अगर ये पुल न होते तो आज सिर्फ बिहार ही नहीं, पूरे देश की तस्वीर ही कुछ अलग होती। बिहार भले पिछड़ा हो, लेकिन पूरे देश के विकास में इन पुलों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। ये पुल पूरे देश में व्यवसायिक और औद्योगिक विकास की लाइफलाइन बन चुके हैं।
बिहार हमार
Monday, 13 August 2012
बेहद खूबसूरत हैं ये INDIAN BRIDGE, टॉप 10 में 4 हैं यहां
अगर ये पुल न होते तो आज सिर्फ बिहार ही नहीं, पूरे देश की तस्वीर ही कुछ अलग होती। बिहार भले पिछड़ा हो, लेकिन पूरे देश के विकास में इन पुलों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। ये पुल पूरे देश में व्यवसायिक और औद्योगिक विकास की लाइफलाइन बन चुके हैं।
Tuesday, 31 July 2012
उप मुख्यमंत्री ने लिया कचरा मुक्त बिहार बनाने का संकल्प
इस मौके पर उन्होंने राज्य को साफ-सुथरा और कचरा मुक्त बनाने का संकल्प लिया और कहा कि कचरा प्रबंधन सिर्फ नगर निकायों के दम पर संभव नहीं है। कार्यक्रम में वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव दीपक कुमार सिंह, बीएसपीसीबी अध्यक्ष डॉक्टर सुभाष चन्द्र सिंह, ईपीटीआरआई केपी प्रसाद राव, डॉक्टर आशा पांडेय आदि मौजूद थे।
एसएचजी की सहायता
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि कचरा को डोर-टू-डोर जमा करने के लिए स्वयं सहायता समूह की मदद ली जा सकती है। उन्होंने कहा कि दुकानों और बहु मंजिली इमारतों को कूड़ा-कचरा डोर-टू-डोर सर्विस को देने या फिर कूड़ेदान में फेंकने के लिए बाध्य करना होगा।
कचरा प्रबंधन निजी क्षेत्र की कंपनियों को
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के सभी शहरों के कचरा प्रबंधन की जिम्मेवारी निजी क्षेत्र की कंपनियों को सौंपी जाएगी। पटना की साफ-सफाई और बैरियाचक में कचरा डिस्पोजल का जिम्मा ‘जिंदल’ नामक कंपनी को सौंपी गई है। इसके अलावा आरा, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, बिहार शरीफ, फुलवारी शरीफ और दानापुर शहरों के साफ-सफाई के लिए प्राइवेट कंपनियों से करार किया गया है।
कोई नहीं होगा बेरोजगार
उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने नगर निकाय कर्मियों को गारंटी दिया कि साफ-सफाई क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने से उनकी नौकरी समाह्रश्वत नहीं होगी। निकायों पर कचरा प्रबंधन का अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाएगा। उन्होंने कहा कि कचरा प्रबंधन कंपनियों से कचरा-छाटने के लिए रैग पिकर्स को
जोड़ा जाएगा।
भारतीय तकनीक की जरूरत
सुशील कुमार मोदी ने कहा कि भारत में धूल ज्यादा है। यहां विदेशों से आयातित सफाई मशीनें कारगर साबित नहीं हुई है। उन्होंने सफाई व्यवस्था के लिए भारतीय परिस्थिति के अनुसार मशीनों को विकसित करने पर बल दिया।
जिले के शहरी गरीबों को भी मुफ्त इलाज
मुजफ्फरपुर, कासं : राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के
तहत जिले के शहरी क्षेत्र के गरीबों का भी मुफ्त इलाज होगा। ग्रामीण बीपीएल
परिवारों के साथ नगर निगम क्षेत्र के परिवारों को भी इस योजना से जोड़ा जा
रहा है। इसके लिए 13 अगस्त को कार्यशाला आयोजित की जाएगी। इसमें जिला व
प्रखंडों के अधिकारियों के अलावा मेयर व जिप अध्यक्ष भी उपस्थित रहेंगे।
जिले में इस योजना की सेवा प्रदाता बीमा कंपनी आइसीआइसीआइ लोंबार्ड के गिरिजेश शर्मा ने जिलाधिकारी संतोष कुमार मल्ल से मिलकर रूपरेखा के बारे में बातचीत की। शर्मा ने बताया कि इस वर्ष जिले के करीब 6,82,200 परिवारों को इस योजना से जोड़ा जाएगा। इसकी कवायद शुरू कर दी गई है। डाटा मिल चुका है। कार्यशाला के बाद स्मार्ट कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। अक्टूबर या नवंबर से गरीबों का आरएसबीवाई योजना से मुफ्त इलाज होने लगेगा।
