाल में हो रहे बदलाव सकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं. इसने राज्‍य को ऐसी राहें सुझाईं जिनके जरिए राज्‍य विविधीकृत, संतुलित और समग्र आर्थिक ग्रोथ को कायम रखने की चुनौती पर खरा उतर सकता है.

बिहार की विकास दर देश में सबसे अधिक

बिहार की विकास दर देश में सबसे अधिक

बिहार दिवस
एक समय बीमारु राज्य कहा जाने वाला बिहार अब सबसे अधिक तेजी़ से विकास करने वाला राज्य बन गया है.योजना आयोग को सौंपे गए आकडो़ं के अनुसार बिहार लगातार दूसरे साल सबसे तेज़ गति से विकास कर रहा है. इस वर्ष बिहार की विकास दर 13.1 प्रतिशत रही है.ल्लेखनीय है कि दिल्ली और पंजाब जैसे इलाक़ों को भी बिहार ने पीछे छोड़ दिया है.
इस सूची में दूसरे नंबर पर दिल्ली है जिसकी विकास दर 11.3 प्रतिशत है जबकि पंजाब की विकास दर मात्र 5.8 प्रतिशत है.
गुजरात जिसकी छवि सबसे विकासोन्मुख राज्य के रुप में होती है उसकी विकास दर भी बिहार से कम है.
पिछले दो वर्षों में बिहार की विकास दर सबसे ऊपर रही है. विकास पिछले साल 14.77 प्रतिशत थी.
ये आकड़े केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने योजना आयोग को दिए हैं.
बिहार की विकास दर बढ़ने का सीधा मतलब है कि देश के विकास में बिहार का योगदान पहले से बढ़ा है लेकिन कई राज्यों की विकास दर घटी भी है.
मसलन उत्तर प्रदेश, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, केरल और कई अन्य राज्यों की विकास दर पिछले साल की तुलना में घटी है.
जिन राज्यों की विकास दर पिछले साल की तुलना में बढ़ी है उनमें असम, गोवा, जम्मू कश्मीर, दिल्ली और छत्तीसगढ़ का नाम शामिल है. इसमें बिहार का नाम इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले साल बिहार की विकास दर 14 प्रतिशत से अधिक थी.

शाइनिंग बिहार बढ़ रहा है विकास की राह पर

लद गए वह दिन जब लोग कहते थे कि बिहार विकास की रेस में पिछड़े घोड़े की तरह है. वह समय पुराना हो गया जब लोग बिहार को एक गरीब और बेहद पिछड़ा हुआ राज्य कहते थे. अब समय बदल गया है. अब बिहार भी विकास की राह पर बढ़ चला है. नीतीश कुमार ने राज्य में सुशासन की नई नींव डाली है. धीमा ही सही अब यह राज्य भी अन्य राज्यों की तरह तरक्की कर रहा है.

कभी पिछड़ेपन का शिकार बिहार आज विकास की दौड़ में सबसे आगे निकल गया है, वहीं उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे पिछड़ गया है. गुजरात फिर टॉप 5 में जगह नहीं बना सका है. टॉप 5 राज्यों में बिहार के बाद क्रमश: दिल्ली, पुडुचेरी, छत्तीसगढ़ और गोवा हैं.


सांख्यिकीय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 13.1 फीसदी के साथ बिहार लगातार दूसरे साल सबसे तेज विकास दर हासिल करने वाला राज्य बना है. चार साल पहले पहली बार बिहार की विकास दर डबल डिजिट में पहुंची थी. बिहार की अर्थव्यवस्था अब पंजाब से भी ज्यादा बड़ी हो गई है. पंजाब इस समय बिहार से पलायन करने वालों की सबसे पसंदीदा जगह है.


यही है सही तस्वीर
बिहार को विकास की राह पर इस तेजी से चलते हुए देखकर अक्सर लोग कहते हैं कि जनाब यह तो सिर्फ आंकड़ों का खेल है जमीनी हकीकत तो कुछ और है. लेकिन इस बार के आंकड़े सिर्फ कागजी नहीं हकीकत भी हैं. कुछेक मुद्दों को छोड़ दिया जाए तो आप देखेंगे कि बिहार बदल गया है. अब नए दौर का समय है. बिहार से लगातार बढ़ी संख्या में आईआईटी और आईएएस की परीक्षा में पास होने वाले विद्यार्थी इस बात का सबूत हैं कि किस तरह बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई है. बिहार से पलायन करने वालों की संख्या में कमी इस तरफ इशारा कर रही है कि अब बिहार में भी रोजगार के मौके आने लगे हैं. इसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी बिहार आगे बढ़ रहा है.


टॉप 5 राज्य: विकास(प्रतिशत में)
बिहार: 13.1
दिल्ली: 11.3
पुडुचेरी: 11.0
छतीसगढ़: 10.8
गोवा: 10.7
पिछड़े: विकास(प्रतिशत में)
अंडमान: 0.7
अरुणाचल: 3.7
नागालैंड:3.9
पंजाब: 5.8
उत्तर प्रदेश: 6.2

 



Wednesday, 11 July 2012

सिर्फ नालंदा का मतलब बिहार नहीं हैं नितीश बाबु

सुनील बाबु ठीक ही कहते हैं |

सिर्फ नालंदा का मतलब बिहार नहीं हैं नितीश बाबु

  • नालंदा में बना दिया जायेगा हवाई अड्डा
  • इंडोर शूटिंग रेंज का उद्घाटन
  • विवरेज एंड फ़ूड प्लांट का उद्घाटन
  • पहला आल विमेन कोपरेटिव बैंक
  • २३ हज़ार करोड़ की योजना हुई आवंटित
  • खेती में बनाया अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड
  • स्वास्थ सेवा में लगातार दुसरे साल पहले नंबर पर
उपरोक्त खबर बिहार विकास की दास्तान जरुर कह रही हैं लेकिन आपको ताज्जुब होगा की सारी खबर नालंदा से सम्बंधित हैं, मतलब विकास तो हुआ हैं लेकिन किसी एक जिले में ही सिमट कर रह गया हैं। इसे मुख्यमंत्री जी की कृपा कहे या गृह जिला होना का फायदा नालंदा सबमे अव्वल हैं। इधर हाल में ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक खबर छपी की महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार दो जिलो में आल विमेन कोपरेटिव बेंक खोल रही हैं, खास बात यह की इसमें से भी एक जिला नालंदा हैं। इस मौके पर एक पत्रकार ने सहकारी मत्री रामाधार सिंह से सवाल किया की इस बार भी नालंदा ही क्यों तो मंत्री जी गोलमोल जवाब देकर चुप हो गए। बोलते भी क्या सुशासन का डंडा जो हैं।

सम्बंधित खबर -: नालंदा मे बना देल जाएत हवाई अड्डा


सच पूछिये तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ इस बात से आये दिन आखबार के पन्नो पर यह खबर दिखने को मिल जाती हैं। मुख्यमंत्री के गृह जिला होने का फायदा इस जिले को इतना मिल रहा हैं की आज राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर की सौ से ज्यादा एजेंसी हर क्षेत्र में यहाँ विकास के लिए कार्य कर रही हैं। ऐसा नहीं हैं की नालंदा को यह स्थान लालू और जगन्नाथ के समय में भी मिल रहा था या प्राचीन होने का गौरव यह जिला कांग्रेस के ज़माने में भी ले रहा था, नालंदा में विकास का सफ़र तो नितीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से शुरू हुआ हैं। आये दिन यह जिला अखबार के सुर्खी का काम करता हैं, चाहे वो हवाई अड्डा के निर्माण प्रस्ताव के लिए हो, या फिर मनरेगा में राष्ट्रीय अवार्ड के लिए, स्वास्थ सेवाओ में लगातार दो सालो तक पहले नंबर पर आने का हो या फिर कृषी के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने का हो। नालंदा सबमे अव्वल हैं।

वैसे आंकड़ो की यह लम्बी कहानी यूँ ही नहीं बनी हैं। मुख्यमंत्री के गृह जिला होने के कारण मंत्रियो की अनवरत कृपा इस जिले पर बरसती रहती हैं, आपको बता दे की खेती में प्रयुक्त होने वाले पॉवर टिलर पुरे देश में सबसे ज्यादा यही पर हैं जो की पुरे बिहार का ७५% हैं। हरेक संस्था अपने विकास के लिए इसी जिले को चुनती हैं, पूछने पर एक संस्था के प्रतिनिधि ने बताया की मुख्यमंत्री के गृह जिला होने के कारण वो सारी सुविधा मिल जाती हैं जिसकी हमें जरुरत होती हैं।

सवाल ये नहीं हैं की नालंदा में विकास क्यों हो रहा हैं, सवाल ये हैं की ये भेदभाव क्यों हो रहा हैं। दरभंगा में हवाई अड्डा रहते हुए भी आई आई टी नहीं बना कहा गया हवाई संपर्क नहीं हैं, मोतिहारी में छोटे रनवे का बहाना बनाकर विश्वविध्यालय नहीं खुला, लेकिन नालंदा में विश्वविद्यालय के लिए हवाई अड्डा बना देना कुछ हज़म नहीं हुआ। एक तरफ कोशी क्षेत्र को हरेक साल बाढ़ की विभीषिका का सामना करना पड़ता हैं और नदी जोड़ो परियोजना की तरफ सरकार का कोई ध्यान नहीं हैं।  कोशी क्षेत्र की एकमात्र लाइफलाइन डुमरी पुल क्षतिग्रस्त हैं और सरकार चैन की नींद सो रही हैं, नालंदा को मॉडल जिला बनाया जा रहा हैं और एतिहासिक दरभंगा को नाकारा जा रहा हैं। क्यों ? क्या बिहार का मतलब सिर्फ नालंदा हैं या नितीश सिर्फ नालंदा जिले के मुख्यमंत्री हैं।

विकास कार्यो में तेजी, बाधाएं होंगी दूर

मुजफ्फरपुर, नसं : नगर विकास विभाग द्वारा पटना में मुजफ्फरपुर शहर के विकास को लेकर समीक्षा बैठक की गई। बैठक में भाग लेने के लिए महापौर वर्षा सिंह, उपमहापौर सैयद माजिद हुसैन, नगर विधायक सुरेश कुमार शर्मा, प्रभारी नगर आयुक्त अमरनाथ मिश्रा एवं निगम के सभी अभियंताओं को पटना बुलाया गया था। बैठक में नगर विधायक ने निदान को कठघरे में खड़ा किया। महापौर एवं उपमहापौर ने नगर विकास मंत्री प्रेम कुमार को शहर की समस्याओं से अवगत करया। बैठक से लौटने के बाद उपमहापौर ने जानकारी दी।
बैठक की बातें
- अपना मकान किराया पर लगाने वालों को देना होगा व्यावसायिक कर।
- एपीएल एवं बीपीएल कूपन जिले को आवंटित करने के बाद भी नहीं बांटे गए। मंत्री ने कहा कि वे स्वयं पहल करेंगे।
- शहर में किसी भी प्रकार का कार्य करने वाली एजेंसी को निगम से एनओसी लेना होगा।
- निगम के अभियंताओं को मुख्यालय में रहने का निर्देश। बात नहीं मानने पर होगी कार्रवाई
- आंतरिक श्रोतों से आय बढ़ाए और लंबित कार्यो का निपटारा करे निगम।

Monday, 9 July 2012

चीनी उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा बिहार

समस्तीपुर। बिहार को चीनी एवं गन्ना उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य सरकार ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की है। राज्य के गन्ना उद्योग विभाग के प्रधान सचिव आलोक कुमार सिन्हा ने शनिवार को यहां राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा में आयोजित 'राज्य में चीनी उत्पादन एवं मिलों की वर्तमान स्थिति' विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में भाग लिया। कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य की भूमि गन्ना उत्पादन के दृष्टिकोण से उपयुक्त है और यह प्रदेश की जरूरतों के साथ साथ देश की भी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है।

इस मौके पर राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आरके मित्तल ने कहा कि बिहार का चीनी उत्पादन के क्षेत्र में गौरवशाली इतिहास रहा है। एक समय देश के कुल चीनी उत्पादन का करीब चालीस फीसदी हिस्सा केवल बिहार में होता था। उन्होंने किसानों से अधिकाधिक गन्ने की खेती करने का आह्वान करते हुए कहा कि आपके फायदे के लिए विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अथक मेहनत से गन्ने के कई नये किस्म विकसित की हैं। यदि किसान ²ढ़ निश्चय के साथ गन्ने की खेती में लग जाये तो बिहार इस क्षेत्र में शीघ्र ही आत्मनिर्भर हो जायेगा।

बसंत तुम कहा गुम गए

बसंत फिर आ गए तुम…
हमारी उन बीते ख्वाबो को फिर से दिखाने
जब
तितलिया उड़ा करती थी
गाँवों के हरे-भरे खेतो के बीच
सरसों के पीले फूल पर
जब
आम के मंजर की महक
नथुनों में सुगंध भर देती थी
और हम खो जाते थे
मीठे आम के सपनो में
जब
खिला करती थी फूल
बागो में बगीचों में
और हम फिर से बच्चे बन जाते थे
उन फूलो के पीछे
जब
फागुन के विरहे का दर्द भरा फाग
दूर कहीं से सुनाई देता था हमें
और हम तृप्त हो जाते थे
खो जाते थे उनके स्वर लहरियों में
लेकिन वसंत
अब
तितलिया सिर्फ ख्वाबो में उड़ते हैं
और सरसों के फूल को कभी देखा था
अखबार के तीसरे पन्ने पर
अब
आमो की महक कोल्ड स्टोरेज की
बदबू में दब जाती हैं
पेड़ अब मॉल में बदल गए
और अब
फागुन के विरहे की जगह
कोलावारी डी का कोलाहल हैं
बसंत तुम कहा गुम गए
इन अनकही अनजानी भीड़ में
क्यों ना फिर तुम आते हो
क्यों इतना तड़पाते हो

क्या सचमुच बदल रहा है बिहार ...?

