विकास की डगर पर बढ़े मजबूत कदम
बात 1917 की है. महात्मा गांधी ने चंपारण में अपने पहले सफल सत्याग्रह को
अंजाम दिया था. इसके साथ ही बिहार आजादी की लड़ाई की धुरी बन गया. बाद के
वर्षों में, चंपारण आंदोलन ने देश में अंग्रेजी राज के अंत की राह प्रशस्त
की.
राज्य के गठन के शताब्दी वर्ष के मौके पर बदलते बिहार पर ग्लोबल समिट
का आयोजन शासन के फोकस को नया दम देता है. लंबे समय से आर्थिक परेशानी की
बेड़ियों में बंधे बिहार के लिए इसे नई आजादी के आंदोलन की शुरुआत के तौर पर
भी देखा जा सकता है. पटना में 17 से 20 फरवरी तक चली इस समिट ने
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्य के बारे में सकारात्मक माहौल बनाने का
मौका दिया. उन्होंने माना कि इस मौके को गांधी की चंपारण यात्रा से जोड़े
जाने से समयसीमा बेशक तय नहीं होगी लेकिन कुछ निश्चित लक्ष्य जरूर
निर्धारित किए जा सकेंगे.
नीतीश ने दावा किया, ‘बिहार राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने के लिए 20 साल
तक इंतजार नहीं कर सकता.’ उन्होंने कुछ विशेषज्ञों के उन तर्कों को सिरे
से खारिज कर दिया, जिन्होंने राज्य के विकास को समय और कुछ सिद्धांतों के
आधार पर आंक कर कहा कि इसे विकसित राज्यों की श्रेणी में पहुंचने के लिए
इतने साल लगेंगे. नीतीश ने कहा, ‘हम अपने लक्ष्य को 10 साल से भी कम अवधि
में हासिल कर लेंगे.’
उन्होंने घोषणा की, ‘बिहार में निवेशक वायबिलिटी गैप फंडिंग (पीपीपी
के तहत इन्फ्रॉस्ट्रक्चर परियोजनाओं के वाणिज्यिक रूप से कारगर होने तक
अनुदान के रूप में वित्तीय मदद) की जरूरत के बिना पीपीपी परियोजनाओं के लिए
आगे आ रहे हैं. यह बिहार में बढ़ते विश्वास का संकेत है.’
समिट में छह सत्रों का आयोजन हुआ. इसमें में उन चुनौतियों को पहचाना
गया जिनका वर्तमान में बिहार को सामना करना पड़ रहा है, और यह सुझाव मिले
कि इन चुनौतियों को अवसरों में कैसे बदला जा सकता है.
छठे सत्र की अध्यक्षता करते हुए इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर
एम.जे. अकबर ने महात्मा गांधी की चंपारण यात्रा की शताब्दी के करीब आने की
याद दिलाई. यह यात्रा विकास के समान बंटवारे की प्रतीक भी है, जिसे नीतीश
कुमार की सरकार बिहार में हासिल करने की कोशिश में जुटी है.
नीतीश इस बात से पूरी तरह सहमत थे. ‘बदलते बिहार पर ग्लोबल समिट’ के
आखिरी दिन उन्होंने कहा, ‘मैं सिर्फ जीडीपी और जीएसडीपी को विकास के सही
संकेतक के तौर पर लेने में यकीन नहीं करता. विकास की मेरी संकल्पना हर एक
शख्स तक तरक्की की बयार पहुंचाना है.’ उन्होंने राज्य में प्रति व्यक्ति
आय में इजाफा करने के लिए उच्च वृद्धि दर को पाने को चुनौती माना और कहा कि
विशेषज्ञों को इसका समाधान देना चाहिए. उन्होंने बिहार जैसे राज्य के
प्रति केंद्र सरकार की पल्ला झाड़ने की नीति पर भी सवालिया निशान लगाया.
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘केंद्रीय कर सभी राज्यों पर समान रूप से लागू हो रहे
हैं, तो फिर हमें बिहार में समान स्तर की सेवाएं और सुविधाएं क्यों नहीं
दी जा रही हैं. बिहार को फंड क्यों नहीं दिए जा रहे हैं? क्या यह भेदभाव
बरतने जैसा नहीं है? जितना भी मिलेगा हम उसके साथ काम करेंगे. लेकिन यह
केंद्र के समग्र विकास के दावे पर प्रश्न उठाता है? समग्र विकास का मतलब यह
नहीं है कि हम कुछ इलाकों को विकास का प्रतीक बना दें-जैसा हमने पश्चिम और
दक्षिण के कुछ हिस्सों में किया है. देश के बाकी हिस्सों को पीछे छोड़ दिया
है.’