गौरतलब है कि इस योजना के तहत प्रत्येक बीपीएल परिवार के सदस्यों का तीस हजार रुपये तक का इलाज मुफ्त में किया जाता है। इसमें योजना से जुड़े निजी अस्पताल भी शामिल हैं।
जिले में इस योजना की सेवा प्रदाता बीमा कंपनी आइसीआइसीआइ लोंबार्ड के गिरिजेश शर्मा ने जिलाधिकारी संतोष कुमार मल्ल से मिलकर रूपरेखा के बारे में बातचीत की। शर्मा ने बताया कि इस वर्ष जिले के करीब 6,82,200 परिवारों को इस योजना से जोड़ा जाएगा। इसकी कवायद शुरू कर दी गई है। डाटा मिल चुका है। कार्यशाला के बाद स्मार्ट कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। अक्टूबर या नवंबर से गरीबों का आरएसबीवाई योजना से मुफ्त इलाज होने लगेगा।
गौरतलब है कि इस योजना के तहत प्रत्येक बीपीएल परिवार के सदस्यों का तीस हजार रुपये तक का इलाज मुफ्त में किया जाता है। इसमें योजना से जुड़े निजी अस्पताल भी शामिल हैं।
Friday, 20 July 2012
पांच साल में सबसे ज्यादा: 16.71 हुई बिहार की विकास दर
पटना। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने प्रणव मुखर्जी को बिहार का अगला पंचवर्षीय कृषि रोड मैप लॉन्च करने का न्योता दिया है। मोदी ने कहा कि प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बनने के बाद पहले दौरे पर बिहार आएं, इसका आग्रह वे करते हैं। पत्रकारों ने जब मोदी को टोका कि क्या उन्होंने भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार पीए संगमा की हार मान ली तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। थोड़ा संभलते हुए मोदी ने कहा कि सभी जानते हैं कि चुनावी गणित क्या है। चुनाव सिर्फ जीत-हार के लिए नहीं लड़ा जाता। मोदी ने अपने सरकारी आवास पर जनता दरबार में मंगलवार को सैकड़ों फरियादियों की समस्याएं सुनीं और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।
कृषि विकास दर में अव्वल
कृषि क्षेत्र में बिहार की तरक्की की चर्चा करते हुए उपमुख्यमंत्री ने कहा कि बीते वित्तीय वर्ष में कृषि विकास दर 17.16 प्रतिशत रहा। जबकि बिहार का विकास दर 16.17 प्रतिशत रहा। जो पिछले पांच साल में सर्वाधिक है। अनाज, खासकर चावल के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के कारण ऐसा हुआ।
Thursday, 12 July 2012
उभरता बिहार – सुशासन और प्रगति की नई मिसाल या सिर्फ एक छलावा ??
कुछ समय
पहले तक केवल गरीबी, भुखमरी और प्रवासन का पर्याय बन चुका बिहार, आज भारत
के सबसे अधिक विकासशील राज्य के तौर पर अपनी पहचान स्थापित कर चुका है।
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा हाल ही में
जारी रिपोर्ट के अंतर्गत 13।1 जीडीपी दर के साथ बिहार को लगातार दूसरी बार
देश के सबसे अधिक और तेजी से विकसित होते राज्य का दर्जा दिया गया है। इस
नवीन और पूरी तरह परिवर्तित बिहार को भारत की टाइगर इकॉनोमी बनाने का
संपूर्ण श्रेय राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही जाता है, जिन्होंने
बिहार की डोर उस समय संभाली जब वह स्वयं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर
रहा था। आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इस नवीन बिहार के सामने ब्रैंड
गुजरात की चमक भी फीकी पड़ती जा रही है।
बिहार
राज्य में होते इस परिवर्तन और सुधरते आर्थिक हालातों के कारण बिहार से
दूसरे राज्यों में प्रवासन के आंकड़ों में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय गिरावट
दर्ज की गई है। पहले जहां अपनी बदहाली से आहत लोगों को विवश होकर अपना घर
