Tuesday, 31 July 2012

उप मुख्यमंत्री ने लिया कचरा मुक्त बिहार बनाने का संकल्प


पटना। बिहार का कचरा प्रबंधन असंतोषजनक है। कचरा प्रबंधन के लिए लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है। लोगों की मानसिकता बदलकर ही शहर को साफ सुथरा बनाया जा सकता है। यह बात गुरुवार को उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इन्वायरमेंट प्रोटेक्शन ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट(ईपीटीआरआई), हैदराबाद के तत्वावधान में आयोजित नगरी ठोस कचना व प्लास्टिक कचरा प्रबंधन विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कही।
इस मौके पर उन्होंने राज्य को साफ-सुथरा और कचरा मुक्त बनाने का संकल्प लिया और कहा कि कचरा प्रबंधन सिर्फ नगर निकायों के दम पर संभव नहीं है। कार्यक्रम में वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव दीपक कुमार सिंह, बीएसपीसीबी अध्यक्ष डॉक्टर सुभाष चन्द्र सिंह, ईपीटीआरआई केपी प्रसाद राव, डॉक्टर आशा पांडेय आदि मौजूद थे।
एसएचजी की सहायता
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि कचरा को डोर-टू-डोर जमा करने के लिए स्वयं सहायता समूह की मदद ली जा सकती है। उन्होंने कहा कि दुकानों और बहु मंजिली इमारतों को कूड़ा-कचरा डोर-टू-डोर सर्विस को देने या फिर कूड़ेदान में फेंकने के लिए बाध्य करना होगा।
कचरा प्रबंधन निजी क्षेत्र की कंपनियों को
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के सभी शहरों के कचरा प्रबंधन की जिम्मेवारी निजी क्षेत्र की कंपनियों को सौंपी जाएगी। पटना की साफ-सफाई और बैरियाचक में कचरा डिस्पोजल का जिम्मा ‘जिंदल’ नामक कंपनी को सौंपी गई है। इसके अलावा आरा, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, बिहार शरीफ, फुलवारी शरीफ और दानापुर शहरों के साफ-सफाई के लिए प्राइवेट कंपनियों से करार किया गया है।
कोई नहीं होगा बेरोजगार 

उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने नगर निकाय कर्मियों को गारंटी दिया कि साफ-सफाई क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने से उनकी नौकरी समाह्रश्वत नहीं होगी। निकायों पर कचरा प्रबंधन का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाएगा। उन्होंने कहा कि कचरा प्रबंधन कंपनियों से कचरा-छाटने के लिए रैग पिकर्स को
जोड़ा जाएगा।
भारतीय तकनीक की जरूरत 

सुशील कुमार मोदी ने कहा कि भारत में धूल ज्यादा है। यहां विदेशों से आयातित सफाई मशीनें कारगर साबित नहीं हुई है। उन्होंने सफाई व्यवस्था के लिए भारतीय परिस्थिति के अनुसार मशीनों को विकसित करने पर बल दिया।

जिले के शहरी गरीबों को भी मुफ्त इलाज

मुजफ्फरपुर, कासं : राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के तहत जिले के शहरी क्षेत्र के गरीबों का भी मुफ्त इलाज होगा। ग्रामीण बीपीएल परिवारों के साथ नगर निगम क्षेत्र के परिवारों को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है। इसके लिए 13 अगस्त को कार्यशाला आयोजित की जाएगी। इसमें जिला व प्रखंडों के अधिकारियों के अलावा मेयर व जिप अध्यक्ष भी उपस्थित रहेंगे।
जिले में इस योजना की सेवा प्रदाता बीमा कंपनी आइसीआइसीआइ लोंबार्ड के गिरिजेश शर्मा ने जिलाधिकारी संतोष कुमार मल्ल से मिलकर रूपरेखा के बारे में बातचीत की। शर्मा ने बताया कि इस वर्ष जिले के करीब 6,82,200 परिवारों को इस योजना से जोड़ा जाएगा। इसकी कवायद शुरू कर दी गई है। डाटा मिल चुका है। कार्यशाला के बाद स्मार्ट कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। अक्टूबर या नवंबर से गरीबों का आरएसबीवाई योजना से मुफ्त इलाज होने लगेगा।
गौरतलब है कि इस योजना के तहत प्रत्येक बीपीएल परिवार के सदस्यों का तीस हजार रुपये तक का इलाज मुफ्त में किया जाता है। इसमें योजना से जुड़े निजी अस्पताल भी शामिल हैं।

Friday, 20 July 2012

पांच साल में सबसे ज्यादा: 16.71 हुई बिहार की विकास दर

 
पटना। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने प्रणव मुखर्जी को बिहार का अगला पंचवर्षीय कृषि रोड मैप लॉन्च करने का न्योता दिया है। मोदी ने कहा कि प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बनने के बाद पहले दौरे पर बिहार आएं, इसका आग्रह वे करते हैं। पत्रकारों ने जब मोदी को टोका कि क्या उन्होंने भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार पीए संगमा की हार मान ली तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। थोड़ा संभलते हुए मोदी ने कहा कि सभी जानते हैं कि चुनावी गणित क्या है। चुनाव सिर्फ जीत-हार के लिए नहीं लड़ा जाता। मोदी ने अपने सरकारी आवास पर जनता दरबार में मंगलवार को सैकड़ों फरियादियों की समस्याएं सुनीं और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।
कृषि विकास दर में अव्वल 

कृषि क्षेत्र में बिहार की तरक्की की चर्चा करते हुए उपमुख्यमंत्री ने कहा कि बीते वित्तीय वर्ष में कृषि विकास दर 17.16 प्रतिशत रहा। जबकि बिहार का विकास दर 16.17 प्रतिशत रहा। जो पिछले पांच साल में सर्वाधिक है। अनाज, खासकर चावल के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के कारण ऐसा हुआ।

Thursday, 12 July 2012

उभरता बिहार – सुशासन और प्रगति की नई मिसाल या सिर्फ एक छलावा ??

कुछ समय पहले तक केवल गरीबी, भुखमरी और प्रवासन का पर्याय बन चुका बिहार, आज भारत के सबसे अधिक विकासशील राज्य के तौर पर अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट के अंतर्गत 13।1 जीडीपी दर के साथ बिहार को लगातार दूसरी बार देश के सबसे अधिक और तेजी से विकसित होते राज्य का दर्जा दिया गया है। इस नवीन और पूरी तरह परिवर्तित बिहार को भारत की टाइगर इकॉनोमी बनाने का संपूर्ण श्रेय राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही जाता है, जिन्होंने बिहार की डोर उस समय संभाली जब वह स्वयं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा था। आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इस नवीन बिहार के सामने ब्रैंड गुजरात की चमक भी फीकी पड़ती जा रही है।

बिहार राज्य में होते इस परिवर्तन और सुधरते आर्थिक हालातों के कारण बिहार से दूसरे राज्यों में प्रवासन के आंकड़ों में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। पहले जहां अपनी बदहाली से आहत लोगों को विवश होकर अपना घर और परिवार छोड़कर दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाना पड़ता था, आज वहीं जब उन्हें बिहार में पर्याप्त संसाधन और रोजगार मुहैया करवाया जाने लगा है तो अन्य शहरों में जा बसे लोग वापस अपने घरों की ओर रुख कर रहे हैं। आंकड़ों की मानें तो मनरेगा और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की अत्याधिक सफलता भी बिहार की विकास पर अपनी मुहर लगाती है।