क्या सचमुच बदल रहा है बिहार ...?


बिहार ने एक बार फिर साबित कर दिया की वो सबसे ज्यादा घटना प्रधान शहर हैं। खबर कोई भी हो अच्छा या बुरा जब ये बिहार में होती हैं तो घटना बन जाती हैं। सब कुछ वैसे ही हैं गन्दा और अनियोजित सा, सब अपने मर्जी के मालिक हैं और नागरिक जिम्मेदारी का कोई भाव नहीं हैं, फिर भी कही कुछ ये लगता हैं की बिहार एक ऐसी जगह हैं जहाँ बदलाव महसूस हो रहा हैं।

नए साल में बिहार में फिर से... 'मिस बिहार' प्रतियोगिता शुरू होने वाली है वैसे इसमें जान डालने की शुरुवात २००८ से ही शुरू हो गयी थी की इस बार कुछ अच्छा और कुछ नया कर सके लेकिन संशय अभी भी बरकरार हैं । वैसे अंतिम बार यह प्रतियोगिता १९७० के दशक में हुई थी लेकिन ये एक अबूझ और अनकही पहेली जैसी कभी शुरू होती तो कभी बंद, कभी मिस बिहार जीतने वाली प्रतिभागी इलाहाबाद की निकलती तो कभी मिस बिहार शादी शुदा निकलती। वर्ष २००८ में तो यह प्रतियोगिता बिना किसी नतीजे के ही ख़तम हो गयी थी, कुछ प्रतिभागियों ने इसमें धोखा और बैमानी की बात कह मंच पर ही उत्पात मचाना शुरू कर दिया। साफ़ शब्दों में अगर कहे तो अखबार के पन्नो पर ये सिर्फ एक घटना बन कर रह गयी।

नए साल में १९ फ़रवरी,२०१२ को पटना मैराथन आयोजित होने जा रहा हैं। आयोजन का जिम्मा एक प्रवासी बिहारी का हैं जो अपने निवेश बैंकिंग से तीन महीने का अवकाश ले कर इस तैयारी को मुकल्लम अमली जामा पहनाने के लिए पटना में डेरा डाले हुए हैं। उनका कहना हैं की "मैराथन से एक मानवीय ऊर्जा सृजित होगी जो पूरी दुनिया में एक कारगर संकेत भेजेगी जो बिहार और बिहारियों की अंतहीन उपलब्धियों का गुणगान करेंगी।" उनका कहना हैं की समृधि केवल पटना तक ही क्यों सिमटी हैं । क्यों अभी भी हाइवे से २० किलोमीटर का बिहार वहीँ पर हैं जहाँ हमने इसे आज से ५ दशक पहले छोड़ा था।



इसी महीने नालंदा के एक युवा किसान सुमंत ने धान उत्पादन के क्षेत्र में विश्व कृतिमान कायम कर दिया। उन्होंने एक हेक्टेयर जमीन में २२४ क्विंटल धान उत्पादन करके चीनी कृषि वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग को भी पीछे छोड़ दिया। सुमंत ने चार किसान साथियों के संग मिलकर 'श्री' जैसी नई तकनीक का इस्तेमाल किया जिससे कम पानी और बीच में अधिक पैदावार की जा सकती हैं।

इन सब कारणों के वाबजूद भी कई दुसरे कारण भी हैं जिससे यह बहुत ज्यादा नहीं लगता। देश में बिजली उपभोग के मामले में भी बिहार सबसे निचे हैं। यहाँ पर ६०० मेगावाट बिजली संयंत्रो की स्थापना हो चुकी हैं लेकिन अभी भी सिर्फ २०० मेगावाट उत्पादन ही हो रहा हैं। बढ़ में एक सुपरथर्मल बिजली संयंत्र बन रहा हैं लेकिन उसमे भी उत्पन्न कुल बिजली का केवल १० फीसदी ही राज्य को मिल सकेगा।

बिजली की बात अगर छोर भी दे तो भी जमीन की किल्लत राज्य में संभावित निवेशको को अपने से दूर कर रही हैं। साईकिल बनाने वाली दो बड़ी कंपनियों ने बिहार में संयंत्र लगाने की बात की लेकिन अब उनकी योजना भी टलती दिखाई दे रही हैं। यही हाल एक सीमेंट फेक्ट्री का भी हैं, उन्होंने भी राज्य में कारोबार शुरू करने का फैसला किया लिखे अब उसने भी अपने कदम पीछे की और मोड़ लिया हैं। एक एस्बेस्टस कंपनी भी राज्य में जमीन नहीं मिल पाने के कारण अपना धंधा शुरू नहीं कर पाया। एक बड़ी शराब कंपनी भी अपना समर्थन जाता रही थी लेकिन अब वो भी मौन दिख रही हैं।

लालू राज की जो अपहरण और फिरौती की सुर्खिया अखबारों से गायब हो गयी थी वो फिर से मुंह उठा रही हैं। बच्चे फिर से अगवा हो रहे हैं और पुलिस पर एक बार फिर लेट लतीफी होने का फब्ती कसा जा रहा हैं। गुंडे-बदमाशो की फिर से चल पड़ी हैं और फिर से कानून का मखौल उड़ाया जा रहा हैं। सड़क की ठेकेदारी जो अपराधियों की बपौती थी और जो कुछ ख़त्म सा लग रहा था फिर से शुरू होने लगा। निचे से भ्रष्टाचार बढ़ रहा हैं और आंच ऊपर तक पहुँच रही हैं। किसी के साथ अगर कोई घटना घट जाती हैं तो वो रिपोट लिखाने से भी डरता हैं। पुलिस वाले उन्हें सबसे बड़ा गुंडा नज़र आता हैं। लेकिन फिर भी बिहार बदल रहा हैं.... ।

बिहार में सबसे बड़ी समस्या खेती में भी हैं, कहीं धान जल जाता हैं तो कहीं बाढ़ की चपेट में आ जाता हैं। कभी अगर किस्मत से मानसून बढ़िया हो जाता हैं और पैदावार सही हो जाता हैं तो सरकार की खरीद तंत्र में गड़बड़ी हो जाती हैं। राज्य में कोई बड़ी मिल नहीं हैं। रैयाम और सकरी चीनी मिल पर ग्रहण लगा हुआ हैं। स्प्रिट एयरवेज ने बिहार को एक सपना दिखाया था सस्ते और सुलभ हवाई जहाज में उड़ने का लेकिन जीडीसीए के कारण इसमें भी अडंगा लगा हुआ है और ये योजना भी अधर में लटकी नज़र आ रही हैं।

योजना आयोग के सलाहकार ने सरकार पर आरोप लगाया हैं की वो सरकार योजना राशी के एक बड़े हिस्से का उपयोग नहीं कर पा रही हैं फलस्वरूप राज्य को १०,००० से १२,००० करोड़ रूपये की सहायता गवानी पड़ी हैं। उन्होंने आरोप लगाया हैं की इसके लिए कोई कारगार प्रशासनिक तंत्र नहीं हैं। उन्होंने एक मिसाल दिया की मध्याहन भोजन के लिए बिहार के १३०० करोड़ रूपये मिले जिसमे से उन्होंने केवल 780 करोड़ रूपये ही लिए जबकि और राज्यों ने पूरा का पूरा पैसा खपाया।
यह सही है कि बिहार रातोरात नहीं बदल पायेगा और ये भी सही हैं की इसे कोशिश करने के लिए पुरे पुरे अंक दिए जा सकते हैं। लेकिन मन के कोने में अभी भी एक सवाल टीस बनकर उभरता हैं की क्या सचमुच बिहार बदल रहा हैं या ये आज भी वहीँ हैं जहाँ ये
पाँच दशक पहले था।

भ्रस्टाचार की रफ़्तार...

भ्रस्टाचार की रफ़्तार...

गुरुवार को अखबार में लालू की फोटो मुख्य पृष्ठ पर देख नज़र ठहर गयी, चुकी खबर लालू जी की थी और भी मुख्य पृष्ठ पर तो यह सोचकर की खबर बिहार की होगी पढने बैठ गया, जों-जों खबर पढता गया उत्सुकता और आश्चर्य दोनों सावन के मेघ की तरह बढ़ता गया। और खबर के अंत तक जो बात ठीक-ठीक समझ में आई उसको अगर एक शब्द में कहे तो वो था " भ्रस्टाचार की रफ़्तार"।


वैसे खबर पर गौर करे तो वो बिहार के बहुचर्चित घोटाले 'चारा घोटाला' से सम्बंधित था जिसका वृतांत अगर सही सही लिखा जाय तो यह आजाद भारत में भ्रस्टाचार का प्रतिनिधि उदहारण बन सकता है। खबर थी घोटाले में गुरवार को सीबीआई की आदालत में एक आरोप पत्र दाखिल किया गया जिसमे लालू प्रसाद, जगन्नाथ मिश्रा, ध्रुव भगत और उनके कुछ सहियोगियो को इस घोटाले में आरोपी बनाया गया है। वैसे यह आरोप पत्र १९९४-१९९६ के बीच ४६ लाख रूपये के चारे घोटाले का है। यह आरोप पत्र यह भी बताता है की ताकतवर लोगों के लिए भारत में भ्रस्टाचार की गति कितनी तेज है। लगभग १७ साल सिर्फ आरोप पत्र दाखिल होने में लग गए तो कब मुकदमा चलेगा और कब सुनवाई होगी और कब सजा सुनाई जायेगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। वैसे भारत की न्याय-व्यवस्था से हर कोई परिचित है, ना तो यहाँ न्यायालयो की कमी है ना ही न्यायाधिशो की। वैसे भी बड़े लोगो का मामला हमेशा से ऊँची और ऊँची अदालतों में चलता रहता है, चलता रहता है, और कभी कभी तो ऐसा होता है की फैसला आते आते उम्र कम पड़ जाती है। कुछ ऐसा ही वाकया इस केस में भी हुआ है भोलाराम तूफानी, और राधो सिंह अब इस दुनिया को छोड़ चले है, शायद अब ऊपर की अदालत में उनका फैसला हो। वैसे ये बात अलग है की लालू प्रसाद और जगन्नाथ मिश्रा इस घोटाले के सिलसिले में कई बार जेल भी जा जुके है, लालू जी के लिए ये तो इतना महंगा पड़ा की एक बार उन्हें मुख्यमंत्री के पद से भी हाथ धोना पड़ गया था। अब खुदा ना खास्ते कल को न्यायधीश बिक गए या फिर किसी और कारण से ये निर्दोष करार कर दिए गए तो क्या ? ये बेमतलब से इतने दिनों से इसे ढो रहे थे, बेकार में ही इन्होने बिना किसी वजह के मुख्यमंत्री का पद खो बैठे थे।
वैसे देखा जाय तो गलती हमरी है। १९८५ में अगर हमारी सरकार और कानून कैग की उस रिपोर्ट को गंभीरता से ले लेती तो ये ४५-४६ लाख का घोटाला आज करीब दस अरब तक नहीं पहुँचता। वैसे भारत में देखा हमेशा से देखा गया है कानून पूंजीपतियों और राजनेताओ की गुलाम रही है, चाँदी के जूते बड़े बड़े कानून का मुंह बंद कर देती है। और उस समय लालू जी सत्ता में थे और उनके कुछ सहियोगी केंद्र में इसलिए यह प्रकरण एक तरह से दब गया था या रुक रुक कर चल रहा था। लेकिन अब ना तो जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री है और ना ही लालू का राजीनीति में दबदबा है, बिहार से उनका राजनैतिक पतन तो हो ही गया है केंद्र में भी कुछ खास पहुँच नहीं दिखाई दे रही है, तो हो सकता है की अब इस मामले के निपटारे में तेजी आये और फैसला जल्द हो।
लेकिन अभी भी हमें जरुरत ये नहीं है की चारा घोटाले पर फैसला जल्द आ जाए या, सीबीआई किसी को भी झूठ मुठ फसाकर इस फ़ाइल को जल्द से जल्द बंद की जाय, हमें जरुरत है एक प्रभावी कानून की जो भ्रस्टाचार को रोकने में प्रभावी हो।    

ऐसा क्यों होता हैं?

