Thursday, 12 July 2012

बिहार: विकास के सर 'ताज'

नीतीश की ऐसी आंधी चलेगी और लालू की लुटिया इस कदर डूब जाएगी इसका अंदाजा दोनों में से किसी को भी नहीं था. लालू थोड़े टूटे हुए जरूर थे लेकिन कहीं न कहीं उन्हें लग रहा था कि एमवाय समीकरण एक बार फिर उनकी नैया पार लगा सकती है.
वहीं नीतीश ये मानकर चल रहे थे कि विकास का स्वाद चख चुकी जनता उन्हें धकेल कर ही सही लेकिन गद्दी तक तो जरूर पहुंचा देगी. लेकिन जब नतीजे आने शुरू हुए तो सबकी आंखें फटी की फटी रह गयी. वो लालू जिसने एक झटके में पत्थर तोड़ने वाली मजदूर को संसद भेज दिया, वो दोनों जगहों से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को नहीं जीता पाए. हार का अंतर इतना रहा की लालू कोपभवन में चले गए.
बारह बजते-बजते सब कुछ उजड़ चुका था. राबड़ी निवास वीरान, सूनसान, उजड़ा सा दिखने लगा. कोई कार्यकर्ता नहीं, कोई भीड़-भाड़ नहीं. लालू के घर की ऐसी तस्वीर इतने सालों में पहली दफा देख रहा था मैं. सड़क के दूसरी ओर नीतीश के घर पटाखे छूट रहे थे, मिठाइयां बांटी जा रही थी, होली दिवाली सब मनाये जा रहे थे. फासला महज तीस-चालीस मीटर का था.
23 नवम्बर, सुबह के करीब आठ बजे थे. बिहार चुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले की सुबह थी. पटना में मैं लालू के निवास पर पंहुचा, लालू अभी-अभी सोकर उठे थे और बाहर कुर्सी पर बैठे थे. लालू ने अपने वही चिर-परिचित पुराने अंदाज में हमें कुर्सी पर बैठने को कहा और फटाफट निम्बू वाली चाय मंगवाई और इसी के साथ हमारी बातचीत शुरू हो गयी. बीच-बीच में इक्के दुक्के पोलिंग एजेंट भी आ रहे थें और लालू उनसे उनके क्षेत्र के बारे में जानकारियां भी ले रहे थें. तकरीबन दो घंटे मैं वहां रहा. लालू ने जबरन चूड़ा-दही नाश्ता भी करवाया और हमें विदा किया. मेरे जाने का मकसद साफ़ था. मैं लालू की बॉडी लैंग्‍वेज, उनके हाव-भाव को जानना चाह रहा था. यूं कहें तो परखना चाह रहा था.
शाम के करीब छ: बजे इसी एजेंडे को लेकर मैं मुख्यमंत्री आवास नीतीश कुमार से भी मिलने गया और वहां भी नीतीश के साथ करीब डेढ़ घंटे बिताये. गरम गरम सूप के साथ हम नतीजे को लेकर बातचीत करते रहे. लौटते वक्त मैं मन ही मन लालू और नीतीश के हाव-भाव, उनके आत्मविश्वास और उनकी बातों में तुलना कर रहा था और ये तय करने की कोशिश कर रहा था कि अगली सुबह लाइव में दर्शकों को क्या कहूंग, कौन सी सटीक लाइन लूंगा...
विकास क्या चीज है, ये बिहार की जनता ने लालू के राज में जाना तक नहीं, न ही जातीय समीकरण के बूते ताल ठोंकने वाले लालू ने इसे बताने की जरूरत ही समझी. लेकिन सत्ता में आते हीं नीतीश ने काम करना शुरू किया. सड़कें बनने लगी, स्कूल दुरुस्त होने लगे और सबसे अहम् रहा कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार. लोगों को उम्मीद की किरण दिखने लगी. विकास का मजा आने लगा. बिना डर भय के वोट डालने महिलाएं खुलकर सामने आयीं. उधर लालू अपने ही दायरे में खुश थे. वो ये भूल गए कि विकास का असर हर जाति, हर तबके पर पड़ता है. कोई भी इससे अछूता नहीं रह सकता.
विकास ने जातीय समीकरण में ऐसी सेंघ मरी कि लालू चारो खाने चित हो गए. पिछले चुनाव में हार के बाद से ही केंद्र में उसकी हैसियत काफी कम हो गयी थी. अबकी बार तो वो पूरी तरह हाशिये पर चले गए. हार के इस सदमे से उबरने में काफी वक्त लगेगा उन्हें. यही हाल पासवान का भी रहा. पार्टी और भी सिमट गयी और उनके दोनों भाई भी हार गए.
एक नए बिहार का सपना लिए बिहार की जनता ने नीतीश को उनकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा दे दिया. हर तबके ने नीतीश को वोट दिया. नीतीश के नाम पर यहां तक कि मुसलमानों ने बीजेपी तक को वोट डालने से परहेज नहीं किया.
देखा जाए तो सही मायने में नीतीश की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है. जनता की उम्मीदों पर उन्हें खड़ा उतरना होगा.

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