उल्लेखनीय है कि ना सिर्फ सरकारी आंकड़े बिहार की इस सफलता को बयां कर रहे हैं बल्कि मीडिया और अन्य प्रचार माध्यम भी नवीन बिहार के परिवर्तित हालातों को नीतीश कुमार की सफलता बता रहे हैं। उनका तो यह तक कहना है कि पहले जहां बिहार के दयनीय हालातों से त्रस्त लोग अपने क्षेत्र में व्याप्त अराजकता के कारण अपनी पहचान छिपाते फिरते थे आज वहीं उन्हें खुली और आजाद हवा में सांस लेने का अवसर मिला है।

लेकिन क्या यह आंकड़े सही हैं या फिर कोई राजनैतिक लॉलीपॉप? बहुत से लोगों का यह कहना है कि भले ही आरजेडी की तुलना में जनता दल (यूनाइटेड) के शासन में बिहार के स्वरूप में परिमार्जन देखा गया है लेकिन उसे बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जा रहा है। क्योंकि ना तो प्रवासन की गति में कोई कमी आई है और ना ही सड़कों का सही तरीके से निर्माण किया गया है। सड़कों का काम शुरू तो जरूर हुआ लेकिन बीच में ही उसे रोक कर यह प्रचारित किया गया कि अब बिहार में भी पक्की सड़के बन गई हैं। वहीं दूसरी ओर मनरेगा और अन्य पीडीएस प्रणाली में व्याप्त धांधली भी जस की तस है। इसीलिए यह सरकारी आंकड़े जनता को सत्य ना बताकर भ्रम की स्थिति में उलझा रहे हैं।

विकासशील बिहार से जुड़े इस मसले पर चर्चा करने के बाद कुछ महत्वपूर्ण सवाल हमारे मस्तिष्क में उठते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना वर्तमान समय की जरूरत बन गया है, जैसे:
1. क्या वास्तव में सरकारी आंकड़े सच्चाई और पारदर्शिता के साथ जनता के समक्ष बिहार के परिवर्तित हालातों को बयां कर रहे हैं या फिर जमीनी सच्चाई कुछ और है?
2. क्या सच में नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार के लोगों की रोजगार जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हुई है?
3. नरेंद्र मोदी की तरह क्या नीतीश कुमार भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने प्रदेश को ब्रैंड गुजरात की तर्ज पर ब्रैंड बिहार बनाने में सक्षम हो पाएंगे?
4. क्या अब बिहार के लोग अपने क्षेत्र के हालातों और नीतीश कुमार के नेतृत्व से खुद को सुरक्षित पाते हैं?

नोट: उपरोक्त मुद्दे पर आप कमेंट या स्वतंत्र ब्लॉग लिखकर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। किंतु इतना अवश्य ध्यान रखें कि आपके शब्द और विचार अभद्र, अश्लील और अशोभनीय ना हों तथा किसी की भावनाओं को चोट ना पहुंचाते हों।

नितीश कुमार और बिहार की तरक्की दिखेगी सिनेमा के पर्दे पर


नितीश कुमार और बिहार की तरक्की दिखेगी सिनेमा के पर्दे पर

बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार अब फिल्मकारों की पसंद बन गये हैं। अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान तक अब नितीश कुमार के शासनकाल मं बेखौफ होकर बिहार जा रहे हैं। बिहार की तरक्की तथा नितीश कुमार का बखान अब भोजपुरी सिनेमा के पर्दे पर नजर आयेगा। नितीश कुमार के शासनकाल में हुए बिहार की तरक्की पर आधारित एक विशेष गाना फिल्म ‘बजरंग’ में डाला गया है जिसके बोल हैं ‘ए नितीश काका बिहार के बनाय दा तू जापान...’ इस गाने में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को भाषण देते दिखाया जाएगा। इस फिल्म ‘बजरंग’ का निर्माण जाने माने भोजपुरी फिल्म निर्माता जे.पी. सिंह ने किया है जिनकी फिल्म ‘पायल’ तथा ‘गईल भईंसिया पानी में’ ने सफलता का नया रिकार्ड बनाया। इस फिल्म में नितीश कुमार के भाषण का एक हिस्सा दिखाया जायेगा जिसमें नितीष कुमार लोगों को संबोधित करते दिखेंगे। इस फिल्म का प्रदर्शन जल्द ही बिहार सहित पूरे देश में होने जा रहा है। इस फिल्म में भोजपुरी सुपर स्टार पवन सिंह और अक्षरा सिंह के अलावा संजय पांडे, जय सिंह, उमेश सिंह, रमेश दुबे, सीमा सिंह, वैभव राय तथा मास्टर वरुण सिंह की मुख्य भूमिका है। इस फिल्म के निर्देशक हैं नंद किशोर महतो। गुरुजी फिल्म्स इंटरनेशनल के बैनर तले बनी इस फिल्म ‘बजरंग’ की शूटिंग उत्तर प्रदेश और बिहार के वास्तविक लोकशनों पर की गयी है। फिल्म के निर्माता जितेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं ‘बजरंग’ एक्शन के साथ-साथ रोमांस तथा काॅमेडी का भरपूर मसाला है। फिल्म के निर्देशक नंद किशोर महतो कहते हैं ‘बजरंग’ पर निर्माता जितेन्द्र प्रताप सिंह ने दिल खोलकर पैसा खर्च किया है। नंद किशारे महतो की जितेन्द्र प्रताप सिंह के साथ यह तीसरी फिल्म है। इस फिल्म को लेकर भोजपुरी सुपर स्टार पवन सिंह भी काफी उत्साह में हैं। इस फिल्म के लिए पवन सिंह ने खूब मेहनत किया है। फिल्म के खलनायक संजय पांडे की सुनें तो निर्माता जितेन्द्र प्रताप सिंह के कैंप में मेरी ये पहली फिल्म है। काफी मजा आया इस फिल्म में काम करके। इसी तरह खलनायक जय सिंह भी फिल्म ‘बजरंग’ और इसकी पूरी टीम की तारीफ कहते हैं। फिल्म के गीत जहांगीर आरजू, मुन्ना दुबे और विनोद पासवान ने लिखा है जबकि संगीत दिया है ओम झा ने। फिल्म की कहानी लिखी है संतोष मिश्रा ने। ‘बजरंग’ जल्द ही प्रदर्शित होनेवाली है।

बिहार: विकास के सर 'ताज'