ऐसा क्यों होता हैं? क्यों हो जाते है लोग उत्तेजित छोटी सी बात पर ? समझ में नहीं आता???  कभी लगता है मेरे में कुछ खामिया है, कभी लगता है सामने वाला जाहिल है। आखिर क्यों नहीं कोई समझ पाता मेरी भावनाओं को, क्यों उन्हें लगता है की वो जो कर रहा हैं वो ही सहीं है और पूरी दुनिया गलत...? क्यों लोग समझते है की दुसरो का ज्ञान बहुत अल्प है मेरे ज्ञान के आगे ? क्यों ऐसा होता है की दुनिया मानिनी बनी हुई है? क्यों हम कभी दुसरो को समझ नहीं पाते ? ऐसे कुछ ढेर सारे सवाल आज मन में कूद रहे हैं, रविवार होने के वाबजूद कार्यालय आया हूँ क्या करू निजी दफ्तरों में कुछ ऐसा ही हाल हैं अभी भारत में। आप गुलाम होते है और मालिक जमींदार कभी भी उनके पेट में ऐठन हुई और आप हुकुम बजाने सामने आ जाओ... कुछ ऐसा ही आज भी हुआ, सॉफ्टवेर की टेस्टिंग थी ऑफिस आना पड़ा, सोचा चलो घर में पड़े पड़े बोर हो रहे हैं तो ऑफिस में दिन अच्छा गुजर जाएगा, लेकिन यहाँ आकर लगा बेकार ही आ गया हूँ, वो आज फिर ऑफिस में टकरा गया, हालाँकि हमारी बातचीत कम ही होती है लेकिन जब भी होती है कुछ नोक-झोंक वाली ही होती हैं, उसे अपने आप पर गर्व है और मुझे खुद पर.... हो भी क्यों ना हम किसी से कम थोड़े ही हैं, बिहारी होने का जो तमगा सर पे लगा है उसे शायद कुछ हद तक धोने में कामयाब हो गया हूँ, अब लोग समझने लगे है की बिहार किसी से कम नहीं होते कुछ ज्यादा ही होते हैं, लेकिन फिर भी वो अधूरापन और वो खालीपन आज भी मुझे खलता है जब लोग किसी मजदूर बिहारियों को दिखा हमरा मजाक उड़ाते हैं। पता नहीं लोगो को नीचा दिखाने में क्या मिलता है, किस सुख की अनुभूति होती है उन्हें ऐसा करने में, क्या मिलता है उन्हें इस तरह किसी का मजाक उड़ने में लेकिन...। आज फिर एक बार उसने मुझे निचा दिखाने की कोशिश की मेरी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की लेकिन सच कहू तो मुझे बुरा नहीं लगा, मुझे विस्मय हुआ उसकी अज्ञानता पर मुझे दुःख हुआ उसके व्यहार पर और जब मैंने इसे अनतर्मन से सोचा मैं खुद ही सहज हो गया...
लेकिन एक बात है मेरे मन में हमेशा से एक बात टीस बनकर उभरती रहती हैं, दर्द बनकर मुझे कहती रहती हैं क्या ये मेरी गलती थी की मैं बिहार में पैदा हुआ हूँ, क्या ये मेरा दुर्भाग्य है की मैं वहां पैदा लेने के बाद भी दिल्ली में काम कर रहा हूँ....। नहीं ढूंढ़ पाया हूँ आज तक इसका उत्तर, नहीं कर पाया हूँ अपनी जिजीवषा को शांत, सिर्फ इस ख्याल में जिन्दगी जिए जा रहा हूँ की कभी तो होगा मेरा सपना पूरा, कभी तो मिलेगा बिहारियों को सम्मान...


उपरोक्त सारी बातें मेरे साथ घटित हुई हैं, सोचा लिख दूंगा तो मन हल्का हो जाएगा, सोचा कभी आप सबके साथ शेयर कर लू तो कुछ कम होगा दर्द, कही पढ़ा था बाटने से ही दर्द कमता है और ख़ुशी बढती हैं ....

तो भला अच्छा क्यों ना लगे...

जहाँ पलायन अभिशाप बना हो और बिहारी शब्द गाली बनकर रह गया हो वहीँ कोई नवीन चन्द्र गुलाम और कमला प्रसाद बिसेसर विदेश में प्रधानमंत्री के पद पर आ जाए.

जब पॉप और रैप में सारी दुनिया डूबी हो और धूम धड़ाका संगीत की पहचान हो गयी हो वही कोई विदुर मल्लिक ध्रुपद के क्षेत्र में पुरे विश्व में झंडे गाड़ दे और अगले ६० वर्षो तक उसका परिवार यह झंडा गिरने ना दे.
जब आधे से ज्यादा औरत अपने आँगन की दहलीज को पार ना कर सकी हो और औरत आज भी सिर्फ लाज का प्रतिरूप बनकर रह गयी हो, वहीँ कोई अरुणा मिश्रा विश्व विमेन बोक्सिंग चैम्पियनशीप में एक झटके से स्वर्ण पदक ले आये.

जहाँ आधा से ज्यादा बच्चे स्कूल का मुंह तक ना देख सके हो और ४३% से ज्यादा लोग पहली कक्षा में ही स्कूल ड्रॉपआउट कर दे और वहीँ कोई संजय झा और सतीश झा सीईओ के पद पर विराजमान हो जाए.
जब तीन चौथाई से भी ज्यादा हिस्सा हरेक साल बाढ़ और सूखे की चपेट में आता हो वही कोई युवा किसान सुमंत एक हेक्टेयर में २५४ क्विंटल धान उत्पादन करके चीनी वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग को भी पीछे छोड़ दे.

जब क्रिकेट किट के लिए पैसे ना हो और ताड़ के डंडे से बैटिंग करके कोई कीर्ति आजाद, सौरभ तिवारी और कविता राय  विश्व क्रिकेट में झंडे गाड़ दे.


जब
इंजीनयिरिंग में एडमिशन सिर्फ पैसे वालों हक़ बन जाए और कोई आनंद गरीबो के लिए इसे सुलभ बना दे.

जब राजनीति सिर्फ सियासी गलियारों की गुलाम बनकर रह जाए और विकाश सिर्फ नेताओं की जेब तक दिखे वहीँ कोई इंजिनियर मुख्यमंत्री बनकर विकाश पुरुष बन जाए


तो भला अच्छा क्यों ना लगे...

अच्छा लगता हैं…

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
ये बुद्ध की धरती हैं
जिसने सिखाया दुनिया को
अहिंसा का पाठ

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुए थे गुरु गोविन्द
जिसने सिखाया अपने
बाजुओ पर भरोसा करना

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुई थी सीता
जो थी जगतजननी
वैदेही और जानकी भी

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुई थे भगवान् महावीर
जो बने जैनों के चौबीसवे तीर्थकर

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुए थे हज़रत मखदूम, बदरुद्दीन और सफरुल
जिनकी रहमत सबको प्यारी थी

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
ये बिहार हैं
जो सभी धर्मो का सार हैं      

Sunday, 24 June 2012

बिहार का योजना बजट-2011-12 के लिए 24,000 करोड़ निर्धारित

बिहार  मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2011-12 के लिए बिहार योजना बजट कुल रु॰ 24,000 करोड़ निर्धारित हुई।  नीतीश कुमार ने कहा कि विगत् वर्ष 2010-11 की तुलना में यह 20% अधिक है। इस वर्ष के वार्षिक योजना 24,000 करोड़ में राज्य सरकार अपने बचत से 41% (9934.49 करोड़), बाजार से 27%  (6342 करोड़) और बाँकी बचे 32%  (7723.51 करोड़) केन्द्रीय सहायता से प्राप्त करेगी। यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004-05 में जहाँ केन्द्रीय सहायता 70% होता था वहीं अब केन्द्रीय सहायता का प्रतिशत घट कर 32% रह गया है। राज्य सरकार की अपनी बचत और संसाधन वर्ष 2005-06 में 9.26 प्रतिशत था जो वर्तमान् में 40% से भी अधिक बढ़कर पहुँच गया है।
बिहार का यह वार्षिक बजट  नीतीश कुमार की मोंटेक सिंह अहलुवालिया, उपाध्यक्ष योजना आयोग से योजना भवन में सम्पन्न बैठक में अन्तिम रूप दिया जा सका। पूर्व में राज्य सरकार को गैर योजना मद में नियमित व्यय हेतु कार्मिकों के वेतन एवं भत्ते हेतु उधार लेना होता था। अब राज्य सरकार अपने बचत से गैर योजना मद के खर्चे को स्वतः पूरा करती है और विकासात्मक योजना व्यय को पूरा करती है जो 41% तक होता है। यह तभी सम्भव हो पाया, जब राज्य सरकार अपने वित्तीय प्रबन्धन को विवेकपूर्ण तरीके से अपने संसाधन को सफलतापूर्वक बढ़ाते हुए बहुत बड़े पैमाने पर सुधार किया है, जिसकी सराहना योजना आयोग तक ने की है।
राज्य सरकार ने वर्ष 2005-06 में मात्र 4,676 करोड़ से वर्ष 2006-07 में  8,470 करोड़, वर्ष 2007-08 में 10,436 करोड़, 2008-09 में 13,693 करोड़, 2009-10 में 16,387 करोड़ तथा वर्तमान् वित्तीय वर्ष में 20,000 करोड़ की वृद्धि अपने विकास योजना व्यय में किया है।  कुमार ने बताया कि विकास की मुख्य प्राथमिकता आधारभूत संरचना ही होगी, जिसमें सड़क क्षेत्रों के लिए 23.88% (5732.59 करोड़), उर्जा क्षेत्रों का अंश 7% (1682 करोड़), शिक्षा के क्षेत्रों में 12.56% का अंश (3014 करोड़) तथा अन्य सामाजिक सेवाओं यथा स्वास्थ्य, जलापूर्ति, स्वच्छता, ग्रामीण गृह निर्माण, नारी सशक्तीकरण तथा सामाजिक सुरक्षा का अंश 22.13% (5311 करोड़) होगा। सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण तथा कृषि क्षेत्रों के लिए 9.87%  तथा 5.78% का क्रमशः अंश होगा। बिहार की अर्थ व्यवस्था हाल के वर्षों में दूªत गति से बढ़ी है। अद्यतन आकलन के अनुसार जी.एस.डी.पी. का स्थिर मूल्यों पर वृद्धि दर वर्ष 2005-06 एवं 09-10 में 14.7% की रही है। वर्ष 2005-06 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय 7659 था जो वर्ष 2009-10 में 51% तक बढ़कर 11,558/- हो गया है।
नीतीश कुमार ने राज्य के परिपेक्ष्य में योजना मद से किये जा रहे व्यय उल्लेख करते हुए बताया कि पूर्व में स्कूल नही जाने वाले बच्चों की संख्या 12.8% से घटकर राष्ट्रीय औसत के बराबर 3.5% हो गया है। (2) राज्य में 2.34 लाख प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। (3) नारी शिक्षा योजना के अन्तर्गत् 40 लाख महिलाओं को शिक्षित किया गया। जिसके तहत 60% महिलाएँ वस्तुतः साक्षर की गई। (4.) मुख्यमंत्री बालिका पोशाक योजना लागू की गई। (5) मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना मद में कक्षा 9 के बालिकाओं के लिए 5.25 लाख खर्च किए गए। (6) मुख्यमंत्री बालक साइकिल योजना के तहत कक्षा 9 के विद्यार्थियों पर 6.50 लाख व्यय किए गए। (7) चाणक्या राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के नए परिसर का निर्माण। (8) 446 एकड़ भूमि ‘‘नालन्दा अन्तर्राष्ट्रीय विश्व विद्यालय को हस्तांतरित किया गया’’ कुलपति की नियुक्ति। (9) चन्द्रगुप्त प्रबंधन संस्थान हेतु भवन निर्माण योजना अनुमोदित। (10) आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (निजी एवं आधिकारिक क्षेत्रों में तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा हेतु) भूमि आवंटित की गई। (11) मातृ मृत्यु दर 2001-03 में 371 था से घटकर 2004-06 में 312 हुआ, अखिल भारतीय औसत् 254 है। (12) शिशू मृत्यु दर 2005 में 61 से घटकर 2009 में 52 प्रति एक हजार जीवित जन्मों में पहुँचा। जबकि अखिल भारतीय दर 50 है। (13) पूर्ण गर्भाधारण दर में 4.3 से घटकर 3.9 हुआ। जबकि अखिल भारतीय दर 2.6 है। (14) संस्थागत् प्रसवों में 1992-93 के 12.1% से बढ़कर 2005-06 में 22% 2007-08 में 27.7% और 2009-10 में 47.9% की वृद्धि दर देखी गई। (15) पूर्ण टीकाकरण का अच्छादन वर्ष 1992-93 में 10.7%  से 53.8%  हुआ (सम्प्रति 61%  के लगभग)। (16) अगले दो वर्षों में खाद्यानों के भंडारण की वर्तमान क्षमता 10 लाख मैंट्रिक टन से बढ़कर 40 लाख मैट्रिक टन हो जाएगा। (17) कांटी एवं बरौनी  ताप विद्युत परियोजना का विस्तार। (18) एन0टी0पी0सी0 के साथ संयुक्त उपक्रम में नवीनगर विद्युत संयंत्र में 3×660 मेगावाट उर्जा उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित। (19) दिर्घकालीन आधार पर 450 मेगावाट विद्युत प्राप्ति की योजना तथा (20) 2×660 मेगावाट के तीन विद्युत संयंत्र स्थापित करने हेतु स्थल विकसित करने की योजना तथा (20) 2×660 मेगावाट के तीन विद्युत संयंत्र स्थापित करने हेतु स्थल विकसित करने की योजना।

आहूत बैठक में मुख्यमंत्री के साथ सुशील कुमार मोदी, उप मुख्यमंत्री, बिहार, श्री नरेन्द्र नारायण यादव, मत्री, योजना विकास एवं विधि,  हरकिशोर सिंह, उपाध्यक्ष, बिहार राज्य योजना परिषद सहित राज्य के उच्चाधिकारीगण उपस्थित थे। बैठक समाप्ति के उपरान्त पत्रकारों द्वारा पुछे गये सवाल के उत्तर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने बिहार में हो रहे प्रगति के प्रति संतोष व्यक्त किया। श्री नीतीश कुमार ने उपाध्यक्ष योजना आयोग अहलुवालिया को मांग के अनुरूप योजना की स्वीकृति हेतु आभार प्रकट किया।