और परिवार छोड़कर दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाना पड़ता था, आज वहीं
जब उन्हें बिहार में पर्याप्त संसाधन और रोजगार मुहैया करवाया जाने लगा है
तो अन्य शहरों में जा बसे लोग वापस अपने घरों की ओर रुख कर रहे हैं। आंकड़ों
की मानें तो मनरेगा और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की अत्याधिक सफलता भी
बिहार की विकास पर अपनी मुहर लगाती है।
उल्लेखनीय
है कि ना सिर्फ सरकारी आंकड़े बिहार की इस सफलता को बयां कर रहे हैं बल्कि
मीडिया और अन्य प्रचार माध्यम भी नवीन बिहार के परिवर्तित हालातों को नीतीश
कुमार की सफलता बता रहे हैं। उनका तो यह तक कहना है कि पहले जहां बिहार के
दयनीय हालातों से त्रस्त लोग अपने क्षेत्र में व्याप्त अराजकता के कारण
अपनी पहचान छिपाते फिरते थे आज वहीं उन्हें खुली और आजाद हवा में सांस लेने
का अवसर मिला है।
लेकिन
क्या यह आंकड़े सही हैं या फिर कोई राजनैतिक लॉलीपॉप? बहुत से लोगों का यह
कहना है कि भले ही आरजेडी की तुलना में जनता दल (यूनाइटेड) के शासन में
बिहार के स्वरूप में परिमार्जन देखा गया है लेकिन उसे बढ़ाचढ़ा कर पेश किया
जा रहा है। क्योंकि ना तो प्रवासन की गति में कोई कमी आई है और ना ही सड़कों
का सही तरीके से निर्माण किया गया है। सड़कों का काम शुरू तो जरूर हुआ
लेकिन बीच में ही उसे रोक कर यह प्रचारित किया गया कि अब बिहार में भी
पक्की सड़के बन गई हैं। वहीं दूसरी ओर मनरेगा और अन्य पीडीएस प्रणाली में
व्याप्त धांधली भी जस की तस है। इसीलिए यह सरकारी आंकड़े जनता को सत्य ना
बताकर भ्रम की स्थिति में उलझा रहे हैं।
विकासशील
बिहार से जुड़े इस मसले पर चर्चा करने के बाद कुछ महत्वपूर्ण सवाल हमारे
मस्तिष्क में उठते हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ना वर्तमान समय की जरूरत बन गया है,
जैसे:
1. क्या
वास्तव में सरकारी आंकड़े सच्चाई और पारदर्शिता के साथ जनता के समक्ष बिहार
के परिवर्तित हालातों को बयां कर रहे हैं या फिर जमीनी सच्चाई कुछ और है?
2. क्या सच में नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार के लोगों की रोजगार जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हुई है?
3. नरेंद्र
मोदी की तरह क्या नीतीश कुमार भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने प्रदेश
को ब्रैंड गुजरात की तर्ज पर ब्रैंड बिहार बनाने में सक्षम हो पाएंगे?
4. क्या अब बिहार के लोग अपने क्षेत्र के हालातों और नीतीश कुमार के नेतृत्व से खुद को सुरक्षित पाते हैं?
नोट: उपरोक्त
मुद्दे पर आप कमेंट या स्वतंत्र ब्लॉग लिखकर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं।
किंतु इतना अवश्य ध्यान रखें कि आपके शब्द और विचार अभद्र, अश्लील और
अशोभनीय ना हों तथा किसी की भावनाओं को चोट ना पहुंचाते हों।
नितीश कुमार और बिहार की तरक्की दिखेगी सिनेमा के पर्दे पर
नितीश कुमार और बिहार की तरक्की दिखेगी सिनेमा के पर्दे पर
बिहार: विकास के सर 'ताज'
नीतीश की ऐसी आंधी चलेगी और लालू की लुटिया इस कदर डूब जाएगी इसका अंदाजा
दोनों में से किसी को भी नहीं था. लालू थोड़े टूटे हुए जरूर थे लेकिन कहीं न
कहीं उन्हें लग रहा था कि एमवाय समीकरण एक बार फिर उनकी नैया पार लगा सकती
है.
वहीं नीतीश ये मानकर चल रहे थे कि विकास का स्वाद चख चुकी जनता उन्हें धकेल कर ही सही लेकिन गद्दी तक तो जरूर पहुंचा देगी. लेकिन जब नतीजे आने शुरू हुए तो सबकी आंखें फटी की फटी रह गयी. वो लालू जिसने एक झटके में पत्थर तोड़ने वाली मजदूर को संसद भेज दिया, वो दोनों जगहों से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को नहीं जीता पाए. हार का अंतर इतना रहा की लालू कोपभवन में चले गए.
