Monday, 9 July 2012

बसंत तुम कहा गुम गए

बसंत फिर आ गए तुम…
हमारी उन बीते ख्वाबो को फिर से दिखाने
जब
तितलिया उड़ा करती थी
गाँवों के हरे-भरे खेतो के बीच
सरसों के पीले फूल पर
जब
आम के मंजर की महक
नथुनों में सुगंध भर देती थी
और हम खो जाते थे
मीठे आम के सपनो में
जब
खिला करती थी फूल
बागो में बगीचों में
और हम फिर से बच्चे बन जाते थे
उन फूलो के पीछे
जब
फागुन के विरहे का दर्द भरा फाग
दूर कहीं से सुनाई देता था हमें
और हम तृप्त हो जाते थे
खो जाते थे उनके स्वर लहरियों में
लेकिन वसंत
अब
तितलिया सिर्फ ख्वाबो में उड़ते हैं
और सरसों के फूल को कभी देखा था
अखबार के तीसरे पन्ने पर
अब
आमो की महक कोल्ड स्टोरेज की
बदबू में दब जाती हैं
पेड़ अब मॉल में बदल गए
और अब
फागुन के विरहे की जगह
कोलावारी डी का कोलाहल हैं
बसंत तुम कहा गुम गए
इन अनकही अनजानी भीड़ में
क्यों ना फिर तुम आते हो
क्यों इतना तड़पाते हो

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