सस्पेंड आईएएस के जब्त मकान में दलित छात्रों की लगी कक्षा

पटना। बिहार के सस्पेंड आईएएस अधिकारी शिवशंकर वर्मा के आलीशान तीन मंजिला मकान में नजारा बदल गया है। वहां अब अधिकारी की नेम प्लेट की जगह पर प्राइमरी स्कूल का बोर्ड लगा है और बच्चों का शोर सुनाई दे रहा है।
पटना हाई कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद जिला प्रशासन ने चार सितंबर को शिवशंकर के मकान को जब्त कर लिया था और राजकीय संपत्ति घोषित करने के बाद इसे मानव संसाधन विभाग के सुपुर्द कर दिया था।

आय से ज्यादा संपत्ति जमा करने के मामले में विशेष न्यायालय ने शिवशंकर के करीब डेढ़ करोड़ रुपए के मकान को जब्त करने का आदेश दिया था, जिस पर पटना हाई कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी थी।
विद्यालय प्रबंध समिति की अध्यक्ष सीता देवी ने इस प्राइमरी स्कूल का आज उद्घाटन किया, जिसमें पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे दलित समुदाय के हैं। पटना के जिला शिक्षा पदाधिकारी एम. दास ने बताया कि रुकनपुरा के झुग्गी-झोपड़ियों वाले इलाके में चल रहे प्राइमरी स्कूल को जब्त मकान में ट्रांसफर कर दिया गया है। हाई कोर्ट की ओर से रास्ता साफ होने के बाद सरकार ने तेजी से कदम उठाते हुए जब्त मकान में स्कूल खोलने का काम पूरा किया। छह सितंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक में जब्त मकान को मानव संसाधन विकास विभाग को दे दिया था।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2010 में बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान कहा था कि भ्रष्ट अधिकारियों के मकान को जब्त कर उसमें सरकारी स्कूल खोले जाएंगे।

बिहार के सौराठ में खुलेगा मिथिला पेंटिंग प्रशिक्षण संस्थान – नीतीश कुमार

मधुबनी। सेवा यात्रा के तीसरे दिन जितवारपुर से रांटी पद्मश्री महासुन्दरी देवी के घर पहुंच मुख्यमंत्री ने सौराठ में मिथिला पेंटिंग प्रशिक्षण संस्थान खोलने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस संस्थान का निर्माण बिहार सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा कराया जाएगा। सौराठ के इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा भी दिया जाएगा। यहां मिथिला पेंटिंग सीखने व प्रशिक्षण लेने वाले कलाकारों को संस्थान की ओर से प्रमाण पत्र भी दिए जायेंगे जिसकी मान्यता सभी क्षेत्रों में होगी। करोड़ों की लागत से 10 एकड़ में बनने वाले इस पेंटिंग प्रशिक्षण संस्थान के खुल जाने से मिथिलांचल में रोजगार सृजन के अच्छे अवसर मिलने लगेंगे।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि मधुबनी पेंटिंग न सिर्फ मिथिलांचल का मान बढ़ाई है बल्कि इससे प्रदेश व देश भी गौरवान्वित हुआ है। उन्होंने कहा कि मधुबनी पेंटिंग से मुझे भावनात्मक जुड़ाव है। सौराठ का जब यह संस्थान बनकर तैयार हो जाएगा तो यहां के कलाकारों को इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। बिचौलिया जो इस विधा पर भी हावी हैं वे कहीं दिखाई नहीं देंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मधुबनी पेंटिंग को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्थापित करने के लिए सरकार कोई कसर नहीं छोड़ेगी। सौराठ का जब यह प्रशिक्षण केन्द्र काम करने लगेगा तब यहां देश और विदेश के लोग सिर्फ पेंटिंग देखने ही नहीं खरीदने भी पहुंचेंगे। मधुबनी पेंटिंग को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर सम्मान तो मिलेगा ही कलाकारों को उचित मूल्य भी प्राप्त होगा। उन्होंने कहा सरकार पूर्व में ही मधुबनी प्रशिक्षण केन्द्र खोलने का निर्णय ले चुकी है लेकिन भूमि को लेकर इसकी घोषणा नहीं की गई थी। अब सौराठ में सरकार को जमीन उपलब्ध हो गया है जहां शिक्षा विभाग द्वारा संस्थान का शीघ्र निर्माण प्राप्त हो जाएगा। इस संस्थान में वह सभी सुविधा उपलब्ध रहेगी जो एक विश्वविद्यालय में रहता है। इसे अत्याधुनिक संस्थान बनाया जाएगा और मैथिल ललनाओं को जिसे इस विधा से लगाव है उन्हें प्रशिक्षित कर रोजगार के अवसर प्रदान किए जायेंगे।
मुख्यमंत्री मिथिला को पूरे देश में सम्मान दिलाने वाली पद्मश्री महासुन्दरी देवी के साथ बैठकर उनसे विस्तृत जानकारी भी प्राप्त की। वे मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी अन्य तथ्यों को भी महासुन्दरी देवी व उनके परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर विचार-विमर्श किया। इससे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार परिसदन से जितवारपुर पहुंचकर पद्मश्री स्व. सीता देवी, जगदम्बा देवी, चानो देवी सहित जितवारपुर गांव के दर्जनों घर में जाकर मधुबनी पेंटिंग को देखा और कलाकारों से विस्तृत जानकारी प्राप्त की। जितवारपुर जहां वृहत पैमाने पर मधुबनी पेंटिंग का निर्माण होता है वहां पहुंच मुख्यमंत्री अभिभूत दिख रहे थे। देर शाम वे रांटी ड्योढ़ी के बगीचा स्थित उस भवन पर भी गए जहां जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं द्वारा कई सामानों का निर्माण किया जा रहा है। वे इस कार्यालय के निरीक्षण व कलाकारों द्वारा निर्मित सामानों को देखकर खुश तो थे ही इसे और बेहतर करने का सुझाव महिलाओं को दी। महिलाओं द्वारा उन्हें कई ऐसे सामान भी दिखाए गए जो मिथिलांचल में प्रसिद्ध है। मुख्यमंत्री का यह अंतिम कार्यक्रम था। वे तकरीबन 7 बजे रांटी से चलकर परिसदन पहुंचे।

बिहार के प्रवासी:सरकारी कोशिशें नाकाफी

पिछले तीन सालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने हैदराबाद, चेन्नई और दिल्ली के प्रवासी भारतीय दिवस में बदलते बिहार को शो केस किया है। दोनों नेताओं ने प्रवासियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने के मकसद से विदेश यात्राएं भी की हैं। लेकिन जरूरत ओरिएंटेशन बदलने की है।
बहुत लोग चौकेंगे अगर कहा जाए कि बिहार ने सबसे पहले मुक्त अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने और प्रवासी बिहारियों को अपने यहां निवेश के लिए आकर्षित करने का प्रयास किया था। यह जान कर तो और भी हैरानी होगी यह प्रयास लालू प्रसाद ने मुख्यमंत्री रहते किया था। आम धारणा है कि 1991 में उदार आर्थिक नीतियों को अपनाने के बाद सबसे पहले गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब आदि औद्योगिक रूप से अति विकसित राज्यों ने प्रवासियों को लुभाने की सफल कोशिश की। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि 1995 में यानी आज से 15 साल पहले बिहार सरकार ने प्रवासियों का एक सम्मेलन किया था। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन की ओर से इसका आयोजन हुआ था और तब उम्मीद बंधी थी कि बिहार विदेशी निवेश का हब बनेगा। तब झारखंड बिहार का हिस्सा था और खनिज और मैनपावर दोनों बिहार में बहुतायत में थे। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन को छह महीने लगे थे, इस आयोजन को करने में। 1994-95 में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन आदि देशों की यात्रा करके बिहार में प्रवासियों के निवेश का माहौल बनाया था। लेकिन बिहार में निवेश आना शुरू होता उससे पहले ही लालू प्रसाद चारा घोटाले में फंस गए और उसके बाद हालात बिगड़ते चले गए। आज उसके 15 साल बाद बिहार एक बार फिर उसी मुकाम पर खड़ा है, जहां 1995 में था।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी, प्रवासी भारतीय दिवसों में जा रहे हैं। वहां बिहार का स्टॉल लगता है। बदलते बिहार की झांकी बाहर से आए लोगों खास कर प्रवासी बिहारियों को दिखाई जाती है। वे इसकी तारीफ करते हैं, और वापस चले जाते हैं। नितांत वैयक्तिक स्तर पर इक्का-दुक्का प्रवासी बिहारियों ने बिहार में किसी विकलांग की, किसी पिछड़े दलित की या किसी गरीब की मदद की है। कहीं एकाध एंबुलेंस वगैरह दान में दिए गए हैं। लेकिन ढेर सारे वादे जरूर बिहार को मिले हैं। प्रवासी बिहारियों का वादा है कि वे लौटेंगे और अपने राज्य को इसका गौरवशाली अतीत वापस दिलाने के लिए काम करेंगे। बिहार के लोग और सरकार उस दिन का इंतजार कर रही है। फैज के शब्दों में कहें तो – ‘‘कब ठहरेगा दर्दे दिल कब रात बसर होगी, सुनते थे वे आएंगे, सुनते थे सहर होगी।’’ बिहार में विकास की सहर की उम्मीद में वहां के आठ करोड़ लोग बैठे हैं। लेकिन क्या विकास का यह सबेरा प्रवासी बिहारियों के जरिए आएगा। शायद नहीं। मेरे नहीं कहने के कई ठोस कारण हैं। पहला कारण यह है कि महाराष्ट्र, गुजरात या पंजाब के प्रवासियों के मुकाबले  बिहार के प्रवासियों की स्थिति अलग है।
बिहार के प्रवासी दुनिया के दूसरे देशों में जाकर उद्यमी नहीं बने हैं। उन्होंने अपना उद्यम शुरू कर कोई बड़ा एंपायर खड़ा नहीं किया है। परंपरा से बिहार ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था वाला राज्य रहा है। इसलिए चाहे भारत के दूसरे हिस्सों में जाकर बसे बिहारी हों या देश छोड़ कर दुनिया के विकसित-अविकसित देशों में गए बिहारी हों, वे वहां नौकरी कर रहे हैं। वे दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों में हैं, लेकिन इक्का-दुक्का गौरवशाली अपवादों को छोड़ दें तो वे उन कंपनियों के निचले या मध्य मैनेजमेंट का हिस्सा हैं। कंपनी उनकी नहीं है। इसलिए वे उस कंपनी को बिहार में निवेश करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, त्रिनिडाड आदि देशों को छोड़ दें तो दूसरे देशों में बिहार के प्रवासी अपेक्षाकृत देर से पहुंचे है। इसलिए वहां की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अभी अपना वैसा हस्तक्षेप नहीं बना पाए हैं, जैसा कि गुजरात या पंजाब या दक्षिण भारत के लोगों ने बनाए हैं। शिक्षा और शोध के क्षेत्र में भी कमोबेश यहीं स्थिति है। एक छोटे से तथ्य से इसको समझा जा सकता है कि आज तक बिहार क्या पूरी हिंदी पट्टी के किसी व्यक्ति को नोबल या बुकर जैसा कोई पुरस्कार नहीं मिला है। कहने का आशय यह है कि प्रवासी बिहारी आर्थिक या औद्योगिक मामलों में बहुत बड़ी मदद देने की स्थिति में नहीं हैं। दूसरा कारण यह भी है कि झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार की स्थिति ऐसी नहीं है कि औद्योगिक विकास के मैप पर उसे स्थापित किया जा सके। दुनिया के सबसे बड़े स्टील कारोबारी एल एन मित्तल की नजर बिहार के पड़ोसी झारखंड़ और उड़ीसा दोनों पर है, लेकिन बिहार उनके राडार पर नहीं है। यह एक हकीकत है, जिसे समझ कर ही बिहार के नए हुक्मरानों को अपनी प्रवासी निवेश आमंत्रित करने की रणनीति बनानी चाहिए। दुनिया के विकसित देशों में जो प्रवासी भारतीय हैं, वे ज्यादा से ज्यादा निजी स्तर पर बिहार की मदद के लिए आगे आ सकते हैं।
पिछले तीन सालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने हैदराबाद, चेन्नई और दिल्ली के प्रवासी भारतीय दिवस में बदलते बिहार को शो केस किया है। दोनों नेताओं ने प्रवासियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने के मकसद से विदेश यात्राएं भी की हैं। लेकिन जरूरत ओरिएंटेशन बदलने की है। बिहार सरकार का फोकस इस बात पर होना चाहिए कि वह अपने प्रवासियों का इस्तेमाल बिहार की छवि बेहतर करने के लिए करे। उन्हें निवेश करने के लिए आमंत्रण देने की बजाए उन्हें अपना एंबेसडर बना कर भारत के भीतर और विश्व बिरादरी के सामने बिहार की छवि चमकाने के काम में लगाए। बिहार में निवेश की संभावना पर्यटन, कृषि आधारित उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में है। पर्यटन के लिहाज से बौ( धर्मावलंबी देशों में भारत को अपनी छवि ठीक करना चाहिए। सड़क सहित बुनियादी ढांचे में कामचलाऊ सुधार कर जापान, थाईलैंड, कोरिया, श्रीलंका आदि देशों को इस बात का प्रस्ताव देना चाहिए कि बिहार में बौ( धर्मस्थलों के विकास पर वे निवेश करें। इस सेक्टर में निवेश का काम प्रवासी बिहारी खुद नहीं कर सकते हैं, वे इस सेक्टर में निवेश के लिए वे बिहार के ब्रांड एंबेसडर बन कर निवेशकों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। इसी तरह शिक्षा का क्षेत्र है। केंद्रीय कैबिनेट ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपना कैंपस खोलने की इजाजत दे दी है। ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज से लेकर दुनिया भर के संस्थान भारत में आएंगे क्या इनमें से कोई बिहार में भी अपना कैंपस खोलेगा? शिक्षा के क्षेत्र में झंडे गाड़ कर रहे बिहारियों और प्रवासी बिहारियों को इस क्षेत्र में जोर लगाना चाहिए। वे शिक्षा के अहम केंद्र के रूप में बिहार को प्रमोट करें। बिहार के छात्रों से देश भर के कोचिंग और शैक्षिक संस्थान चल रहे हैं।
विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस बिहार में खुले तो पलायन रूकेगा और अर्थव्यवस्था का खासा फायदा होगा। बिहार के हजारों की संख्या में डॉक्टर ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा चला रहे हैं। बहुत से डॉक्टर ऐसे हैं, जो ब्रिटेन में नौकरी लगने की उम्मीद में बेरोजगारी झेल रहे हैं। बिहारी डॉक्टरों का यह डायसपोरा बिहार की स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए बहुत कुछ कर सकता है। इसी तरह से अमेरिका की साफ्टवेयर इंडस्ट्री में बिहारी इंजीनियरों की भरमार है। वे बिहार में साफ्टवेयर डेवलपमेंट के प्रोजेक्ट शुरू कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए भी बिहार सरकार को पहले बुनियादी सुविधाएं जुटानी होंगी। सड़क, बिजली, पानी आदि ऐसी बुनियादी चीजें हैं, जिनकी बिहार में कमी है। इस वजह से अगर कोई प्रवासी बिहारी निजी तौर पर कुछ करना चाहे तो वह नहीं कर पाता है। कई साल पहले बिहार के तब के मुख्य सचिव जी एस कंग अधिकारियों के एक दल के साथ अमेरिका गए थे। वहां उन्हें कई इंजीनियरों ने दो-चार महीने के भीतर ही बिहार में अपना प्रोजेक्ट शुरू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन एक भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआ। कंग के इस दौरे में आईटी सेक्टर में सफलता हासिल करने वाले मिहिर चौधरी और रवि वर्मा ने बिहार में साफ्टवेयर डेवलपमेंट ऑॅफिस खोलने का भरोसा दिया था। स्टैट नर्स इंटरनेशनल के जयधर गुप्ता को नर्सिग इंस्टीच्यूट खोलना था तो गैरी मिश्रा को मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करना था। लेकिन इनके ज्यादातर प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए। अब उन देशों की बात करते हैं, जहां प्रवासी बिहारी बहुत  पहले गए। इतिहास गवाह है कि बिहार के प्रवासियों ने भारत से बाहर जाकर आधा दर्जन देश बसाए हैं।
मॉरीशस से लेकर सूरीनाम, फिजी, गुयाना, त्रिनिडाड आदि देश भोजपुरी बोलने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से गए लोगों ने बसाए हैं। अपनी अस्मिता को बचाए रखकर स्थानीय आबादी के साथ अद्भुत तादात्म्य बिहार के लोगों ने बनाया। अपनी जमीन से बहुत दूर जाकर बिहार के लोगों ने देश बसा दिए और खुद को वहां का बना लिया। इन देशों की राजनीतिक सत्ता से लेकर औद्योगिक व शैक्षिक प्रतिष्ठानों तक में बिहार के प्रवासियों की हिस्सेदारी है। ये वहां की मुख्यधारा में शामिल हैं। लेकिन इन देशों की बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। ग्लोबल इकोनॉमी में ये देश कहीं नहीं ठहरते हैं। इनमें से ज्यादातर देशों को खुद ही मदद की दरकार रहती है। एक मॉरीशस को छोड़ दें तो शायद कोई और देश बिहार की किसी किस्म की मदद शायद ही कर पाए। तभी मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने मॉरीशस की यात्रा की। वहां बिहार दिवस में हिस्सा लिया। बिहार में निवेश के रूप में इसका कम महत्व है, लेकिन ब्रांडिंग के लिहाज से यह एक अच्छा कदम था। ऊपर बताए गए देशों के ठीक उलट बिल्कुल पड़ोस में बिहार के प्रवासियों का संघर्ष आज भी जारी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में बिहार के प्रवासी अपने अस्तित्व की लडाई लड़ रहे हैं।
आजादी के तुरंत बाद बिहार के जो मुसलमान पूर्वी बंगाल यानी आज के बांग्लादेश चले गए थे, उनमें से ज्यादातर आज भी मोहाजिर का टैग लगा कर दर बदर भटक रहे हैं। पाकिस्तान और पूर्वी बंगाल के बीच छिड़ी लड़ाई में इन बिहारी लोगों ने पाकिस्तान का पक्ष लिया था। यु( खत्म होने के बाद जब बांग्लादेश का गठन हो गया तो पाकिस्तानी सैनिक इन्हें वहीं छोड़ कर वापस लौट गए। दशकों तक इन लोगों को बांग्लादेश में संदेह की नजर से देखा गया। इन्हें न तो पाकिस्तान ने अपनाया और न बांग्लादेश ने। दो साल पहले बांग्लादेश की एक अदालत ने बिहारी मुसलमानों को नागरिकता और वोटिंग के अधिकार दिलाने का फैसला किया। जो बिहारी मुसलमान पाकिस्तान में हैं, वहां भी वे दोयम दर्जे के नागरिक माने जाते हैं। बुनियादी रूप से पाकिस्तान के कराची और बांग्लादेश के ढाका में बिहारी मुसलमान बसे हैं और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बिहार के प्रवासियों की संख्या काफी है। बिहार से प्रवासन दो तरह का हुआ है – अंतर्देशीय और अंतरराष्ट्रीय। भारत के भीतर दूसरे राज्यों में भी बिहारियों की संख्या खूब है और दुनिया के देशों में भी है। केरल के बाद संभवतः बिहार में सबसे ज्यादा बाहरी धन आता है। लेकिन यह धन निजी तौर पर और पारिवारिक संपत्ति के रूप में आता है। इसलिए हो सकता है कि प्रवासी बिहारियों के परिजनों की आर्थिक हालत सुधरती हो, सामूहिक रूप से बिहार की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आता है। हालांकि इससे भी राज्य की स्थिति सुधरेगी, पर उसमें बहुत अधिक समय लगेगा। इसलिए बिहार सरकार को नई रणनीति पर काम करना चाहिए। उसे प्रवासी बिहारियों को अपना ब्रांड एंबेसडर बना कर उनसे लॉबिंग करानी चाहिए। बिहार की बदली हुई छवि की ब्रांडिंग प्रवासी बिहारी कर सकते हैं।