शिखर सम्मेलन में विलक्षण बात देखने को मिली जब वहां मौजूद सभी
विशेषज्ञों ने यह माना कि हाल के समय में बिहार ने बेहतर दिशा में कदम बढ़ाए
हैं. विचार-विमर्श में इस बात की पुष्टि हुई कि नीति नियंता और लोक
प्रशासन से जुड़े लोगों के लिए बिहार देश के सबसे ज्यादा चुनौती वाले
राज्यों में एक है.
अगर राज्य पर्याप्त गति के साथ सही दिशा में सफर कर रहा है; और
वृद्धि काफी अच्छी है तो कई ऐसे प्रश्न थे जिन्हें विभिन्न सत्रों में
योजना आयोग के सदस्य अभिजीत सेन, अर्थशास्त्री लॉर्ड मेघनाद देसाई, पूर्व
केंद्रीय मंत्री वाइ.के. अलघ और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह
आहलुवालिया सरीखे विशेषज्ञों ने उठाया.
अभिजीत काफी सोची-समझी सलाह देते हैं कि राज्य की ग्रोथ व्यापक
स्तर पर निर्माण क्षेत्र में उछाल से जुड़ी हुई है, यह चहुंमुखी समृद्धि को
जन्म नहीं देता है. उन्होंने सुझाव दिया कि कुछ लक्ष्यों और रणनीति में
फेरबदल करना मौजूदा समय की जरूरत है.
नीतीश ने केंद्रीय सहायता के लिए आवाज बुलंद की और योजना आयोग से
राज्य सरकार के फैसले पर भरोसा करने के लिए कहा, जिसे उन्होंने ‘सबसे
पारदर्शी व्यवस्थाओं में से एक बताया.’ उन्होंने कहा, ‘उपजाऊ भूमि और अच्छा
मौसम हमारी ताकत है. हमारे लोग और विरासत हमारी संपत्ति है. हम समग्र
विकास के लिए अपनी ताकत के बल पर आगे बढेंग़े.’
समिट शुरू होने से पहले ही नीतीश ने यह कहते हुए सावधान किया था कि
इसका किसी निवेश से कोई सरोकार नहीं है. उद्योगपति कुमारमंगलम बिरला ने
बिहार में सीमेंट संयंत्र की स्थापना के लिए 500 करोड़ रु. के निवेश का वादा
किया. बिहार में 3.5 करोड़ डॉलर के सबसे पहले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
(एफडीआइ) को अंजाम देने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी कोबरा बीयर के मालिक लॉर्ड
करण बिलिमोरिया ने और अधिक निवेश करने का वादा किया.
शिखर सम्मेलन में बिहार के 33 फीसदी के क्रेडिट डिपॉजिट रेशियो,
भारी उद्योगों की अनुपस्थिति, बिजली की कमी और राज्य में शहरीकरण की धीमी
रफ्तार पर चिंता जताई गई. इसके अलावा समिट में राज्य सरकार के कृषि में
वृद्धि के फोकस का समर्थन किया गया. राज्य में कृषि क्षेत्र में 60 फीसदी
लोगों को रोजगार मिला हुआ है लेकिन यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में
सिर्फ 33 फीसदी का योगदान करती है. मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हमने कृषि के
विकास के लिए 10 साल का खाका तैयार किया है. इस अवधि में हम इस क्षेत्र पर
1.50 लाख करोड़ रु. खर्च करेंगे.’
नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने समिट का उद्घाटन किया.
समापन पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल और लेखक गोपालकृष्ण गांधी के जानदार
भाषण से हुआ. गोपालकृष्ण गांधी ने एक लंबा काल्पनिक पत्र पढ़कर सुनाया जो
उन्होंने जयप्रकाश नारायण को लिखा था ताकि आधुनिक नेताओं को उनके आचरण का
आईना दिखाया जा सके. समिट में दुनिया भर से आए 1,000 प्रतिनिधियों ने
हिस्सा लिया. नेपाली प्रधानमंत्री ने अपने देश की हाइड्रो पावर और पर्यटन
से जुड़ी क्षमताओं को मिल कर प्रयोग करने के लिए संयुक्त उपक्रमों को लेकर
सक्रिय सहयोग का वादा किया.
समिट ने इस बात पर मुहर लगाई कि राज्य में हाल में हो रहे बदलाव
सकारात्मक परिवर्तन के संकेत हैं. इसने राज्य को ऐसी राहें सुझाईं जिनके
जरिए राज्य विविधीकृत, संतुलित और समग्र आर्थिक ग्रोथ को कायम रखने की
चुनौती पर खरा उतर सकता है.