नीतीश की ऐसी आंधी चलेगी और लालू की लुटिया इस कदर डूब जाएगी इसका अंदाजा दोनों में से किसी को भी नहीं था. लालू थोड़े टूटे हुए जरूर थे लेकिन कहीं न कहीं उन्हें लग रहा था कि एमवाय समीकरण एक बार फिर उनकी नैया पार लगा सकती है.
वहीं नीतीश ये मानकर चल रहे थे कि विकास का स्वाद चख चुकी जनता उन्हें धकेल कर ही सही लेकिन गद्दी तक तो जरूर पहुंचा देगी. लेकिन जब नतीजे आने शुरू हुए तो सबकी आंखें फटी की फटी रह गयी. वो लालू जिसने एक झटके में पत्थर तोड़ने वाली मजदूर को संसद भेज दिया, वो दोनों जगहों से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को नहीं जीता पाए. हार का अंतर इतना रहा की लालू कोपभवन में चले गए.
बारह बजते-बजते सब कुछ उजड़ चुका था. राबड़ी निवास वीरान, सूनसान, उजड़ा सा दिखने लगा. कोई कार्यकर्ता नहीं, कोई भीड़-भाड़ नहीं. लालू के घर की ऐसी तस्वीर इतने सालों में पहली दफा देख रहा था मैं. सड़क के दूसरी ओर नीतीश के घर पटाखे छूट रहे थे, मिठाइयां बांटी जा रही थी, होली दिवाली सब मनाये जा रहे थे. फासला महज तीस-चालीस मीटर का था.
23 नवम्बर, सुबह के करीब आठ बजे थे. बिहार चुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले की सुबह थी. पटना में मैं लालू के निवास पर पंहुचा, लालू अभी-अभी सोकर उठे थे और बाहर कुर्सी पर बैठे थे. लालू ने अपने वही चिर-परिचित पुराने अंदाज में हमें कुर्सी पर बैठने को कहा और फटाफट निम्बू वाली चाय मंगवाई और इसी के साथ हमारी बातचीत शुरू हो गयी. बीच-बीच में इक्के दुक्के पोलिंग एजेंट भी आ रहे थें और लालू उनसे उनके क्षेत्र के बारे में जानकारियां भी ले रहे थें. तकरीबन दो घंटे मैं वहां रहा. लालू ने जबरन चूड़ा-दही नाश्ता भी करवाया और हमें विदा किया. मेरे जाने का मकसद साफ़ था. मैं लालू की बॉडी लैंग्‍वेज, उनके हाव-भाव को जानना चाह रहा था. यूं कहें तो परखना चाह रहा था.
शाम के करीब छ: बजे इसी एजेंडे को लेकर मैं मुख्यमंत्री आवास नीतीश कुमार से भी मिलने गया और वहां भी नीतीश के साथ करीब डेढ़ घंटे बिताये. गरम गरम सूप के साथ हम नतीजे को लेकर बातचीत करते रहे. लौटते वक्त मैं मन ही मन लालू और नीतीश के हाव-भाव, उनके आत्मविश्वास और उनकी बातों में तुलना कर रहा था और ये तय करने की कोशिश कर रहा था कि अगली सुबह लाइव में दर्शकों को क्या कहूंग, कौन सी सटीक लाइन लूंगा...
विकास क्या चीज है, ये बिहार की जनता ने लालू के राज में जाना तक नहीं, न ही जातीय समीकरण के बूते ताल ठोंकने वाले लालू ने इसे बताने की जरूरत ही समझी. लेकिन सत्ता में आते हीं नीतीश ने काम करना शुरू किया. सड़कें बनने लगी, स्कूल दुरुस्त होने लगे और सबसे अहम् रहा कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार. लोगों को उम्मीद की किरण दिखने लगी. विकास का मजा आने लगा. बिना डर भय के वोट डालने महिलाएं खुलकर सामने आयीं. उधर लालू अपने ही दायरे में खुश थे. वो ये भूल गए कि विकास का असर हर जाति, हर तबके पर पड़ता है. कोई भी इससे अछूता नहीं रह सकता.
विकास ने जातीय समीकरण में ऐसी सेंघ मरी कि लालू चारो खाने चित हो गए. पिछले चुनाव में हार के बाद से ही केंद्र में उसकी हैसियत काफी कम हो गयी थी. अबकी बार तो वो पूरी तरह हाशिये पर चले गए. हार के इस सदमे से उबरने में काफी वक्त लगेगा उन्हें. यही हाल पासवान का भी रहा. पार्टी और भी सिमट गयी और उनके दोनों भाई भी हार गए.
एक नए बिहार का सपना लिए बिहार की जनता ने नीतीश को उनकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा दे दिया. हर तबके ने नीतीश को वोट दिया. नीतीश के नाम पर यहां तक कि मुसलमानों ने बीजेपी तक को वोट डालने से परहेज नहीं किया.
देखा जाए तो सही मायने में नीतीश की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है. जनता की उम्मीदों पर उन्हें खड़ा उतरना होगा.

बिहार: विकास की डगर पर बढ़े मजबूत कदम






 विकास की डगर पर बढ़े मजबूत कदमनेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई. साथ में नीतीश कुमार (एकदम बाएं)