विकास के माहौल की बाट जोहते प्रवासी बिहारी

यकीन मानिए जहां तक पुश फैक्टर की बात है बिहार आज भी लोगों को उतना ही बाहर की ओर ठेलता है जितना कि पहले।
प्रवास बिहार और बिहारियों की आदत रही है, फितरत रही है और जरूरत तो खैर रही ही है। ये कोई आजकल की बात नहीं, पिछले डेढ़-पौने दो सौ साल रिकॉर्ड उठाकर देख लिजिए। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से ही ये सिलसिला शुरू हो गया। माइग्रेशन के लिहाज से देखिए बिहार बड़ा क्लासिकल केस स्टडी लगता है। पुश और पुल फैक्टर की थ्योरी कितनी सटीक है, बिहार उसकी मिसाल है। शुरू-शुरू में तो जरूरत थी फिरंगियों के राज में भूखों मरना ही है तो क्यों ना दुनिया के दूसरे छोर भी देखते चलें।बिहार के लिए कम पॉपुलेशन कभी प्रॉब्लम रहा, लोग प्रचुर मात्रा में थे। बाढ़ और अकाल से अनाज भले ही कम पड़ जाए। पूरे ब्रिटिश राज या फिर उसके बाद भी प्रवास जारी रहा, लेकिन तब यहां के लोग प्रोफेशनल डिग्री से लैस होकर नहीं निकलते थे। खून पसीने की कमाई के सहारे ने उन्हें बचाए रखा और जहां गए दूब की तरह पसरने लगे।अगर हम अपने वतन-मिट्टी जैसी भावनाओं को ढाल ना बनाएं तो कुल मिलाकर हालात तकरीबन हमेशा से वैसे रहे हैं कि किसी को बिहार छोड़ने से पहले बहुत सोचना पड़ा हो या फिर हिचक रही हो। साथ ही अगर दूर रहकर भी संपर्क साधने का ऑप्शन भी मौजूद हो तब तो कतई नहीं। लेकिन पिछले पांच दशकों में बिहार से होने वाले विदेशों को प्रवास में गुणात्मक बदलाव आए हैं। सिर्फ मजदूरों की जगह लोग पढ़ लिखकर बाहर निकलने लगे, खासकर ग्लोबलाइजेशन के बाद तो पहले की बूंदी बांदी की जगह बाढ़ ने ले ली। लेकिन यकीन मानिए जहां तक पुश फैक्टर की बात है बिहार आज भी लोगों को उतना ही बाहर की ओर ठेलता है जितना कि पहले। नहीं तो बिहार कोई तमिलनाडु, केरल और गुजरात नहीं है कि राजेंद्र चोल इंडोनेशिया पहुंच गए और गुजराती नैरोबी। किसी कॉन्टिनेंटल लोकेशन वाले लैंड लॉक्ड इलाके से विदेशों या दूसरे हिस्सों के लिए इतनी तादाद में प्रवास कैसे हो सकता है।
पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने सब कुछ तहस नहस किया फिर लालू जी बुल्डोजर चला गए। एक राज्य किसी एक मुख्यमंत्री के राज में इतना नीचे नहीं जा सकता, शायद ये वर्ल्ड रिकार्ड होगा। नीतीश भी बदलाव की बत्ती जलाने का दावा तो करते हैं, लेकिन दीया टिमटिमा ही रहा है। आज भी इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती कि नीतीश भी लालू स्टाइल में शिक्षा को अछूत बनाने पर क्यों आमादा हैं। बिहार की हालत वहां के लोगों को हर स्तर पर प्रवास करने पर मजबूर करती है। लोगों को बांधकर रखने वाली वजह ही नहीं दिखती। खेती जो हर साल पिटती है, औद्योगिकरण जो किसी अश्लील मजाक की तरह लगता है और शिक्षण संस्थान जो नालंदा की तरह सिर्फ अपने इतिहास को सहलाने में लगे हैं वर्तमान कुछ नहीं दिखता। याद किजिए अस्सी और नब्बे के दशक, जब बिहार की यूनिवर्सिटियां पैसेंजर तरह की लेट होने लगी। तीन साल की डिग्री पांच साल में मिलने लगी। अब भरी जवानी में ठेठ दो साल की बेरोजगारी कौन बर्दाश्त करता जो बिहार में रहे। डीयू, बीएचयू और इलाहाबाद में बिहारी जमा होने लगे।जब पांच कॉलेजों की पटना यूनिवर्सिटी नहीं संभल रही तो आप क्या उम्मीद कर सकते हैं।  अब तो आलम ये है कि इंजिनियरिंग मेडिकल के लिए पटना में जमा जमाया कोचिंग का बिजनेस भी दिल्ली और कोटा शिफ्ट हो गया है। लड़के दसवीं बोर्ड और बंसल का टेस्ट एक ही लय में देते हैं।
मान लिया गया कि कोई कायदे का काम वहां हो ही नहीं सकता। पूरे आंध्र में से हैदराबाद को निकाल ले तो क्या बचेगा… लेकिन जब चंद्रबाबू उसे सिलकन वैली बनाने के लिए देश विदेश का दौरा कर रहे थे, लालू जी लाल बुझक्कड़ बने बुझौवल बुझा रहे थे ई आईटी वाईटी क्या होता है। गलत वक्त पर गलत फैसला, बदलाव के दौर में जब राज्य का पुनर्निमाण हो सकता था हम जोकरई में गुजार गए। सांप गुजर गया हम लकीर पीटने में लगे हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि हालात आज भी नहीं बदले हैं। नीतीश जी दरभंगा में भाषण देते हैं कि वो बिहार की नई नवेली दुल्हनों को अपने पिया के विरह से उबार लेंगे, और उसी महीने दरभंगा स्टेशन से सवा लाख लोग पंजाब की राह कट लेते हैं, इस तरह के जोक मोबाइल एसएमएस में नहीं आते अखबारों और टेलिविजन पर दिखते हैं। जो चीजें दूसरे राज्यों की रीढ़ बनकर उभरी है बिहार में आज भी हवा हवाई है। सेज, ड्राई पोर्ट, आईटी सिटी, फिल्म सिटी और राज्य में छात्रों की संख्या और उनकी काबलियत के मुताबिक कैंपस। बिहार में देश के सबसे मेहनती और मेधावी छात्र हैं फिर भी कोश्चन आउट कराने राष्ट्रीय स्तर पर गिरोह का सरगना भी बिहारी ही निकला। आप बिहार की किसी संस्था के बारे में आंख मूंदकर ये यकीन नहीं कर सकते कि कदाचार को लेकर यहां जीरो टॉलरेंस है।अगर यकीन ना आए तो देख लिजिएगा देश में अभी 240 विदेशी विश्वविद्यालयों के आने की बात चल रही है, उनमें से कितनी बिहार का रुख करती हैं।
ये अलग बात है कि बिहार के लड़के अपनी दम खम पर दुनिया के किसी भी शिक्षण संस्थान में मिल जाएंगे, और रही बात पैसे की तो कम से कम पढ़ाई के नाम पर बिहार के मां-बाप कोई कसर नहीं छोड़ते भले ही जमीन जायदाद बेचनी पड़े।कुछ ऐसा ही हाल विदेशी निवेश को लेकर भी है, बिहार आज भी बुनियादी सुविधाओं की जंग लड़ रहा है और विदेशियों की छोड़िए अपने देश के धनकुबेर भी अभी तक प्रदेश की नब्ज टटोलने में ही लगे हैं कोई ठोस फैसला लेने से कतरा रहे हैं।जहां बड़े उद्योग धंधे पूंजी की कमी का सामना कर रहे हैं वही छोटे और गैर परंपरागत किस्म के उद्योग राजनीतिक इच्छाशक्ति के मारे हैं। एक दशक से ऊपर हुए जब उत्तर बिहार में फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स बिठाने की गोल गोल बातें की जा रही हैं, सवाल है प्रगति कितनी हुई। हाजीपुर का केला गांधी सेतु के टॉल और मुजफ्फरपुर की लीचियां ठेलों से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। कहा जाता है अगर मानव संसाधन कुशल और काबिल हो तो जनसंख्या की समस्या आड़े नहीं आती। लेकिन इस ओर किए जा रहे तमाम प्रयास नाकाफी नजर आते हैं। उपर से कुदरत का कोप अलग से, दो साल पहले कोसी के कहर ने लाखों परिवारों को बेघर किया, हजारों की तादाद में लोग सामान के नाम बची खुची यादें पोटलियों में समेटे देश के महानगरों का रुख किया। दिल्ली-मुंबई और सूरत के फुटपाथों पर पॉलीथीन की छत के नीचे रात काट रहे लोग उस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं जब वो वापसी की ट्रेन पकड़ेंगे। समस्या जाने की नहीं बल्कि इसकी है कि वहां जाकर करेंगे क्या। वाकई ये एक यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब तलाशने में हर कोई लगा है जो बिहार की सीमाओं से बाहर है, देखिए जवाब मिलता कम है।