बारह बजते-बजते सब कुछ उजड़ चुका था. राबड़ी निवास वीरान, सूनसान, उजड़ा सा दिखने लगा. कोई कार्यकर्ता नहीं, कोई भीड़-भाड़ नहीं. लालू के घर की ऐसी तस्वीर इतने सालों में पहली दफा देख रहा था मैं. सड़क के दूसरी ओर नीतीश के घर पटाखे छूट रहे थे, मिठाइयां बांटी जा रही थी, होली दिवाली सब मनाये जा रहे थे. फासला महज तीस-चालीस मीटर का था.
23 नवम्बर, सुबह के करीब आठ बजे थे. बिहार चुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले की सुबह थी. पटना में मैं लालू के निवास पर पंहुचा, लालू अभी-अभी सोकर उठे थे और बाहर कुर्सी पर बैठे थे. लालू ने अपने वही चिर-परिचित पुराने अंदाज में हमें कुर्सी पर बैठने को कहा और फटाफट निम्बू वाली चाय मंगवाई और इसी के साथ हमारी बातचीत शुरू हो गयी. बीच-बीच में इक्के दुक्के पोलिंग एजेंट भी आ रहे थें और लालू उनसे उनके क्षेत्र के बारे में जानकारियां भी ले रहे थें. तकरीबन दो घंटे मैं वहां रहा. लालू ने जबरन चूड़ा-दही नाश्ता भी करवाया और हमें विदा किया. मेरे जाने का मकसद साफ़ था. मैं लालू की बॉडी लैंग्वेज, उनके हाव-भाव को जानना चाह रहा था. यूं कहें तो परखना चाह रहा था.
शाम के करीब छ: बजे इसी एजेंडे को लेकर मैं मुख्यमंत्री आवास नीतीश कुमार से भी मिलने गया और वहां भी नीतीश के साथ करीब डेढ़ घंटे बिताये. गरम गरम सूप के साथ हम नतीजे को लेकर बातचीत करते रहे. लौटते वक्त मैं मन ही मन लालू और नीतीश के हाव-भाव, उनके आत्मविश्वास और उनकी बातों में तुलना कर रहा था और ये तय करने की कोशिश कर रहा था कि अगली सुबह लाइव में दर्शकों को क्या कहूंग, कौन सी सटीक लाइन लूंगा...
विकास क्या चीज है, ये बिहार की जनता ने लालू के राज में जाना तक नहीं, न ही जातीय समीकरण के बूते ताल ठोंकने वाले लालू ने इसे बताने की जरूरत ही समझी. लेकिन सत्ता में आते हीं नीतीश ने काम करना शुरू किया. सड़कें बनने लगी, स्कूल दुरुस्त होने लगे और सबसे अहम् रहा कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार. लोगों को उम्मीद की किरण दिखने लगी. विकास का मजा आने लगा. बिना डर भय के वोट डालने महिलाएं खुलकर सामने आयीं. उधर लालू अपने ही दायरे में खुश थे. वो ये भूल गए कि विकास का असर हर जाति, हर तबके पर पड़ता है. कोई भी इससे अछूता नहीं रह सकता.
विकास ने जातीय समीकरण में ऐसी सेंघ मरी कि लालू चारो खाने चित हो गए. पिछले चुनाव में हार के बाद से ही केंद्र में उसकी हैसियत काफी कम हो गयी थी. अबकी बार तो वो पूरी तरह हाशिये पर चले गए. हार के इस सदमे से उबरने में काफी वक्त लगेगा उन्हें. यही हाल पासवान का भी रहा. पार्टी और भी सिमट गयी और उनके दोनों भाई भी हार गए.
एक नए बिहार का सपना लिए बिहार की जनता ने नीतीश को उनकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा दे दिया. हर तबके ने नीतीश को वोट दिया. नीतीश के नाम पर यहां तक कि मुसलमानों ने बीजेपी तक को वोट डालने से परहेज नहीं किया.
देखा जाए तो सही मायने में नीतीश की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है. जनता की उम्मीदों पर उन्हें खड़ा उतरना होगा.
वहीं नीतीश ये मानकर चल रहे थे कि विकास का स्वाद चख चुकी जनता उन्हें धकेल कर ही सही लेकिन गद्दी तक तो जरूर पहुंचा देगी. लेकिन जब नतीजे आने शुरू हुए तो सबकी आंखें फटी की फटी रह गयी. वो लालू जिसने एक झटके में पत्थर तोड़ने वाली मजदूर को संसद भेज दिया, वो दोनों जगहों से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को नहीं जीता पाए. हार का अंतर इतना रहा की लालू कोपभवन में चले गए.