बात 1917 की है. महात्मा गांधी ने चंपारण में अपने पहले सफल सत्याग्रह को अंजाम दिया था. इसके साथ ही बिहार आजादी की लड़ाई की धुरी बन गया. बाद के वर्षों में, चंपारण आंदोलन ने देश में अंग्रेजी राज के अंत की राह प्रशस्त की.
राज्‍य के गठन के शताब्दी वर्ष के मौके पर बदलते बिहार पर ग्लोबल समिट का आयोजन शासन के फोकस को नया दम देता है. लंबे समय से आर्थिक परेशानी की बेड़ियों में बंधे बिहार के लिए इसे नई आजादी के आंदोलन की शुरुआत के तौर पर भी देखा जा सकता है. पटना में 17 से 20 फरवरी तक चली इस समिट ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्‍य के बारे में सकारात्मक माहौल बनाने का मौका दिया. उन्होंने माना कि इस मौके को गांधी की चंपारण यात्रा से जोड़े जाने से समयसीमा बेशक तय नहीं होगी लेकिन कुछ निश्चित लक्ष्य जरूर निर्धारित किए जा सकेंगे.
नीतीश ने दावा किया, ‘बिहार राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने के लिए 20 साल तक इंतजार नहीं कर सकता.’ उन्होंने कुछ विशेषज्ञों के उन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया, जिन्होंने राज्‍य के विकास को समय और कुछ सिद्धांतों के आधार पर आंक कर कहा कि इसे विकसित राज्‍यों की श्रेणी में पहुंचने के लिए इतने साल लगेंगे. नीतीश ने कहा, ‘हम अपने लक्ष्य को 10 साल से भी कम अवधि में हासिल कर लेंगे.’
उन्होंने घोषणा की, ‘बिहार में निवेशक वायबिलिटी गैप फंडिंग (पीपीपी के तहत इन्फ्रॉस्ट्रक्चर परियोजनाओं के वाणिज्यिक रूप से कारगर होने तक अनुदान के रूप में वित्तीय मदद) की जरूरत के बिना पीपीपी परियोजनाओं के लिए आगे आ रहे हैं. यह बिहार में बढ़ते विश्वास का संकेत है.’
समिट में छह सत्रों का आयोजन हुआ. इसमें में उन चुनौतियों को पहचाना गया जिनका वर्तमान में बिहार को सामना करना पड़ रहा है, और यह सुझाव मिले कि इन चुनौतियों को अवसरों में कैसे बदला जा सकता है.
छठे सत्र की अध्यक्षता करते हुए इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर एम.जे. अकबर ने महात्मा गांधी की चंपारण यात्रा की शताब्दी के करीब आने की याद दिलाई. यह यात्रा विकास के समान बंटवारे की प्रतीक भी है, जिसे नीतीश कुमार की सरकार बिहार में हासिल करने की कोशिश में जुटी है.
नीतीश इस बात से पूरी तरह सहमत थे. ‘बदलते बिहार पर ग्लोबल समिट’ के आखिरी दिन उन्होंने कहा, ‘मैं सिर्फ जीडीपी और जीएसडीपी को विकास के सही संकेतक के तौर पर लेने में यकीन नहीं करता. विकास की मेरी संकल्पना हर एक शख्स तक तरक्की की बयार पहुंचाना है.’ उन्होंने राज्‍य में प्रति व्यक्ति आय में इजाफा करने के लिए उच्च वृद्धि दर को पाने को चुनौती माना और कहा कि विशेषज्ञों को इसका समाधान देना चाहिए. उन्होंने बिहार जैसे राज्‍य के प्रति केंद्र सरकार की पल्ला झाड़ने की नीति पर भी सवालिया निशान लगाया. मुख्यमंत्री ने कहा, ‘केंद्रीय कर सभी राज्‍यों पर समान रूप से लागू हो रहे हैं, तो फिर हमें बिहार में समान स्तर की सेवाएं और सुविधाएं क्यों नहीं दी जा रही हैं. बिहार को फंड क्यों नहीं दिए जा रहे हैं? क्या यह भेदभाव बरतने जैसा नहीं है? जितना भी मिलेगा हम उसके साथ काम करेंगे. लेकिन यह केंद्र के समग्र विकास के दावे पर प्रश्न उठाता है? समग्र विकास का मतलब यह नहीं है कि हम कुछ इलाकों को विकास का प्रतीक बना दें-जैसा हमने पश्चिम और दक्षिण के कुछ हिस्सों में किया है. देश के बाकी हिस्सों को पीछे छोड़ दिया है.’
शिखर सम्मेलन में विलक्षण बात देखने को मिली जब वहां मौजूद सभी विशेषज्ञों ने यह माना कि हाल के समय में बिहार ने बेहतर दिशा में कदम बढ़ाए हैं. विचार-विमर्श में इस बात की पुष्टि हुई कि नीति नियंता और लोक प्रशासन से जुड़े लोगों के लिए बिहार देश के सबसे ज्‍यादा चुनौती वाले राज्‍यों में एक है.
अगर राज्‍य पर्याप्त गति के साथ सही दिशा में सफर कर रहा है; और वृद्धि काफी अच्छी है तो कई ऐसे प्रश्न थे जिन्हें विभिन्न सत्रों में योजना आयोग के सदस्य अभिजीत सेन, अर्थशास्त्री लॉर्ड मेघनाद देसाई, पूर्व केंद्रीय मंत्री वाइ.के. अलघ और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया सरीखे विशेषज्ञों ने उठाया.
अभिजीत काफी सोची-समझी सलाह देते हैं कि राज्‍य की ग्रोथ व्यापक स्तर पर निर्माण क्षेत्र में उछाल से जुड़ी हुई है, यह चहुंमुखी समृद्धि को जन्म नहीं देता है. उन्होंने सुझाव दिया कि कुछ लक्ष्यों और रणनीति में फेरबदल करना मौजूदा समय की जरूरत है.
नीतीश ने केंद्रीय सहायता के लिए आवाज बुलंद की और योजना आयोग से राज्‍य सरकार के फैसले पर भरोसा करने के लिए कहा, जिसे उन्होंने ‘सबसे पारदर्शी व्यवस्थाओं में से एक बताया.’ उन्होंने कहा, ‘उपजाऊ भूमि और अच्छा मौसम हमारी ताकत है. हमारे लोग और विरासत हमारी संपत्ति है. हम समग्र विकास के लिए अपनी ताकत के बल पर आगे बढेंग़े.’
समिट शुरू होने से पहले ही नीतीश ने यह कहते हुए सावधान किया था कि इसका किसी निवेश से कोई सरोकार नहीं है. उद्योगपति कुमारमंगलम बिरला ने बिहार में सीमेंट संयंत्र की स्थापना के लिए 500 करोड़ रु. के निवेश का वादा किया. बिहार में 3.5 करोड़ डॉलर के सबसे पहले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) को अंजाम देने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी कोबरा बीयर के मालिक लॉर्ड करण बिलिमोरिया ने और अधिक निवेश करने का वादा किया.
शिखर सम्मेलन में बिहार के 33 फीसदी के क्रेडिट डिपॉजिट रेशियो, भारी उद्योगों की अनुपस्थिति, बिजली की कमी और राज्‍य में शहरीकरण की धीमी रफ्तार पर चिंता जताई गई. इसके अलावा समिट में राज्‍य सरकार के कृषि में वृद्धि के फोकस का समर्थन किया गया. राज्‍य में कृषि क्षेत्र में 60 फीसदी लोगों को रोजगार मिला हुआ है लेकिन यह राज्‍य के सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ 33 फीसदी का योगदान करती है. मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हमने कृषि के विकास के लिए 10 साल का खाका तैयार किया है. इस अवधि में हम इस क्षेत्र पर 1.50 लाख करोड़ रु. खर्च करेंगे.’
नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने समिट का उद्घाटन किया. समापन पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्‍यपाल और लेखक गोपालकृष्ण गांधी के जानदार भाषण से हुआ. गोपालकृष्ण गांधी ने एक लंबा काल्पनिक पत्र पढ़कर सुनाया जो उन्होंने जयप्रकाश नारायण को लिखा था ताकि आधुनिक नेताओं को उनके आचरण का आईना दिखाया जा सके. समिट में दुनिया भर से आए 1,000 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. नेपाली प्रधानमंत्री ने अपने देश की हाइड्रो पावर और पर्यटन से जुड़ी क्षमताओं को मिल कर प्रयोग करने के लिए संयुक्त उपक्रमों को लेकर सक्रिय सहयोग का वादा किया.
समिट ने इस बात पर मुहर लगाई कि राज्‍य में हाल में हो रहे बदलाव सकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं. इसने राज्‍य को ऐसी राहें सुझाईं जिनके जरिए राज्‍य विविधीकृत, संतुलित और समग्र आर्थिक ग्रोथ को कायम रखने की चुनौती पर खरा उतर सकता है.

बिहार की विकास दर देश में सबसे अधिक

बिहार की विकास दर देश में सबसे अधिक

बिहार दिवस
एक समय बीमारु राज्य कहा जाने वाला बिहार अब सबसे अधिक तेजी़ से विकास करने वाला राज्य बन गया है.योजना आयोग को सौंपे गए आकडो़ं के अनुसार बिहार लगातार दूसरे साल सबसे तेज़ गति से विकास कर रहा है. इस वर्ष बिहार की विकास दर 13.1 प्रतिशत रही है.ल्लेखनीय है कि दिल्ली और पंजाब जैसे इलाक़ों को भी बिहार ने पीछे छोड़ दिया है.
इस सूची में दूसरे नंबर पर दिल्ली है जिसकी विकास दर 11.3 प्रतिशत है जबकि पंजाब की विकास दर मात्र 5.8 प्रतिशत है.
गुजरात जिसकी छवि सबसे विकासोन्मुख राज्य के रुप में होती है उसकी विकास दर भी बिहार से कम है.
पिछले दो वर्षों में बिहार की विकास दर सबसे ऊपर रही है. विकास पिछले साल 14.77 प्रतिशत थी.
ये आकड़े केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने योजना आयोग को दिए हैं.
बिहार की विकास दर बढ़ने का सीधा मतलब है कि देश के विकास में बिहार का योगदान पहले से बढ़ा है लेकिन कई राज्यों की विकास दर घटी भी है.
मसलन उत्तर प्रदेश, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, केरल और कई अन्य राज्यों की विकास दर पिछले साल की तुलना में घटी है.
जिन राज्यों की विकास दर पिछले साल की तुलना में बढ़ी है उनमें असम, गोवा, जम्मू कश्मीर, दिल्ली और छत्तीसगढ़ का नाम शामिल है. इसमें बिहार का नाम इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले साल बिहार की विकास दर 14 प्रतिशत से अधिक थी.

शाइनिंग बिहार बढ़ रहा है विकास की राह पर

लद गए वह दिन जब लोग कहते थे कि बिहार विकास की रेस में पिछड़े घोड़े की तरह है. वह समय पुराना हो गया जब लोग बिहार को एक गरीब और बेहद पिछड़ा हुआ राज्य कहते थे. अब समय बदल गया है. अब बिहार भी विकास की राह पर बढ़ चला है. नीतीश कुमार ने राज्य में सुशासन की नई नींव डाली है. धीमा ही सही अब यह राज्य भी अन्य राज्यों की तरह तरक्की कर रहा है.