बिहार में आलू उत्पादन का विश्व कीर्तिमान

पटना। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते रहे है कि वह देश की प्रत्येक थाली में बिहार का कोई उत्पाद परोसना चाहते हैं। लगता है कि नीतीश के इसी सपने को साकार करने के लिए बिहार के नालंदा जिले में कतरीसराय प्रखंड के देशपुरवा गांव के किसानों ने आलू उत्पादन का विश्व कीर्तिमान बनाया है।
मुख्यमंत्री के गृह जनपद, नालंदा के देशपुरवा गांव के किसानों ने जैविक खेती के माध्यम से प्रति हेक्टेयर 729 क्विंटल आलू पैदा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इतना उत्पादन कहीं भी दर्ज नहीं किया गया है। खेत से आलू निकालने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारियों का एक दल भी यहां पहुंचा।
फसल जांच सांख्यिकी विभाग द्वारा निर्धारित मापदंड के अनुसार 10.05 मीटर क्षेत्रफल से निकाले गए आलू का वजन 364.5 किलोग्राम पाया गया। नालंदा के जिलाधिकारी संजय कुमार अग्रवाल ने कहा है कि जैविक खेती के जरिए आलू के उत्पादन में देशपुरवा के किसानों ने नया कीर्तिमान बनाया है। उन्होंने कहा कि किसानों की मेहनत और सरकारी योजनाओं के लाभ के कारण ऐसी स्थिति हासिल की जा सकी है। किसान नीतीश कुमार ने कहा कि उन्होंने खेत में गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट, वॉम स्टार सहित कई मिश्रणों का इस्तेमाल किया।
गौरतलब है कि नालंदा में राज्य जैविक सब्जी प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत 2,500 हेक्टेयर में किसानों को जैविक उत्पादन क्रय करने का लाभ दिया जा रहा है। आलू उत्पादन का यह रिकार्ड अन्य किसानों के बीच व्याप्त कई भ्रांतियों को दूर करेगा।
नालंदा प्रगतिशील किसान संघ के राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि नालंदा में किसानों में खेती के प्रति जागरूकता पैदा हुई है। उन्होंने कहा कि कल तक जो लोग पलायन कर रहे थे, वे अब घर लौटकर खेती कर रहे है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार को बिहार विधानसभा में नालंदा के किसानों को आलू उत्पादन में रिकार्ड बनाने के लिए बधाई दी। उन्होंने सदन को सूचित किया कि नालंदा के किसानों ने जैविक खेती के जरिए प्रति हेक्टेयर 729 क्विंटल आलू का उत्पादन किया है। अब तक यह रिकार्ड हॉलैंड के नाम था, जहां प्रति हेक्टेयर 535 क्विंटल आलू का उत्पादन हुआ था। उल्लेखनीय है कि देशपुरवा के किसानों ने श्रीविधि तकनीक से धान का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 224 क्विंटल तक पहुंचा दिया है, जबकि पारंपरिक तरीके से यहां प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन 80 क्विंटल होता था। नालंदा के जिलाधिकारी भी मानते है कि केवल देशपुरवा के निवासी ही नहीं, बल्कि जिले के सैकड़ों किसान उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि कर रहे है। उन्होंने कहा कि पहले तो किसान पारंपरिक खेती को छोड़ने और आधुनिक तकनीक अपनाने को तैयार ही नहीं थे, परंतु प्रशासन द्वारा नई तकनीक से होने वाले नुकसान की भरपाई किए जाने के वादे के बाद किसान तैयार हो गए और अब नतीजा सबके सामने है।

बिहार में लगातार बढ़ रहे हैं निवेश के प्रस्ताव


पटना। बिहार में पिछले कुछ वर्षो से निवेश प्रस्तावों की संख्या में वृद्धि दर्ज की जा रही है। सरकार को अब आशा है कि निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए किए जा रहे कार्यो के कारण अब देश-विदेश के नामी-गिरामी निवेशक भी बिहार की ओर उन्मुख होंगे। पिछले छह वर्षो के दौरान राज्य निवेश प्रोत्साहन परिषद द्वारा कुल 603 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है तथा पिछले छह माह में निवेशकों के 117 प्रस्तावों को हरी झंडी दी गई है।
 निवेश के लिए रोड मैप है तैयार
 एसोसिएट चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने भी बिहार में निवेशकों में बड़े-बड़े उद्योगपतियों को लाने की योजना तैयार की है। बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष ओपी साह ने बताया कि औद्योगिक प्रोत्साहन नीति 2011 के बिहार में आने के बाद निवेशकों में राज्य के प्रति आकर्षण बढ़ा है। वह कहते हैं कि बिहार में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए लगातार बड़े शहरों और विकसित राज्यों में सेमिनार किया जा रहा है। गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली से लगातार उद्योगपतियों को लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि एसोचैम के साथ मिलकर अगले पांच वर्षो में जमीनी निवेश का (रोड मैप) तैयार किया गया है तथा इन्वेस्ट मार्ट के जरिये भी निवेशकों को आमंत्रित किया जाएगा। वह कहते हैं कि बिहार में उद्योग के प्रति बना अनुकूल माहौल और स्वच्छ प्रशासन के कारण निवेशकों की भी दिलचस्पी बढ़ी है।
 बिहार में निवेश की है काफी संभावनाएं
 ओपी साह कहते हैं उद्योग लगाने में समय लगता है इस कारण जिन प्रस्तावों पर सहमति मिल रही है उसे सरजमीं पर उतारने में समय लगेगा। हालांकि सरकार का प्रयास है कि जल्द से जल्द निवेशकों की परियोजनाएं धरातल पर आ जाएं। दिल्ली में पिछले वर्ष तीन दिवसीय प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन किया गया था। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बिहार के बदलते माहौल में प्रवासी भारतीय को निवेश के लिए आकर्षित करना एवं राज्य में अधिकाधिक पूंजी निवेश का मार्ग बनाना है। साह के मुताबिक एसोचैम ने भी बिहार में 14 क्षेत्रों में उद्योग-धंधों के विकास की अपार संभावनाएं बताई हैं। इनमें तांबे का बर्तन, खाद्य उत्पाद, गन्ना, मखाना, पेंटिंग, चमड़े के चप्पल-जूते, सिल्क हैंडलूम जैसे उद्योग प्रमुख हैं। एसोचैम की नजर में बिहार भी अब निवेश योग्य राज्य है।
 117 प्रस्तावों को सहमति मिली
 बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के सत्ता में आने के बाद निवेशकों के प्रस्तावों में तेजी आई। राज्य निवेश प्रोत्साहन परिषद के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2011 से जून 2011 तक परिषद द्वारा 63 प्रस्तावों को सहमति मिली, जबकि जुलाई 2011 से जनवरी 2012 तक निवेशकों के 117 प्रस्तावों को हरी झंडी दी गई। उद्योग विभाग के एक अधिकारी मानते हैं कि केवल निवेशकों के प्रस्ताव ही नहीं प्राप्त हो रहे हैं, बल्कि सरजमीं पर उनके उत्पादन भी शुरू हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक लगभग 60 से अधिक इकाइयों में उत्पादन कार्य शुरू हो गया है जबकि 120 इकाइयों में कार्य प्रगति पर है। अधिकारी बताते हैं कि इस वर्ष 50 इकाइयों में उत्पादन शुरू होने की संभावना है। वह कहते हैं कि परिषद द्वारा जिन 603 प्रस्तावों पर सहमति दी गई है, उसमें करीब तीन लाख करोड़ रुपये का निवेश होने की संभावना है।

Friday, 22 June 2012

प्रोफेसर साहब की अब हर दिन बनेगी हाजिरी

मुजफ्फरपुर, जाप्र : प्रोफेसर साहब को अब हर दिन कॉलेज जाना पड़ेगा। कॉलेज में घंटी रहे ना रहे, उन्हें कॉलेज जाना पड़ेगा। सरकार उनकी उपस्थिति को लेकर सख्त है। शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव एस शिव कुमार ने हाजिरी व्यवस्था को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया है। विभाग के निर्णय से कॉलेज शिक्षकों की बेचैनी बढ़ गयी है।
क्या है हाजिरी व्यवस्था : कॉलेज आने वाले शिक्षकों को हर दिन हाजिरी बनाना होगा। उपस्थिति पंजी में आने-जाने का समय अंकित होगा। इसे प्राचार्य द्वारा मुख्यालय को उपलब्ध कराया जाएगा।
केके पाठक ने की थी व्यवस्था
पूर्व शिक्षा सचिव केके पाठक ने इस व्यवस्था की शुरुआत की थी। हाजिरी को प्रत्येक दिन प्राचार्य विभाग को प्रेषित करते थे। इस भय से कॉलेजों की शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार शुरू हो गई थी। लेकिन उनका तबादला होते ही व्यवस्था ठंडे बस्ते में चली गई।
फिर से क्यों देना पड़ा आदेश प्रधान सचिव की अध्यक्षता में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा व मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के अंगीभूत महाविद्यालयों के प्राचार्यों की बैठक हुई थी। इसमें खुलासा हुआ कि प्रोफेसर हाजिरी नहीं बनाते हैं। इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए प्रधान सचिव ने कहा कि हर हाल में हाजिरी व्यवस्था सुनिश्चित कराई जाए।

वृक्षारोपण अभियान पर जोर

मनरेगा के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की योजना शुरू की जाएगी। जिला स्तर पर इसका पर्यवेक्षण होगा और इस हेतु नियंत्रण कक्ष कार्यरत रहेगा। जिले के प्रभारी मंत्री सह खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्याम रजक की अध्यक्षता में अनुमंडल कार्यालय खिजरसराय के सभागार में आयोजित बैठक में उपरोक्त निर्णय लिया गया। जिलाधिकारी ने उस योजना में विकलांग और विधवाओं को लगाने पर जोर दिया। उन्होंने इनकी सूची की मांग की।
इंदिरा आवास योजना की समीक्षा के क्रम में द्वितीय किस्त की राशि शीघ्र देने एवं अपूर्ण योजनाओं को पूरा करने का निदेश दिया गया। मंत्री ने विद्युत विभाग के अभियंताओं को क्षेत्र में जाकर लोगों की समस्याएं दूर करने को कहा। उन्होंने आईसीडीएस की समीक्षा के दौरान कहा कि सीडीपीओ ओर महिला पर्यवेक्षिकाएं क्षेत्र में निर्भिक होकर काम करें। उन्होंने कहा कि यदि कोई उन्हें धमकी देता हे तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होगी।
आपूर्ति विभाग की समीक्षा के क्रम में बताया गया कि अनुमंडल में 90 प्रतिशत कूपन का वितरण हुआ है। चारों प्रखंडों में गेहूं अधिप्राप्ति का कार्य भी चल रहा है। किरासन तेल का उठाव अद्यतन है। सामाजिक सुरक्षा की समीक्षा के दौरान बताया गया कि अनुमंडल का लक्ष्य पूरा हो गया है। मंत्री ने कहा कि विधवा पेंशन हेतु मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में पदाधिकारी लाभुक को सहयोग करे।
मंत्री को बैठक में बताया गया कि मध्याह्न भोजन योजना के तहत सभी विद्यालयों में चावल बंट गया है तथा पैसा ट्रांसफर कर दिया गया है। मंत्री ने इस बात की आवश्यकता जताई कि मध्याह्न भोजन बने और सही बच्चों को मिले। बैठक में कन्या विवाह योजना, नियमित टीकाकरण आदि की भी समीक्षा की गई और महत्वपूर्ण निदेश दिए गए। बैठक में विधायक एवं विधान पार्षद, जिलाधिकारी, अपर समाहत्र्ता, नीमचक बथानी के अनुमंडल पदाधिकारी, डीसीएलआर एव अन्य पदाधिकारीगण, विभिन्न विभागों के पदाधिकारी एवं अन्य लोग उपस्थित थे।
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आरटीआई का लाभ उठाएं ग्रामीण : मंत्री
गया: सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी होने पर लिखित रूप से शिकायत करें, कार्रवाई जरूर होगी। उपरोक्त बात खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग सह गया जिला प्रभारी मंत्री श्याम रजक ने उवि खिजरसराय में आयोजित जनता दरबार में शुक्रवार को कही। उन्होंने आम जनता की शिकायतें सुनने के क्रम में सेवा का अधिकार अधिनियम का लाभ उठाने को कहा। मनरेगा के तहत जेसीबी से कार्य कराए जाने की शिकायत पर जांच के आदेश दिए गए।
उन्होंने जनता दरबार में शिक्षा ऋण की मांग करने वाले एक विद्यार्थी को 23 जून को गया में लगने वाले ऋण शिविर में आने को कहा। रोनिया पंचायत के एक परिवादी द्वारा यह शिकायत करने पर कि विकास मित्र द्वारा 50 रुपये लेकर कूपन दिया जाता है, विकास मित्रों के कार्य की समीक्षा का आदेश दिया गया। इसके बाद ही उनके नियुक्ति का पुनर्नवीनीकरण होगा। मंत्री द्वारा कुतुलपुर मवि में भवन संबंधी कार्य कराने का निदेश दिया गया।
जनता दरबार में शिक्षा, बिजली, मध्याह्न भोजन योजना, इंदिरा आवास, आपूर्ति, स्वास्थ्य, विकास, आईसीडीएस आदि से संबंधित अनेक मामले आए जिन पर त्वरित कार्रवाई करने का निदेश संबंधित पदाधिकारियों को दिया गया। इस अवसर पर कृष्णनंदन यादव एवं विधान पार्षद अनुज कुमार सिंह उपस्थित थे। साथ ही डीएसम, एडीएम सहित कई प्रशासनिक एवं पुलिस पदाधिकारी उपस्थित थे।