बारह बजते-बजते सब कुछ उजड़ चुका था. राबड़ी निवास वीरान, सूनसान, उजड़ा सा दिखने लगा. कोई कार्यकर्ता नहीं, कोई भीड़-भाड़ नहीं. लालू के घर की ऐसी तस्वीर इतने सालों में पहली दफा देख रहा था मैं. सड़क के दूसरी ओर नीतीश के घर पटाखे छूट रहे थे, मिठाइयां बांटी जा रही थी, होली दिवाली सब मनाये जा रहे थे. फासला महज तीस-चालीस मीटर का था.
23 नवम्बर, सुबह के करीब आठ बजे थे. बिहार चुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले की सुबह थी. पटना में मैं लालू के निवास पर पंहुचा, लालू अभी-अभी सोकर उठे थे और बाहर कुर्सी पर बैठे थे. लालू ने अपने वही चिर-परिचित पुराने अंदाज में हमें कुर्सी पर बैठने को कहा और फटाफट निम्बू वाली चाय मंगवाई और इसी के साथ हमारी बातचीत शुरू हो गयी. बीच-बीच में इक्के दुक्के पोलिंग एजेंट भी आ रहे थें और लालू उनसे उनके क्षेत्र के बारे में जानकारियां भी ले रहे थें. तकरीबन दो घंटे मैं वहां रहा. लालू ने जबरन चूड़ा-दही नाश्ता भी करवाया और हमें विदा किया. मेरे जाने का मकसद साफ़ था. मैं लालू की बॉडी लैंग्वेज, उनके हाव-भाव को जानना चाह रहा था. यूं कहें तो परखना चाह रहा था.
शाम के करीब छ: बजे इसी एजेंडे को लेकर मैं मुख्यमंत्री आवास नीतीश कुमार से भी मिलने गया और वहां भी नीतीश के साथ करीब डेढ़ घंटे बिताये. गरम गरम सूप के साथ हम नतीजे को लेकर बातचीत करते रहे. लौटते वक्त मैं मन ही मन लालू और नीतीश के हाव-भाव, उनके आत्मविश्वास और उनकी बातों में तुलना कर रहा था और ये तय करने की कोशिश कर रहा था कि अगली सुबह लाइव में दर्शकों को क्या कहूंग, कौन सी सटीक लाइन लूंगा...
विकास क्या चीज है, ये बिहार की जनता ने लालू के राज में जाना तक नहीं, न ही जातीय समीकरण के बूते ताल ठोंकने वाले लालू ने इसे बताने की जरूरत ही समझी. लेकिन सत्ता में आते हीं नीतीश ने काम करना शुरू किया. सड़कें बनने लगी, स्कूल दुरुस्त होने लगे और सबसे अहम् रहा कानून व्यवस्था में जबरदस्त सुधार. लोगों को उम्मीद की किरण दिखने लगी. विकास का मजा आने लगा. बिना डर भय के वोट डालने महिलाएं खुलकर सामने आयीं. उधर लालू अपने ही दायरे में खुश थे. वो ये भूल गए कि विकास का असर हर जाति, हर तबके पर पड़ता है. कोई भी इससे अछूता नहीं रह सकता.
विकास ने जातीय समीकरण में ऐसी सेंघ मरी कि लालू चारो खाने चित हो गए. पिछले चुनाव में हार के बाद से ही केंद्र में उसकी हैसियत काफी कम हो गयी थी. अबकी बार तो वो पूरी तरह हाशिये पर चले गए. हार के इस सदमे से उबरने में काफी वक्त लगेगा उन्हें. यही हाल पासवान का भी रहा. पार्टी और भी सिमट गयी और उनके दोनों भाई भी हार गए.
एक नए बिहार का सपना लिए बिहार की जनता ने नीतीश को उनकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा दे दिया. हर तबके ने नीतीश को वोट दिया. नीतीश के नाम पर यहां तक कि मुसलमानों ने बीजेपी तक को वोट डालने से परहेज नहीं किया.
देखा जाए तो सही मायने में नीतीश की असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है. जनता की उम्मीदों पर उन्हें खड़ा उतरना होगा.
Subscribe to:
Comments (Atom)