कभी पिछड़ेपन का शिकार बिहार आज विकास की दौड़ में सबसे आगे निकल गया है, वहीं उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे पिछड़ गया है. गुजरात फिर टॉप 5 में जगह नहीं बना सका है. टॉप 5 राज्यों में बिहार के बाद क्रमश: दिल्ली, पुडुचेरी, छत्तीसगढ़ और गोवा हैं.


सांख्यिकीय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 13.1 फीसदी के साथ बिहार लगातार दूसरे साल सबसे तेज विकास दर हासिल करने वाला राज्य बना है. चार साल पहले पहली बार बिहार की विकास दर डबल डिजिट में पहुंची थी. बिहार की अर्थव्यवस्था अब पंजाब से भी ज्यादा बड़ी हो गई है. पंजाब इस समय बिहार से पलायन करने वालों की सबसे पसंदीदा जगह है.


यही है सही तस्वीर
बिहार को विकास की राह पर इस तेजी से चलते हुए देखकर अक्सर लोग कहते हैं कि जनाब यह तो सिर्फ आंकड़ों का खेल है जमीनी हकीकत तो कुछ और है. लेकिन इस बार के आंकड़े सिर्फ कागजी नहीं हकीकत भी हैं. कुछेक मुद्दों को छोड़ दिया जाए तो आप देखेंगे कि बिहार बदल गया है. अब नए दौर का समय है. बिहार से लगातार बढ़ी संख्या में आईआईटी और आईएएस की परीक्षा में पास होने वाले विद्यार्थी इस बात का सबूत हैं कि किस तरह बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई है. बिहार से पलायन करने वालों की संख्या में कमी इस तरफ इशारा कर रही है कि अब बिहार में भी रोजगार के मौके आने लगे हैं. इसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी बिहार आगे बढ़ रहा है.


टॉप 5 राज्य: विकास(प्रतिशत में)
बिहार: 13.1
दिल्ली: 11.3
पुडुचेरी: 11.0
छतीसगढ़: 10.8
गोवा: 10.7
पिछड़े: विकास(प्रतिशत में)
अंडमान: 0.7
अरुणाचल: 3.7
नागालैंड:3.9
पंजाब: 5.8
उत्तर प्रदेश: 6.2

 



Wednesday, 11 July 2012

सिर्फ नालंदा का मतलब बिहार नहीं हैं नितीश बाबु

सुनील बाबु ठीक ही कहते हैं |

सिर्फ नालंदा का मतलब बिहार नहीं हैं नितीश बाबु

  • नालंदा में बना दिया जायेगा हवाई अड्डा
  • इंडोर शूटिंग रेंज का उद्घाटन
  • विवरेज एंड फ़ूड प्लांट का उद्घाटन
  • पहला आल विमेन कोपरेटिव बैंक
  • २३ हज़ार करोड़ की योजना हुई आवंटित
  • खेती में बनाया अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड
  • स्वास्थ सेवा में लगातार दुसरे साल पहले नंबर पर
उपरोक्त खबर बिहार विकास की दास्तान जरुर कह रही हैं लेकिन आपको ताज्जुब होगा की सारी खबर नालंदा से सम्बंधित हैं, मतलब विकास तो हुआ हैं लेकिन किसी एक जिले में ही सिमट कर रह गया हैं। इसे मुख्यमंत्री जी की कृपा कहे या गृह जिला होना का फायदा नालंदा सबमे अव्वल हैं। इधर हाल में ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक खबर छपी की महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार दो जिलो में आल विमेन कोपरेटिव बेंक खोल रही हैं, खास बात यह की इसमें से भी एक जिला नालंदा हैं। इस मौके पर एक पत्रकार ने सहकारी मत्री रामाधार सिंह से सवाल किया की इस बार भी नालंदा ही क्यों तो मंत्री जी गोलमोल जवाब देकर चुप हो गए। बोलते भी क्या सुशासन का डंडा जो हैं।

सम्बंधित खबर -: नालंदा मे बना देल जाएत हवाई अड्डा


सच पूछिये तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ इस बात से आये दिन आखबार के पन्नो पर यह खबर दिखने को मिल जाती हैं। मुख्यमंत्री के गृह जिला होने का फायदा इस जिले को इतना मिल रहा हैं की आज राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर की सौ से ज्यादा एजेंसी हर क्षेत्र में यहाँ विकास के लिए कार्य कर रही हैं। ऐसा नहीं हैं की नालंदा को यह स्थान लालू और जगन्नाथ के समय में भी मिल रहा था या प्राचीन होने का गौरव यह जिला कांग्रेस के ज़माने में भी ले रहा था, नालंदा में विकास का सफ़र तो नितीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से शुरू हुआ हैं। आये दिन यह जिला अखबार के सुर्खी का काम करता हैं, चाहे वो हवाई अड्डा के निर्माण प्रस्ताव के लिए हो, या फिर मनरेगा में राष्ट्रीय अवार्ड के लिए, स्वास्थ सेवाओ में लगातार दो सालो तक पहले नंबर पर आने का हो या फिर कृषी के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने का हो। नालंदा सबमे अव्वल हैं।

वैसे आंकड़ो की यह लम्बी कहानी यूँ ही नहीं बनी हैं। मुख्यमंत्री के गृह जिला होने के कारण मंत्रियो की अनवरत कृपा इस जिले पर बरसती रहती हैं, आपको बता दे की खेती में प्रयुक्त होने वाले पॉवर टिलर पुरे देश में सबसे ज्यादा यही पर हैं जो की पुरे बिहार का ७५% हैं। हरेक संस्था अपने विकास के लिए इसी जिले को चुनती हैं, पूछने पर एक संस्था के प्रतिनिधि ने बताया की मुख्यमंत्री के गृह जिला होने के कारण वो सारी सुविधा मिल जाती हैं जिसकी हमें जरुरत होती हैं।

सवाल ये नहीं हैं की नालंदा में विकास क्यों हो रहा हैं, सवाल ये हैं की ये भेदभाव क्यों हो रहा हैं। दरभंगा में हवाई अड्डा रहते हुए भी आई आई टी नहीं बना कहा गया हवाई संपर्क नहीं हैं, मोतिहारी में छोटे रनवे का बहाना बनाकर विश्वविध्यालय नहीं खुला, लेकिन नालंदा में विश्वविद्यालय के लिए हवाई अड्डा बना देना कुछ हज़म नहीं हुआ। एक तरफ कोशी क्षेत्र को हरेक साल बाढ़ की विभीषिका का सामना करना पड़ता हैं और नदी जोड़ो परियोजना की तरफ सरकार का कोई ध्यान नहीं हैं।  कोशी क्षेत्र की एकमात्र लाइफलाइन डुमरी पुल क्षतिग्रस्त हैं और सरकार चैन की नींद सो रही हैं, नालंदा को मॉडल जिला बनाया जा रहा हैं और एतिहासिक दरभंगा को नाकारा जा रहा हैं। क्यों ? क्या बिहार का मतलब सिर्फ नालंदा हैं या नितीश सिर्फ नालंदा जिले के मुख्यमंत्री हैं।