history of bihar

बिहार, बुद्ध की प्राचीन भूमि, भारतीय इतिहास का स्वर्णिम दौर देखा गया है. यह वही देश है जहाँ पहले गणराज्य के बीज बोया गया और जो लोकतंत्र की पहली फसल की खेती की जाती है.इस तरह की उपजाऊ मिट्टी है कि जो देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ज्ञान और ज्ञान का प्रकाश फैला innumerous बुद्धिजीवियों को जन्म दिया है. राज्य पटना, जो कि पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है पर इसकी राजधानी है. राज्य के रूप में यह आज है बंगाल के प्रांत से अपनी विभाजन से आकार का है और सबसे हाल ही में आदिवासी दक्षिणी क्षेत्र की जुदाई के बाद अब झारखंड बुलाया.


प्राचीन इतिहासवर्तमान में बिहार के रूप में जाना जाता है बड़े पैमाने पर भूमि का इतिहास बहुत प्राचीन है. वास्तव में, यह मानव सभ्यता के बहुत सुबह तक फैली हुई है. जल्द से जल्द मिथकों और हिंदू धर्म सनातन धर्म (अनंत) के दिग्गजों - बिहार के साथ जुड़े रहे हैं. भगवान राम की पत्नी सीता, बिहार की राजकुमारी थी. वह राजा जनक Videha की बेटी थी. मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, मधुबनी, दरभंगा और की वर्तमान जिलों, उत्तर - मध्य बिहार, निशान इस प्राचीन राज्य. सीतामढ़ी की वर्तमान छोटी बस्ती यहाँ पर स्थित है. पौराणिक कथा के अनुसार, सीता का जन्मस्थान Punaura, सीतामढ़ी, जिले के मुख्यालय के पश्चिम तरफ स्थित है. राजा जनक की राजधानी है, और जगह है जहां भगवान राम और सीता की शादी कर रहे थे, जनकपुर, नेपाल में सीमा पार स्थित है. पूर्वोत्तर रेलवे के दरभंगा खंड - यह Janakapur रोड के रेल स्टेशन के सीतामढ़ी जिले में स्थित है, Narkatiyaganj पर के माध्यम से पहुँचा है. यह महज संयोग नहीं है, इसलिए, कि हिंदू महाकाव्य के मूल लेखक - रामायण - महर्षि वाल्मीकि - प्राचीन बिहार में रहते थे. वाल्मीकि नगर के एक छोटे शहर और पश्चिमी चंपारण जिले, उत्तर पश्चिमी बिहार में Narkatiyaganj के रेलवे स्टेशन के करीब में एक रेलवे स्टेशन है. शब्द चंपारण चंपा - arnya, या सुगंधित चंपा (मैगनोलिया) पेड़ के एक जंगल से व्युत्पन्न है.
और बौद्ध धर्म के महान धर्म का जन्म हुआ, यह यहाँ कि राजकुमार गौतम ज्ञान प्राप्त था, बुद्ध - वर्तमान बोध गया - मध्य बिहार में एक शहर बन गया यहाँ यह भी है कि भगवान महावीर, एक और महान धर्म, जैन धर्म के संस्थापक, पैदा हुआ था और निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त. साइट है कि pawapuri की वर्तमान शहर में स्थित है, पटना, बिहार. की राजधानी के दक्षिण पूर्व के लिए कुछ मील की दूरी पर, यह यहाँ है कि सिखों के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ और सिख संतत्व प्राप्त , कि एक गुरु बन गया है. एक सुंदर और राजसी गुरुद्वारे (सिखों के लिए एक मंदिर) उसकी याददाश्त स्मरण करने के लिए बनाया - हरमंदिर-पूर्वी पटना में स्थित है. भक्तिभाव से पटना साहिब के रूप में जाना जाता है, यह एक worhip के पाँच पवित्रतम स्थानों (तखत) सिखों के लिए है.
मगध और Licchavis के प्राचीन राज्यों, 7 8 वीं सदी ई.पू. के बारे में चारों ओर, जो प्रशासन की एक प्रणाली है कि वास्तव में statecraft के आधुनिक कला के पूर्वपुस्र्ष है, और अर्थशास्त्र के साथ statecraft के संबंध के तैयार शासकों का उत्पादन किया. कौटिल्य, अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र के आधुनिक विज्ञान के पहले ग्रंथ के लेखक यहाँ रहते थे. इसके अलावा चाणक्य के रूप में जाना, वह मगध के राजा को चतुर और चालाक सलाहकार, चंद्रगुप्त मौर्य था. चंद्रगुप्त मौर्य के एक दूत के रूप में, चाणक्य राज्य के हितों को बढ़ावा देने और भारत के उत्तर पश्चिम में बसे यूनानी आक्रमणकारियों से निपटने की खोज में दूर है और व्यापक सिंधु घाटी साथ, कूच. वह यूनानियों के आगे के हमले को रोकने में succeded. दरअसल, वह यूनानी और मौर्य साम्राज्य के बीच सौहार्दपूर्ण सह - अस्तित्व के बारे में लाया. Megasthenes, सिकंदर, सेल्यूकस Necator के एक दूत, पाटलिपुत्र में 302 ई.पू. के आसपास (पटना मौर्य पूंजी के प्राचीन नाम) रहते थे वह पाटलिपुत्र में और चारों ओर जीवन का एक इतिहास के पीछे छोड़ दिया है. यह पहली रिकॉर्ड खाते भारत में एक विदेशी यात्री से है. यह ज्वलंत मामले में पाटलिपुत्र, एक राजा अजातशत्रु द्वारा स्थापित, नदियों सोन और गंगा के संगम पर 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास शहर में जीवन की भव्यता का वर्णन है.


एक अन्य Mauryan राजा, अशोक, (भी प्रियदर्शी या Priyadassi के रूप में जाना जाता है), 270 ई.पू. के आसपास, एक लोगों के शासन के लिए फर्म सिद्धांतों तैयार करने के लिए पहली बार था. उन्होंने इन सिद्धांतों, अशोक के तथाकथित शिलालेखों, जो उसके राज्य भर में लगाए गए पत्थर के खम्भों पर खुदा था. इस स्तंभ में एक या एक से अधिक शेर जो पहियों के प्रतीकों के साथ अंकित किया गया था एक पीठ के शीर्ष पर बैठे की मूर्ति के साथ ताज पहनाया गया. शेर शक्ति के रूप में चिह्नित, पहिया सत्य का शाश्वत (अंतहीन) प्रकृति (धर्म), इसलिए नाम धर्म चक्र (या Dhamma) चिह्नित. एक कुरसी के ऊपर शेर का यह आंकड़ा, एक पहिया के शिलालेख के साथ, भारत के स्वतंत्र गणराज्य (1947) के आधिकारिक सील के रूप में अपनाया गया था. इसके अलावा, अशोक के धर्म चक्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज, भारतीय तिरंगा में शामिल किया गया था. इन स्तंभों में से कुछ के अवशेष अभी भी विद्यमान हैं, उदाहरण के लिए Lauriya नंदन गढ़ पर पश्चिमी चंपारण जिले में और वैशाली में एक ही नाम के वर्तमान जिले में. अशोक, टोलेमी और यूक्लिड के समकालीन, एक महान विजेता था. उसका साम्राज्य क्या अब उत्तर पश्चिम में पश्चिम सीमांत प्रांत (पाकिस्तान में) से बढ़ा है, उत्तर में मौजूद भारत के पूर्वी सीमाओं के लिए, और निश्चित रूप से, दक्षिण में विंध्य रेंज. अशोक बौद्ध धर्म में लोगों की बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के लिए भी जिम्मेदार था. वह इस उद्देश्य के लिए अपने बेटे, राजकुमार महेंद्र, और बेटी, संघमित्रा, श्रीलंका (प्राचीन काल में सिंहल Dweep के, और ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान सीलोन की वर्तमान देश के रूप में दूर दक्षिण के रूप में भेजा कुछ इतिहासकारों, विशेष रूप से सिंहली, महिंद्रा पर विचार और भाई और बहन के रूप में sanghmitra.
प्राचीन बिहार में भी राज्य के मामलों के मामलों में महिलाओं की स्तुति देखा. यहां यह था कि आम्रपाली, वैशाली की Lichhavis के राज्य में एक वेश्या (एक ही नाम के वर्तमान जिले), उपलब्ध है और भारी बिजली ताकतें. यह कहा कि भगवान बुद्ध, वैशाली के लिए अपनी यात्रा के दौरान, कई प्रधानों के निमंत्रण से इनकार कर दिया, और को आम्रपाली साथ रात के खाने के बजाय चुना है. कई सदियों ई.पू. के बिहारी समाज में महिलाओं की स्थिति थी!
एक छोटे से ज्ञात है, लेकिन ऐतिहासिक और archaeologically प्रलेखित घटना, इस संदर्भ में उल्लेख है. आम्रपाली के साथ अपनी यात्रा के बाद, भगवान बुद्ध कुशीनगर की ओर अपनी यात्रा (बौद्ध ग्रंथों में भी Kusinara कहा जाता है.) के साथ जारी रखा, वह नदी गंडक (भी बुलाया नारायणी, जो चंपारण की पश्चिमी सीमा के निशान एक जिले अब प्रशासकीय नियंत्रण के पूर्वी बैंकों साथ यात्रा दो पश्चिम और पूर्वी चंपारण में विभाजित) अपने समर्पित Licchavis के साथ भगवान बुद्ध की इस यात्रा में एक बैंड है. एक जगह Kesariya के रूप में जाना जाता है वर्तमान (अर्थ, पूर्व) पूर्बी चंपारण जिले में, पर, भगवान बुद्ध की रात के लिए आराम कर लिया. यहां यह था कि वह अपने चेलों को अपनी आसन्न niravana (अर्थ, मृत्यु) की खबर की घोषणा करने के लिए चुना है, और उन्हें वैशाली को वापस करने के लिए implored. Licchavis बेतहाशा रोना रोते है कि कोई भी होगा. वे लगातार छोड़ इनकार कर दिया. जिस, भगवान बुद्ध, उन्हें और खुद के बीच 3,000 फुट चौड़ा धारा बनाने के द्वारा उन्हें छोड़ने के लिए मजबूर. एक स्मारिका के रूप में वह उन्हें अपने भीख - कटोरा दे दिया. Licchavis, सबसे अनिच्छा और बेतहाशा उनके दुख व्यक्त, छुट्टी ले ली और एक स्तूप का निर्माण करने के लिए घटना का स्मरण है. भगवान बुद्ध चुना था कि उसके आसन्न निर्वाण की घोषणा करने के लिए स्थान क्योंकि, जैसा कि वह अपने शिष्य आनंद से कहा, वह जानता था कि एक पिछले जीवन में वह उस जगह है, अर्थात्, Kesariya, से एक चक्रवर्ती राजा, राजा बेन के रूप में शासन किया था. (फिर से, यह महज किंवदंती मिथक, या लोक - विद्या नहीं है बल्कि, यह एक historiclly प्रलेखित तथ्य पुरातात्विक निष्कर्षों द्वारा समर्थित है. हालांकि, न तो बुद्ध के जीवन के इस हिस्से और न ही Kesariya के छोटे से शहर, अच्छी तरह से जाना जाता है भारत या बिहार में भी.
नालंदा, दुनिया की उच्च शिक्षा की पहली सीट पर, एक विश्वविद्यालय, गुप्ता अवधि के दौरान स्थापित किया गया था. यह मध्य युग तक सीखने, जब मुस्लिम आक्रमणकारियों नीचे उसे जला की एक सीट के रूप में जारी रखा. खंडहर एक संरक्षित स्मारक है और एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल रहे हैं. एक संग्रहालय और एक शिक्षा केंद्र 'नव नालंदा महावीर - यहां स्थित हैं.
आसपास के, राजगीर, बिम्बिसार के शासनकाल के दौरान Muaryan साम्राज्य की राजधानी था. यह बार बार भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने दौरा किया था. वहाँ कई बौद्ध यहाँ खंडहर हैं. यह भी अच्छी तरह से इसके कई हॉट स्प्रिंग्स, जो दुनिया में कहीं और समान हॉट स्प्रिंग्स - जैसे, औषधीय संपत्ति है प्रतिष्ठित कर रहे हैं के लिए जाना जाता है.