विकास कार्यो में तेजी, बाधाएं होंगी दूर

मुजफ्फरपुर, नसं : नगर विकास विभाग द्वारा पटना में मुजफ्फरपुर शहर के विकास को लेकर समीक्षा बैठक की गई। बैठक में भाग लेने के लिए महापौर वर्षा सिंह, उपमहापौर सैयद माजिद हुसैन, नगर विधायक सुरेश कुमार शर्मा, प्रभारी नगर आयुक्त अमरनाथ मिश्रा एवं निगम के सभी अभियंताओं को पटना बुलाया गया था। बैठक में नगर विधायक ने निदान को कठघरे में खड़ा किया। महापौर एवं उपमहापौर ने नगर विकास मंत्री प्रेम कुमार को शहर की समस्याओं से अवगत करया। बैठक से लौटने के बाद उपमहापौर ने जानकारी दी।
बैठक की बातें
- अपना मकान किराया पर लगाने वालों को देना होगा व्यावसायिक कर।
- एपीएल एवं बीपीएल कूपन जिले को आवंटित करने के बाद भी नहीं बांटे गए। मंत्री ने कहा कि वे स्वयं पहल करेंगे।
- शहर में किसी भी प्रकार का कार्य करने वाली एजेंसी को निगम से एनओसी लेना होगा।
- निगम के अभियंताओं को मुख्यालय में रहने का निर्देश। बात नहीं मानने पर होगी कार्रवाई
- आंतरिक श्रोतों से आय बढ़ाए और लंबित कार्यो का निपटारा करे निगम।

Monday, 9 July 2012

चीनी उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा बिहार

समस्तीपुर। बिहार को चीनी एवं गन्ना उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य सरकार ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की है। राज्य के गन्ना उद्योग विभाग के प्रधान सचिव आलोक कुमार सिन्हा ने शनिवार को यहां राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा में आयोजित 'राज्य में चीनी उत्पादन एवं मिलों की वर्तमान स्थिति' विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में भाग लिया। कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य की भूमि गन्ना उत्पादन के दृष्टिकोण से उपयुक्त है और यह प्रदेश की जरूरतों के साथ साथ देश की भी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है।

इस मौके पर राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आरके मित्तल ने कहा कि बिहार का चीनी उत्पादन के क्षेत्र में गौरवशाली इतिहास रहा है। एक समय देश के कुल चीनी उत्पादन का करीब चालीस फीसदी हिस्सा केवल बिहार में होता था। उन्होंने किसानों से अधिकाधिक गन्ने की खेती करने का आह्वान करते हुए कहा कि आपके फायदे के लिए विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अथक मेहनत से गन्ने के कई नये किस्म विकसित की हैं। यदि किसान ²ढ़ निश्चय के साथ गन्ने की खेती में लग जाये तो बिहार इस क्षेत्र में शीघ्र ही आत्मनिर्भर हो जायेगा।

बसंत तुम कहा गुम गए

बसंत फिर आ गए तुम…
हमारी उन बीते ख्वाबो को फिर से दिखाने
जब
तितलिया उड़ा करती थी
गाँवों के हरे-भरे खेतो के बीच
सरसों के पीले फूल पर
जब
आम के मंजर की महक
नथुनों में सुगंध भर देती थी
और हम खो जाते थे
मीठे आम के सपनो में
जब
खिला करती थी फूल
बागो में बगीचों में
और हम फिर से बच्चे बन जाते थे
उन फूलो के पीछे
जब
फागुन के विरहे का दर्द भरा फाग
दूर कहीं से सुनाई देता था हमें
और हम तृप्त हो जाते थे
खो जाते थे उनके स्वर लहरियों में
लेकिन वसंत
अब
तितलिया सिर्फ ख्वाबो में उड़ते हैं
और सरसों के फूल को कभी देखा था
अखबार के तीसरे पन्ने पर
अब
आमो की महक कोल्ड स्टोरेज की
बदबू में दब जाती हैं
पेड़ अब मॉल में बदल गए
और अब
फागुन के विरहे की जगह
कोलावारी डी का कोलाहल हैं
बसंत तुम कहा गुम गए
इन अनकही अनजानी भीड़ में
क्यों ना फिर तुम आते हो
क्यों इतना तड़पाते हो

क्या सचमुच बदल रहा है बिहार ...?

क्या सचमुच बदल रहा है बिहार ...?


बिहार ने एक बार फिर साबित कर दिया की वो सबसे ज्यादा घटना प्रधान शहर हैं। खबर कोई भी हो अच्छा या बुरा जब ये बिहार में होती हैं तो घटना बन जाती हैं। सब कुछ वैसे ही हैं गन्दा और अनियोजित सा, सब अपने मर्जी के मालिक हैं और नागरिक जिम्मेदारी का कोई भाव नहीं हैं, फिर भी कही कुछ ये लगता हैं की बिहार एक ऐसी जगह हैं जहाँ बदलाव महसूस हो रहा हैं।

नए साल में बिहार में फिर से... 'मिस बिहार' प्रतियोगिता शुरू होने वाली है वैसे इसमें जान डालने की शुरुवात २००८ से ही शुरू हो गयी थी की इस बार कुछ अच्छा और कुछ नया कर सके लेकिन संशय अभी भी बरकरार हैं । वैसे अंतिम बार यह प्रतियोगिता १९७० के दशक में हुई थी लेकिन ये एक अबूझ और अनकही पहेली जैसी कभी शुरू होती तो कभी बंद, कभी मिस बिहार जीतने वाली प्रतिभागी इलाहाबाद की निकलती तो कभी मिस बिहार शादी शुदा निकलती। वर्ष २००८ में तो यह प्रतियोगिता बिना किसी नतीजे के ही ख़तम हो गयी थी, कुछ प्रतिभागियों ने इसमें धोखा और बैमानी की बात कह मंच पर ही उत्पात मचाना शुरू कर दिया। साफ़ शब्दों में अगर कहे तो अखबार के पन्नो पर ये सिर्फ एक घटना बन कर रह गयी।

नए साल में १९ फ़रवरी,२०१२ को पटना मैराथन आयोजित होने जा रहा हैं। आयोजन का जिम्मा एक प्रवासी बिहारी का हैं जो अपने निवेश बैंकिंग से तीन महीने का अवकाश ले कर इस तैयारी को मुकल्लम अमली जामा पहनाने के लिए पटना में डेरा डाले हुए हैं। उनका कहना हैं की "मैराथन से एक मानवीय ऊर्जा सृजित होगी जो पूरी दुनिया में एक कारगर संकेत भेजेगी जो बिहार और बिहारियों की अंतहीन उपलब्धियों का गुणगान करेंगी।" उनका कहना हैं की समृधि केवल पटना तक ही क्यों सिमटी हैं । क्यों अभी भी हाइवे से २० किलोमीटर का बिहार वहीँ पर हैं जहाँ हमने इसे आज से ५ दशक पहले छोड़ा था।



इसी महीने नालंदा के एक युवा किसान सुमंत ने धान उत्पादन के क्षेत्र में विश्व कृतिमान कायम कर दिया। उन्होंने एक हेक्टेयर जमीन में २२४ क्विंटल धान उत्पादन करके चीनी कृषि वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग को भी पीछे छोड़ दिया। सुमंत ने चार किसान साथियों के संग मिलकर 'श्री' जैसी नई तकनीक का इस्तेमाल किया जिससे कम पानी और बीच में अधिक पैदावार की जा सकती हैं।

इन सब कारणों के वाबजूद भी कई दुसरे कारण भी हैं जिससे यह बहुत ज्यादा नहीं लगता। देश में बिजली उपभोग के मामले में भी बिहार सबसे निचे हैं। यहाँ पर ६०० मेगावाट बिजली संयंत्रो की स्थापना हो चुकी हैं लेकिन अभी भी सिर्फ २०० मेगावाट उत्पादन ही हो रहा हैं। बढ़ में एक सुपरथर्मल बिजली संयंत्र बन रहा हैं लेकिन उसमे भी उत्पन्न कुल बिजली का केवल १० फीसदी ही राज्य को मिल सकेगा।

बिजली की बात अगर छोर भी दे तो भी जमीन की किल्लत राज्य में संभावित निवेशको को अपने से दूर कर रही हैं। साईकिल बनाने वाली दो बड़ी कंपनियों ने बिहार में संयंत्र लगाने की बात की लेकिन अब उनकी योजना भी टलती दिखाई दे रही हैं। यही हाल एक सीमेंट फेक्ट्री का भी हैं, उन्होंने भी राज्य में कारोबार शुरू करने का फैसला किया लिखे अब उसने भी अपने कदम पीछे की और मोड़ लिया हैं। एक एस्बेस्टस कंपनी भी राज्य में जमीन नहीं मिल पाने के कारण अपना धंधा शुरू नहीं कर पाया। एक बड़ी शराब कंपनी भी अपना समर्थन जाता रही थी लेकिन अब वो भी मौन दिख रही हैं।

लालू राज की जो अपहरण और फिरौती की सुर्खिया अखबारों से गायब हो गयी थी वो फिर से मुंह उठा रही हैं। बच्चे फिर से अगवा हो रहे हैं और पुलिस पर एक बार फिर लेट लतीफी होने का फब्ती कसा जा रहा हैं। गुंडे-बदमाशो की फिर से चल पड़ी हैं और फिर से कानून का मखौल उड़ाया जा रहा हैं। सड़क की ठेकेदारी जो अपराधियों की बपौती थी और जो कुछ ख़त्म सा लग रहा था फिर से शुरू होने लगा। निचे से भ्रष्टाचार बढ़ रहा हैं और आंच ऊपर तक पहुँच रही हैं। किसी के साथ अगर कोई घटना घट जाती हैं तो वो रिपोट लिखाने से भी डरता हैं। पुलिस वाले उन्हें सबसे बड़ा गुंडा नज़र आता हैं। लेकिन फिर भी बिहार बदल रहा हैं.... ।

बिहार में सबसे बड़ी समस्या खेती में भी हैं, कहीं धान जल जाता हैं तो कहीं बाढ़ की चपेट में आ जाता हैं। कभी अगर किस्मत से मानसून बढ़िया हो जाता हैं और पैदावार सही हो जाता हैं तो सरकार की खरीद तंत्र में गड़बड़ी हो जाती हैं। राज्य में कोई बड़ी मिल नहीं हैं। रैयाम और सकरी चीनी मिल पर ग्रहण लगा हुआ हैं। स्प्रिट एयरवेज ने बिहार को एक सपना दिखाया था सस्ते और सुलभ हवाई जहाज में उड़ने का लेकिन जीडीसीए के कारण इसमें भी अडंगा लगा हुआ है और ये योजना भी अधर में लटकी नज़र आ रही हैं।

योजना आयोग के सलाहकार ने सरकार पर आरोप लगाया हैं की वो सरकार योजना राशी के एक बड़े हिस्से का उपयोग नहीं कर पा रही हैं फलस्वरूप राज्य को १०,००० से १२,००० करोड़ रूपये की सहायता गवानी पड़ी हैं। उन्होंने आरोप लगाया हैं की इसके लिए कोई कारगार प्रशासनिक तंत्र नहीं हैं। उन्होंने एक मिसाल दिया की मध्याहन भोजन के लिए बिहार के १३०० करोड़ रूपये मिले जिसमे से उन्होंने केवल 780 करोड़ रूपये ही लिए जबकि और राज्यों ने पूरा का पूरा पैसा खपाया।
यह सही है कि बिहार रातोरात नहीं बदल पायेगा और ये भी सही हैं की इसे कोशिश करने के लिए पुरे पुरे अंक दिए जा सकते हैं। लेकिन मन के कोने में अभी भी एक सवाल टीस बनकर उभरता हैं की क्या सचमुच बिहार बदल रहा हैं या ये आज भी वहीँ हैं जहाँ ये
पाँच दशक पहले था।

भ्रस्टाचार की रफ़्तार...

भ्रस्टाचार की रफ़्तार...

गुरुवार को अखबार में लालू की फोटो मुख्य पृष्ठ पर देख नज़र ठहर गयी, चुकी खबर लालू जी की थी और भी मुख्य पृष्ठ पर तो यह सोचकर की खबर बिहार की होगी पढने बैठ गया, जों-जों खबर पढता गया उत्सुकता और आश्चर्य दोनों सावन के मेघ की तरह बढ़ता गया। और खबर के अंत तक जो बात ठीक-ठीक समझ में आई उसको अगर एक शब्द में कहे तो वो था " भ्रस्टाचार की रफ़्तार"।


वैसे खबर पर गौर करे तो वो बिहार के बहुचर्चित घोटाले 'चारा घोटाला' से सम्बंधित था जिसका वृतांत अगर सही सही लिखा जाय तो यह आजाद भारत में भ्रस्टाचार का प्रतिनिधि उदहारण बन सकता है। खबर थी घोटाले में गुरवार को सीबीआई की आदालत में एक आरोप पत्र दाखिल किया गया जिसमे लालू प्रसाद, जगन्नाथ मिश्रा, ध्रुव भगत और उनके कुछ सहियोगियो को इस घोटाले में आरोपी बनाया गया है। वैसे यह आरोप पत्र १९९४-१९९६ के बीच ४६ लाख रूपये के चारे घोटाले का है। यह आरोप पत्र यह भी बताता है की ताकतवर लोगों के लिए भारत में भ्रस्टाचार की गति कितनी तेज है। लगभग १७ साल सिर्फ आरोप पत्र दाखिल होने में लग गए तो कब मुकदमा चलेगा और कब सुनवाई होगी और कब सजा सुनाई जायेगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। वैसे भारत की न्याय-व्यवस्था से हर कोई परिचित है, ना तो यहाँ न्यायालयो की कमी है ना ही न्यायाधिशो की। वैसे भी बड़े लोगो का मामला हमेशा से ऊँची और ऊँची अदालतों में चलता रहता है, चलता रहता है, और कभी कभी तो ऐसा होता है की फैसला आते आते उम्र कम पड़ जाती है। कुछ ऐसा ही वाकया इस केस में भी हुआ है भोलाराम तूफानी, और राधो सिंह अब इस दुनिया को छोड़ चले है, शायद अब ऊपर की अदालत में उनका फैसला हो। वैसे ये बात अलग है की लालू प्रसाद और जगन्नाथ मिश्रा इस घोटाले के सिलसिले में कई बार जेल भी जा जुके है, लालू जी के लिए ये तो इतना महंगा पड़ा की एक बार उन्हें मुख्यमंत्री के पद से भी हाथ धोना पड़ गया था। अब खुदा ना खास्ते कल को न्यायधीश बिक गए या फिर किसी और कारण से ये निर्दोष करार कर दिए गए तो क्या ? ये बेमतलब से इतने दिनों से इसे ढो रहे थे, बेकार में ही इन्होने बिना किसी वजह के मुख्यमंत्री का पद खो बैठे थे।
वैसे देखा जाय तो गलती हमरी है। १९८५ में अगर हमारी सरकार और कानून कैग की उस रिपोर्ट को गंभीरता से ले लेती तो ये ४५-४६ लाख का घोटाला आज करीब दस अरब तक नहीं पहुँचता। वैसे भारत में देखा हमेशा से देखा गया है कानून पूंजीपतियों और राजनेताओ की गुलाम रही है, चाँदी के जूते बड़े बड़े कानून का मुंह बंद कर देती है। और उस समय लालू जी सत्ता में थे और उनके कुछ सहियोगी केंद्र में इसलिए यह प्रकरण एक तरह से दब गया था या रुक रुक कर चल रहा था। लेकिन अब ना तो जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री है और ना ही लालू का राजीनीति में दबदबा है, बिहार से उनका राजनैतिक पतन तो हो ही गया है केंद्र में भी कुछ खास पहुँच नहीं दिखाई दे रही है, तो हो सकता है की अब इस मामले के निपटारे में तेजी आये और फैसला जल्द हो।
लेकिन अभी भी हमें जरुरत ये नहीं है की चारा घोटाले पर फैसला जल्द आ जाए या, सीबीआई किसी को भी झूठ मुठ फसाकर इस फ़ाइल को जल्द से जल्द बंद की जाय, हमें जरुरत है एक प्रभावी कानून की जो भ्रस्टाचार को रोकने में प्रभावी हो।    

ऐसा क्यों होता हैं?