मध्यकालीन इतिहासगुप्त काल - बिहार की इस गौरवशाली इतिहास 7 या 8 वीं सदी के मध्य के आसपास तक चली, जब उत्तरी भारत के सभी मध्य पूर्व से आए हमलावरों द्वारा लगभग विजय के साथ, गुप्ता राजवंश भी एक शिकार गिर गया.
मध्ययुगीन काल में बिहार भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अपनी प्रतिष्ठा खो दिया. मुगल काल में दिल्ली से unremarkable प्रांतीय प्रशासन के एक अवधि था. बिहार में इन बार के ही उल्लेखनीय व्यक्ति शेर शाह, या शेर खान सुर, एक अफगानी था. सासाराम जो अब केंद्रीय पश्चिमी बिहार में एक ही नाम का जिले में एक शहर है के आधार पर, मुगल राजा बाबर के इस जगीरदार हुमायूं, बाबर के बेटे को हराने में सफल रहा था, दो बार - एक बार चौसा और फिर, फिर से, पर कन्नौज उत्तर प्रदेश या उत्तर प्रदेश की वर्तमान स्थिति () विजय अभियान शेर शाह के माध्यम से एक क्षेत्र के शासक कि, फिर से, पंजाब को सभी तरह का विस्तार हो गया. - अशोक गुप्ता और राजाओं की परंपरा में वह एक क्रूर योद्धा लेकिन यह भी एक महान प्रशासक के रूप में उल्लेख किया गया था. भूमि सुधार के अनेक कार्य करता है उसे करने के लिए जिम्मेदार हैं. है कि वह खुद के लिए निर्मित एक भव्य समाधि के अवशेष आज के सासाराम में देखा जा सकता है (शेर शाह मकबरा.)


आधुनिक इतिहासब्रिटिश भारत के अधिकांश के दौरान बिहार के प्रेसीडेंसी बंगाल का एक हिस्सा था, और कलकत्ता से नियंत्रित किया गया था. जैसे, यह एक बहुत बंगाल के लोगों का प्रभुत्व क्षेत्र था. सभी अग्रणी शिक्षा और चिकित्सा केन्द्रों बंगाल में थे. कि पास बंगालियों अनुचित लाभ के बावजूद, बिहार के कुछ बेटों प्रमुखता के पदों के लिए अपनी बुद्धि और कठिन परिश्रम के सहारे द्वारा गुलाब. ऐसा ही एक राजेंद्र प्रसाद, की देशी Ziradei, सरन के जिले में था. वह भारत गणराज्य के पहले राष्ट्रपति बने.
जब बंगाल प्रेसीडेंसी से 1912 में अलग, बिहार और उड़ीसा एक एकल प्रांत के शामिल थे. बाद में, भारत अधिनियम 1935 की सरकार के अधीन है, श्रेणी उड़ीसा के एक अलग प्रांत बन गया है, और प्रांत बिहार के ब्रिटिश भारत के एक प्रशासनिक इकाई के रूप में अस्तित्व में आया. 1947 में स्वतंत्रता पर, बिहार राज्य, उसी भौगोलिक सीमा के साथ, 1956 तक भारत गणराज्य का एक हिस्सा है, का गठन किया. उस समय, दक्षिण - पूर्व, मुख्य रूप से पुरुलिया जिले में एक क्षेत्र को अलग किया गया था और भारतीय राज्यों के भाषायी पुनर्गठन के हिस्से के रूप में पश्चिम बंगाल में शामिल है.
बिहार के इतिहास में पुनरुत्थान भारत की आजादी के लिए संघर्ष के दौरान आया था. यह बिहार से था कि महात्मा गांधी ने उसके नागरिक अवज्ञा आंदोलन, जो अंततः भारत की स्वतंत्रता के लिए नेतृत्व का शुभारंभ किया. एक किसान, राज कुमार शुक्ला चंपारण जिले से, 1917 में, के लगातार अनुरोध पर गांधीजी चंपारण के जिला मुख्यालय मोतिहारी, को एक ट्रेन की सवारी ले लिया. यहां उन्होंने सीखा है, पहले हाथ, इंडिगो किसानों अंग्रेजों की दमनकारी शासन के तहत पीड़ित की दुखद दुर्दशा. Tumultuous स्वागत गांधीजी चंपारण में प्राप्त पर चिंतित है, ब्रिटिश अधिकारियों ने उस पर नोटिस बिहार प्रांत छोड़ना. गांधीजी का पालन करने से इनकार कर दिया, कह रही है कि एक भारतीय के रूप में वह अपने ही देश में कहीं भी यात्रा करने के लिए स्वतंत्र था. अवज्ञा के इस कृत्य के लिए वह जिला जेल में मोतिहारी में गिरफ्तार किया गया था. उसके जेल सेल, दक्षिण अफ्रीका दिनों से अपने दोस्त की मदद के साथ से, CF एन्ड्रयूज़, गांधीजी पत्रकारों और वह क्या वर्णन चंपारण में देखा भारत के वायसराय को पत्र भेजने में कामयाब रहे, और इन लोगों की मुक्ति के लिए औपचारिक मांग की. जब अदालत में पेश किया, मजिस्ट्रेट के आदेश दिए उसे जारी है, लेकिन जमानत के भुगतान पर. गांधीजी को जमानत देने से इनकार कर दिया. इसके बजाय, वह उनकी वरीयता के संकेत गिरफ्तारी के तहत जेल में रहना. गांधीजी चंपारण के लोगों से प्राप्त किया गया भारी प्रतिक्रिया पर चिंतित और ज्ञान द्वारा धमकाया है कि पहले से ही गांधीजी ब्रिटिश बागान मालिकों द्वारा किसानों के दुराचार के वाइसराय को सूचित करने के लिए प्रबंधित किया था, उसे मजिस्ट्रेट के किसी भी भुगतान के बिना मुक्त, सेट जमानत. यह स्वतंत्रता जीतने के लिए एक उपकरण के रूप में नागरिक अवज्ञा की सफलता का पहला उदाहरण था. ब्रिटिश प्राप्त, अपनी पहली नागरिक अवज्ञा की शक्ति "वस्तु सबक". यह भी ब्रिटिश अधिकारियों, पहली बार के लिए पहचान, कुछ परिणाम के एक राष्ट्रीय नेता के रूप में गांधीजी. राज कुमार शुक्ला क्या शुरू कर दिया था, और चंपारण की भारी प्रतिक्रिया लोग गांधी जी को दिया, भारत भर में अपनी प्रतिष्ठा पहुंचा दिया. इस प्रकार, 1917 में, बिहार के दूरदराज के एक कोने में, कि अंततः 1947 में भारत की स्वतंत्रता के लिए नेतृत्व में घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू की.
पुरस्कार सर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म जीतने, "गांधी", प्रमाण के अनुसार, कुछ लंबाई में, ऊपर प्रकरण को दर्शाया गया है. (राज कुमार शुक्ला इस फिल्म में अपने नाम से उल्लेख नहीं है, तथापि.) यहाँ दो छवियों को उस फिल्म से हैं. गांधीजी के पीछे सिर्फ दाढ़ी वाले सज्जन, बाईं तरफ के चित्र में, और सही में हाथी पर, राज कुमार शुक्ला है.
गांधीजी, उसके सामान्य मज़ाक कर रास्ते में टिप्पणी की, था कि चंपारण में वह "बस के रूप में बैलगाड़ी के रूप में आम हाथियों पाया (अपनी जन्मभूमि) गुजरात"!!
यह स्वाभाविक था, इसलिए है कि बिहार से कई लोग स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में अग्रणी प्रतिभागियों बन गया. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से ऊपर उल्लेख किया गया है. एक और जे प्रकाश नारायण, प्यार से जेपी बुलाया गया था. जेपी आधुनिक भारतीय इतिहास के लिए पर्याप्त योगदान 1979 में अपनी मृत्यु तक जारी रखा. यह वह कौन steadfastly और staunchly इंदिरा गांधी और उसके छोटे बेटे संजय गांधी के निरंकुश शासन का विरोध किया था. लोग उसका विरोध करने के लिए प्रतिक्रिया के डर से, इंदिरा गांधी उसे राष्ट्रीय आपातकाल शुरुआत की घोषणा 26 जून, 1975 की पूर्व संध्या पर गिरफ्तार किया था. वह तिहाड़ जेल में रखा गया था, दिल्ली, जहाँ कुख्यात अपराधियों को जेल में बंद कर रहे हैं के पास स्थित है. इस प्रकार, स्वतंत्र भारत में इस septuagenerian,, जो इंदिरा गांधी के पिता, जवाहर लाल नेहरू के साथ - साथ भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ा था एक उपचार ब्रिटिश क्या बाहर 1917 में चंपारण में गांधीजी के प्रति किया था से भी बदतर था प्राप्त किया, उसके बोल रहा है के लिए उत्पीड़न के खिलाफ बाहर . जेपी से आंदोलन शुरू कर दिया है, तथापि, एक को समाप्त करने के लिए इमरजेंसी लाया, इंदिरा गांधी और उसके चुनाव में कांग्रेस पार्टी की भारी हार के लिए नेतृत्व किया, और, एक सरकारी गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की स्थापना के लिए दिल्ली में, पहली बार के लिए. जेपी के आशीर्वाद के साथ, मोरारजी देसाई भारत की चौथी प्रधानमंत्री बने. भारत के बाद नेहरू - जेपी जनता पार्टी और बाद गांधी की अंतरात्मा की आवाज बने रहे. वह सभी भारतीयों के लिए एक फोन दे दिया लोकतंत्र के पक्ष में तानाशाही "को नष्ट करने और गुलामी से आजादी" के बारे में लाने की दिशा में निरंतर काम. अफसोस की बात है, जल्द ही शक्ति प्राप्त करने के बाद, bickerings जो प्रधानमंत्री के रूप में श्री देसाई के इस्तीफे के नेतृत्व में जनता पार्टी के नेताओं के बीच शुरू हुआ. जेपी "कुल क्रांति (sampporna क्रांति) के लिए अपने फोन के साथ जारी रखा, लेकिन वह 1979 में बंबई में एक अस्पताल में गुर्दे की विफलता के लिए झुक.
जनता दल - जनता पार्टी के में बाद bickerings के एक पृथकतावादी राजनीतिक पार्टी के गठन के लिए नेतृत्व किया. यह राजनीतिक दल दिल्ली, तथाकथित, संयुक्त मोर्चा में वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन के एक घटक इकाई है. इस पार्टी से भी था कि लालू प्रसाद यादव, बिहार के मुख्यमंत्री चुने गए थे. कलह जारी रखा. श्री यादव के नेतृत्व में एक नई पार्टी के रूप में गठन किया गया था - राष्ट्रीय जनता दल - जो बिहार में लगभग 15 वर्षों के लिए शासन पर चला गया.
यह भी एक समय था जब हिंदी साहित्य राज्य में पनपने आया था. राजा राधिका रमण सिंह, शिव पूजन सहाय, दिवाकर प्रसाद Vidyarthy, रामधारी सिंह दिनकर, राम Briksha Benipuri, दिग्गज जो हिन्दी साहित्य, जो एक लंबा इतिहास के ज्यादा नहीं था के फूल के लिए योगदान की कुछ कर रहे हैं. हिन्दी भाषा, निश्चित रूप से अपनी साहित्य, आसपास देर से उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरू हुआ. यह भारतेंदु बाबू Harischandra (उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निवासी) नाटक "Harischandra" की उपस्थिति द्वारा चिह्नित है. देवकी नंदन खत्री इस समय के दौरान हिन्दी में अपने रहस्य उपन्यास लेखन (Chandrakanta, Chandrakanta Santati, Kajar की कोठारी, भूतनाथ, आदि) वह मुजफ्फरपुर में बिहार में जन्म हुआ था और वहां उसके पहले शिक्षा था शुरू किया. वह तो गया में बिहार में Tekari एस्टेट के लिए ले जाया गया. बाद में उन्होंने बनारस (अब वाराणसी) के राजा वह "Lahari" नामक एक मुद्रण प्रेस है जो हिंदी के प्रकाशन मासिक, "सुदर्शन", 1898 में शुरू हुआ शुरू की एक कर्मचारी बन गया. हिंदी में पहली लघु कहानियों की बहुत पहले अगर नहीं, एक, "इन्दुमति" पंडित Kishorilal गोस्वामी द्वारा लिखा है, जो 1900 में प्रकाशित किया गया था.
निष्कर्षइसकी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए, बिहार संपत्ति यह समय द्वारा उपहार में दिया है पर गर्व महसूस करता है. और कला - साहित्य और धर्म और अध्यात्मवाद के क्षेत्र में अपनी नैतिक योगदान के लिए, यह पता नहीं प्रतियोगियों के सदियों पुराने इस भूमि से संबंधित कहानियाँ आज भी बताया जाता है. राज्य में एक ही राज्य है, जो एक समय पर एक बार पड़ोसी देशों के रूप में के रूप में अच्छी तरह से देश पर शासन किया है. कई महान शासकों यहाँ रहता है और यह हमें गर्व की भावना से भर जाता है जब हम बुद्ध और महावीर की Karmabhumi 'के रूप में बिहार के बारे में सोचो. बिहार, जो देश के गौरवशाली कहानी बच, शब्द कम होना.