ऐसा क्यों होता हैं? क्यों हो जाते है लोग उत्तेजित छोटी सी बात पर ? समझ में नहीं आता???  कभी लगता है मेरे में कुछ खामिया है, कभी लगता है सामने वाला जाहिल है। आखिर क्यों नहीं कोई समझ पाता मेरी भावनाओं को, क्यों उन्हें लगता है की वो जो कर रहा हैं वो ही सहीं है और पूरी दुनिया गलत...? क्यों लोग समझते है की दुसरो का ज्ञान बहुत अल्प है मेरे ज्ञान के आगे ? क्यों ऐसा होता है की दुनिया मानिनी बनी हुई है? क्यों हम कभी दुसरो को समझ नहीं पाते ? ऐसे कुछ ढेर सारे सवाल आज मन में कूद रहे हैं, रविवार होने के वाबजूद कार्यालय आया हूँ क्या करू निजी दफ्तरों में कुछ ऐसा ही हाल हैं अभी भारत में। आप गुलाम होते है और मालिक जमींदार कभी भी उनके पेट में ऐठन हुई और आप हुकुम बजाने सामने आ जाओ... कुछ ऐसा ही आज भी हुआ, सॉफ्टवेर की टेस्टिंग थी ऑफिस आना पड़ा, सोचा चलो घर में पड़े पड़े बोर हो रहे हैं तो ऑफिस में दिन अच्छा गुजर जाएगा, लेकिन यहाँ आकर लगा बेकार ही आ गया हूँ, वो आज फिर ऑफिस में टकरा गया, हालाँकि हमारी बातचीत कम ही होती है लेकिन जब भी होती है कुछ नोक-झोंक वाली ही होती हैं, उसे अपने आप पर गर्व है और मुझे खुद पर.... हो भी क्यों ना हम किसी से कम थोड़े ही हैं, बिहारी होने का जो तमगा सर पे लगा है उसे शायद कुछ हद तक धोने में कामयाब हो गया हूँ, अब लोग समझने लगे है की बिहार किसी से कम नहीं होते कुछ ज्यादा ही होते हैं, लेकिन फिर भी वो अधूरापन और वो खालीपन आज भी मुझे खलता है जब लोग किसी मजदूर बिहारियों को दिखा हमरा मजाक उड़ाते हैं। पता नहीं लोगो को नीचा दिखाने में क्या मिलता है, किस सुख की अनुभूति होती है उन्हें ऐसा करने में, क्या मिलता है उन्हें इस तरह किसी का मजाक उड़ने में लेकिन...। आज फिर एक बार उसने मुझे निचा दिखाने की कोशिश की मेरी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की लेकिन सच कहू तो मुझे बुरा नहीं लगा, मुझे विस्मय हुआ उसकी अज्ञानता पर मुझे दुःख हुआ उसके व्यहार पर और जब मैंने इसे अनतर्मन से सोचा मैं खुद ही सहज हो गया...
लेकिन एक बात है मेरे मन में हमेशा से एक बात टीस बनकर उभरती रहती हैं, दर्द बनकर मुझे कहती रहती हैं क्या ये मेरी गलती थी की मैं बिहार में पैदा हुआ हूँ, क्या ये मेरा दुर्भाग्य है की मैं वहां पैदा लेने के बाद भी दिल्ली में काम कर रहा हूँ....। नहीं ढूंढ़ पाया हूँ आज तक इसका उत्तर, नहीं कर पाया हूँ अपनी जिजीवषा को शांत, सिर्फ इस ख्याल में जिन्दगी जिए जा रहा हूँ की कभी तो होगा मेरा सपना पूरा, कभी तो मिलेगा बिहारियों को सम्मान...


उपरोक्त सारी बातें मेरे साथ घटित हुई हैं, सोचा लिख दूंगा तो मन हल्का हो जाएगा, सोचा कभी आप सबके साथ शेयर कर लू तो कुछ कम होगा दर्द, कही पढ़ा था बाटने से ही दर्द कमता है और ख़ुशी बढती हैं ....

तो भला अच्छा क्यों ना लगे...

जहाँ पलायन अभिशाप बना हो और बिहारी शब्द गाली बनकर रह गया हो वहीँ कोई नवीन चन्द्र गुलाम और कमला प्रसाद बिसेसर विदेश में प्रधानमंत्री के पद पर आ जाए.

जब पॉप और रैप में सारी दुनिया डूबी हो और धूम धड़ाका संगीत की पहचान हो गयी हो वही कोई विदुर मल्लिक ध्रुपद के क्षेत्र में पुरे विश्व में झंडे गाड़ दे और अगले ६० वर्षो तक उसका परिवार यह झंडा गिरने ना दे.
जब आधे से ज्यादा औरत अपने आँगन की दहलीज को पार ना कर सकी हो और औरत आज भी सिर्फ लाज का प्रतिरूप बनकर रह गयी हो, वहीँ कोई अरुणा मिश्रा विश्व विमेन बोक्सिंग चैम्पियनशीप में एक झटके से स्वर्ण पदक ले आये.

जहाँ आधा से ज्यादा बच्चे स्कूल का मुंह तक ना देख सके हो और ४३% से ज्यादा लोग पहली कक्षा में ही स्कूल ड्रॉपआउट कर दे और वहीँ कोई संजय झा और सतीश झा सीईओ के पद पर विराजमान हो जाए.
जब तीन चौथाई से भी ज्यादा हिस्सा हरेक साल बाढ़ और सूखे की चपेट में आता हो वही कोई युवा किसान सुमंत एक हेक्टेयर में २५४ क्विंटल धान उत्पादन करके चीनी वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग को भी पीछे छोड़ दे.

जब क्रिकेट किट के लिए पैसे ना हो और ताड़ के डंडे से बैटिंग करके कोई कीर्ति आजाद, सौरभ तिवारी और कविता राय  विश्व क्रिकेट में झंडे गाड़ दे.


जब
इंजीनयिरिंग में एडमिशन सिर्फ पैसे वालों हक़ बन जाए और कोई आनंद गरीबो के लिए इसे सुलभ बना दे.

जब राजनीति सिर्फ सियासी गलियारों की गुलाम बनकर रह जाए और विकाश सिर्फ नेताओं की जेब तक दिखे वहीँ कोई इंजिनियर मुख्यमंत्री बनकर विकाश पुरुष बन जाए


तो भला अच्छा क्यों ना लगे...

अच्छा लगता हैं…

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
ये बुद्ध की धरती हैं
जिसने सिखाया दुनिया को
अहिंसा का पाठ

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुए थे गुरु गोविन्द
जिसने सिखाया अपने
बाजुओ पर भरोसा करना

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुई थी सीता
जो थी जगतजननी
वैदेही और जानकी भी

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुई थे भगवान् महावीर
जो बने जैनों के चौबीसवे तीर्थकर

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुए थे हज़रत मखदूम, बदरुद्दीन और सफरुल
जिनकी रहमत सबको प्यारी थी

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
ये बिहार हैं
जो सभी धर्मो का सार हैं